ख्वाजा अलताफ हुसैन हाली औ
कर्मेन्दु शिशिर
भारतीय नवजागरण को लेकर विभिन्न भाषाओं में हुए विपुल और विविध कार्यों का विस्तार जहाँ एक ओर हमें सुखद और चकित करता है, वहीं दूसरी ओर यह बात बहुत गहरे कचोटती है कि उसमें उर्दू और मुस्लिम नवजागरण अनुपस्थित रहता है। अमूमन उर्दू या मुस्लिम नवजागरण की चर्चा सैयद अहमद तक ही महदूद कर दी जाती है और उन पर भी समग्रता से लगभग विचार-विश्लेषण की उदारता नहीं दिखाई जाती। उनके जिन पक्षों की चर्चा की जाती है उसमें एक बड़ा हिस्सा तो नकारात्मक छबि वाला ही होता है। लेकिन उनके अवदान के अदीठ आयामों को उद्घाटित करने की जहमत कोई नहीं उठाता। इससे यह भ्रम होता है कि उर्दू या मुस्लिम कौम में नवजागरण या तो आया ही नहीं और आया भी तो वह एकआयामी था और वह सैयद अहमद तक ही सीमित था। बंगला और मराठी नवजागरण की बात तो निर्विवाद रूप से की ही जाती है, जबकि उसके सामने हिन्दी नवजागरण की तस्वीर कई विद्वानों की नजर में बलात उकेरी गई लगती है। जो सच नहीं है। उसी तरह यह बात भी विश्वासपूर्वक कही जा सकती है कि हिन्दी नवजागरण की तुलना में उर्दू नवजागरण में ज्यादा विस्तार है और उसकी परंपरा भी पहले से मौजूद है। दूसरी बात यह कि प्रारंभिक दौर में सामाजिक सक्रियता के जैसे प्रमाण वहाँ मिलते हैं वैसे प्रमाण हिन्दी में नहीं हैं। पत्रकारिता और विभिन्न विषयक पुस्तकों के लेखन और प्रकाशन की तो अत्यन्त समृद्ध परंपरा उर्दू में काफी पहले खड़ी हो चुकी थी। दिल्ली कॉलेज जैसी संस्था की तो हिन्दी वाले कल्पना भी नहीं कर सकते। आश्चर्य है इसके बावजूद उर्दू नवजागरण पर न तो काम हुए और न ही विचार-विमर्श। ऐसे में नवजागरण को लेकर हिन्दी में विचार-विमर्श की जो समृद्ध परंपरा मिलती है तो उसके पीछे संभवत: डॉ. रामविलास शर्मा की भूमिका और अवदान ही है। मसलन उर्दू को उसका रामविलास शर्मा नहीं मिला। लेकिन ऐसी बात नहीं कि उर्दू में इसकी परख और पहचान ही नहीं हुई। तरक्की पसंद उर्दू आलोचक डॉ. एतहेशाम हुसैन ने उर्दू साहित्य के आलोचनात्मक इतिहास में इसके स्पष्ट संकेत ही नहीं दिये हैं बल्कि इससे आगे बढ़कर इस प्रवृत्ति को उसी नजरिये से अच्छी तरह रेखांकित भी किया है। मगर उर्दू वाले उनके संकेत और नजरिये के आलोक में अपनी विरासत को आज के आसंग में नहीं रख पाये। यह समस्या इस कारण भी मुश्किल हुई क्योंकि आजादी के बाद हिन्दी-उर्दू का तफरका लगातार बढ़ता गया और इसके बीच जरूरी संवाद और विचार-विमर्श का वह सिलसिला खत्म हो गया, जो पहले सहज रूप में मौजूद था। कारण जो भी हो, मगर दोनों भाषाएं एक ही भौगोलिक-सांस्कृतिक समाज में शामिल हैं इसलिए बिना इनकी सामूहिक या समवेत समझ के हम इस समाज को पूरी तरह जान ही नहीं सकते। इसलिए इनके बीच आपसी समझ और विचार-विमर्श के आदान-प्रदान की आज बड़ी जरूरत है। उर्दू नवजागरण के संदर्भ में सैयद अहमद की जिस भूमिका को अभी तक हिन्दी में रेखांकित नहीं किया गया है - वह है उर्दू भाषा और साहित्य के नवजागरण में नेतृत्व और उन्नायक की। यह निर्विवाद है कि वे अपने समय के सबसे प्रेरक व्यक्तियों में थे। उन्होंने भारतेन्दु की तरह अपने समय में उर्दू भाषा और साहित्य को संरक्षित और संवद्र्धित किया। उन्होंने अपने समय में कई ऐसे उर्दू साहित्यकारों को प्रेरित किया जो आगे चलकर नवजागरण के नायक बने। उन्हीं नायकों में एक महत्वपूर्ण नाम अल्ताफ हुसैन 'हाली' का भी है।
मौलाना अल्ताफ हुसैन 'हाली' उर्दू नवजागरण के महानायकों में हैं। उनका नाम उर्दू साहित्य में आधुनिक युग के महान् साहित्य निर्माताओं में लिया जाता है। उनका जन्म 11 नवंबर 1837 में पानीपत के एक प्रतिष्ठित लेकिन गरीब अंसारी परिवार में हुआ था। मात्र नौ वर्ष के थे तो उनके पिता ईजद बख्श का इंतकाल हो गया। मां इमता-उल-रसूल मानसिक रोग से ग्रस्त थीं। उनकी पारंपरिक शिक्षा-दीक्षा भाइयों के सहयोग से ही हुई। भाइयों ने 17 वर्ष में ही उनकी शादी कर दी थी जबकि वे अभी और पढऩा चाहते थे। पत्नी संयोग से संपन्न परिवार की थीं। जब वे अपने मायके गईं तो 17 साल के हाली ने चुपके से एक दिन घर छोड़ दिया और पैदल ही दिल्ली चले आये। पता नहीं वह कौन सी विकलता थी, किस चीज की तलाश थी जो उन्हें दरवेश की तरह बावला किये हुये थी। दिल्ली में आकर उन्होंने मौलवी नवाजिश अली के साथ डेढ़ वर्षों तक अरबी का अध्ययन किया। उन्होंने खुद लिखा ''डेढ़ बरस दिल्ली में रहते हुए मैंने कालिज को कभी आंख से देखा भी नहीं।'' उस समय उर्दू में दिल्ली का दबदबा था और वहाँ गालिब, मोमिन और जौक़ जैसी शख्सियतें मौजूद थीं। तब तक हाली भी कविता करने लगे थे। एक दिन वे बहुत सकुचाते हुए गालिब के पास पहुँचे और अपनी कविताएँ सुनाई। 17-18 साल के एक युवा की गजलें सुनकर गालिब चौक गये। हाली की जिन्दगी में यह बहुत अहम मौका था जब गालिब जैसे कवि ने उन पर इनायत बरपाई थी। बोले - ''मैं अमूमन किसी को कविता करने में समय गँवाने का मशविरा नहीं देता, लेकिन तुम्हारे बारे में मेरा कहना है अगर तुम कविताएं न लिखोगे, तो अत्याचार होगा।'' हाली स्वभाव से बेहद संकोची और सज्जन थे। सुनकर कृतज्ञता से माथा झुका लिये।
हाली के लिये गालिब की यह बात एक तरह से खुदा की जुबान थी। उनका आत्मविश्वास बढ़ा और वे दिल्ली के मुशायरों में धीरे-धीरे शरीक होने लगे। जैसे-तैसे घरवालों को पता चला कि हाली दिल्ली में हैं तो वे जाकर उन्हें वापस पानीपत ले आये। हाली अब पढ़े-लिखे युवा थे। 1856 में उनको हिसार में जिलाधीश के कार्यालय में नौकरी मिल गई लेकिन 1857 को राजक्रांति में बड़ी मुश्किल से वे जान बचाकर घर भागे। उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हो चुका था। लगभग तीन-चार साल घर पर रहकर ही उन्होंने एकाग्र अध्ययन किया। लेकिन परिवार की हालत बैठकर खाने वाली नहीं थी। जीने के लिये उपार्जन जरूरी था; सो वे फिर दिल्ली आ गये जहाँ उनकी भेंट शेफ्ता से हुई। मुस्तफा खां शेफ्ता मशहूर शायर के साथ-साथ बुलंदशहर के जहाँगीराबाद के नवाब भी थे। वे हाली से इतने प्रभावित हुए कि उनको अपने बच्चों का शिक्षक नियुक्त कर लिया। शेफ्ता की सोहबत और बातचीत से हाली को बहुत लाभ हुआ। गालिब की मुश्किल पसन्दी और दार्शनिकता हाली के स्वभाव से मेल नहीं खाती थी। ऐसे में शेफ्ता का मशवदे सुखन उन्हें ज्यादा रास आया। उन्होंने स्वयं लिखा भी है कि ''मुझे गालिब के मशवर-ओ सलाह की निसबत नवाब साहब (शेफ्ता) की सुहबत से ज्यादा फायदा हुआ है।''
हाली सुखन में 'शेफ्ता' से मुस्तफीद हूँ।
'गालिब' का मौतकिद हूँ-मुकल्लद हूँ 'मीर' का।1
मसलन हाली ने शेफ्ता से लाभ उठाया, गालिब के प्रति श्रद्धा भाव रखा और अनुयायी मीर के हुए। हाली ने उर्दू के तीन महान शायरों से खुद को जितना हो सकता था खूब समृद्ध किया। लेकिन 1869 में गालिब और शेफ्ता के इंतकाल के बाद तो जैसे हाली के लिए दिल्ली ही उजड़ गई। जीवन विरान लगने लगा और वे लाहौर चले गये।
हाली को मुंशी प्यारेलाल 'आशोब' देहलवी की सिफारिश पर लाहौर के पंजाब गवर्नमेंट बुक डिपो में नौकरी मिल गई। आशोब साहब गवर्नर पंजाब के यहाँ मुलाजिम थे। लाहौर में हाली का काम था अंग्रेजी के आधुनिक पुस्तकों का संपादन और भाषा-संशोधन करना। चार वर्षों के इस अनुभव के बारे में हाली ने खुद लिखा है कि अंग्रेजी के आधुनिक साहित्य के परिचय से वे बहुत प्रभावित हुए। हाली के लिए यह एक नई रोशनी थी। साहित्य के नये गुण, नये क्षितिज के परिचय से उनके मनोलोक को एक नया आयाम मिला। जो कि वे अंग्रेजी कम जानते थे लेकिन अपनी प्रखर बुद्धि से उन्होंने अंग्रेजी साहित्य के उत्कर्ष को काफी हद तक देख-समझ लिया था। इससे फारसी और उर्दू कविता के आलोचनात्मक अध्ययन का एक नया द्वार खुला। साहित्य और कविता के प्रति इस नये दृष्टिकोण का उन पर गहरा असर पड़ा। लाहौर में उनकी मुलाकात कर्नल हौल राइट से हुई। उनका हाली पर गहरा असर पड़ा। वे आधुनिक सृजन से परिचित हुए। हौल राइट और मौलाना मुहम्मद आजाद ने उर्दू में नये युग की कविता को लेकर नये तरीके से शायरे शुरू किये तो हाली को भी अपनी नयी सृजनात्मक अभिव्यक्ति का एक उपर्युक्त मंच मिल गया। हाली की रचनात्मक सक्रियता की यह शुरूआत थी।
लाहौर में उनका स्वास्थ्य फिर बिगड़ गया और वे चार साल बाद वापस दिल्ली लौट आये। यहाँ उनको कुछ रसूखदार लोगों जिसमें सैयद अहमद भी शामिल थे, के सहयोग से एंग्लो-अरबिक कॉलेज यानी दिल्ली में प्राध्यापक की नौकरी मिल गई। जो उनके जीवन में सबसे अधिक निर्णायक साबित हुई। सन् 1824 से 1857 तक दिल्ली कॉलेज उर्दू नवजागरण के एक बड़े केन्द्र के रूप में उभरा था। ''कॉलेज में उर्दू, अरबी तथा फारसी साहित्य का एक अलग ओरिएंटल विभाग था जो सन् 1848 तक अंग्रेजी विभाग के बराबर बड़ा तथा बहुत लोकप्रिय हो गया था। एंड्रयूज लिखते हैं, ओरिएंटल विभाग बहुत लोकप्रिय हो गया था। उर्दू माध्यम की कक्षाओं में नई अंग्रेजी शिक्षा के शुरू होने से कोई अंतर नहीं पड़ा था। फारसी और अरबी में स्तर बहुत ऊँचा था। नि:संदेह कुछ महान् साहित्यकारों के नाम इस ओरिएंटल विभाग से जुड़े हैं जैसे प्रसिद्ध उर्दू शायर अलताफ हुसैन हाली, उर्दू और फारसी गद्य के विशेषज्ञ नजीर अहमद, अरबी के महान् विद्वान् मौलवी जियाउद्दीन, इतिहासकार तथा कई पुस्तकों के अनुवाद मौलवी जकाउल्ला और खान-ए-जावेद के लेखक मुहम्मत हुसैन आजाद। साहित्यिक गतिविधियों की तुलना में दिल्ली कॉलेज द्वारा प्रेरित पुनर्जागरण, अपनी वैज्ञानिक शिक्षा तथा उससे खुलने वाले नए रास्तों के लिए अधिक प्रसिद्ध है। इसकी यही विशेषता इसे कलकत्ता के पुनर्जारण से अलग करती थी, जहां साहित्यिक शिक्षा पर अधिक बल था।65-66
हाली का इस संस्थान में आना ही उन्हें उर्दू नवजागरण का एक प्रमुख सेनापति बना देता है क्योंकि यह उर्दू में नवजागरण पैदा करने वाला एक सशक्त केन्द्र था। यहाँ उर्दू नवजागरण के कई नायक एक साथ सक्रिय थे। हाली को इस संस्थान में जैसी सोहबत मिली, यहाँ उन्होंने जो सीखा और पढ़ा, वह असाधारण था, मूल्यवान था, जिसने उनकी सोच और सृजन को एकबारगी बदल दिया। इसी दौरान उन्होंने बरखा रुत (1874) और हुब्बे वतन (1874) जैसी रचनाएं लिखी। तेरी एक मुश्ते खाक के बदले लू न हरगिज अगर बहिश्त मिले,
जान जब तक न हो बदन से जुदा कोई दुश्मन न हो वतन से जुदा
देशभक्ति का ऐसा सघन राग तब शायद ही हिन्दी में सुनाई पड़ा हो। यह कोई मामूली बात नहीं थी। ऐसा लबालब देश-प्रेम उस दौर से कहीं नहीं देखने को मिलता-
आप कल्पना कीजिए- 1874 में भारत में कोई आजादी का आंदोलन नहीं चल रहा था। बावजूद उनकी चेतना अधिक परिष्कृत थी और वे समय से बहुत आगे की बातें कर रहे थे।
हिन्द में इत्तफाक होता अगर, खाते गैरों की ठोकरें क्यों कर
कौम तब इत्तफाक खो बैठी अपनी पूंजी से हाथ धो बैठी
एक का एक हो गया बदख्वाह (बुरा चाहने वाला) लगी गैरों की तुम पर पडऩे निगाह
फिर गये भाइयों से जब भाई, जो न आई थी वो बला आई
पांव इकबाल के उखडऩे लगे, मुल्क पर सबके हाथ पडऩे लगे
कभी नादिर ने कत्लेआम किया, कभी महमूद ने गुलाम किया
मकुल्क रौंदे गये हैं पैरों से, चैन किसको मिला है गैरों से
हाली को न दुविधा है न कोई हिचक। एकता के अभाव में हम सर्वस्व हार गये। यह सत्ता जो हमे गुलाम बनाये हुए है वह 'जो न आई थी वो बला आई'। वे सैयद अहमद की तरह विदेशी सत्ता को वरदान नहीं मानते। उनकी शरणस्थली नहीं तलाशते। वे तो उसे बला मानते हैं। भारत-पाकिस्तान के विभाजन के वक्त नादिर और मुहम्मद गजनी की तारीफ में कशीदे पढऩे वालों के खिलाफ हाली उनकी भत्र्सना करते हैं। ये पैरों तले देश को रौंदने वाले लुटेरे हैं। गौर करने वाली पंक्ति है- चैन किसे मिला है गैरों से। ये अंग्रेज गैर हैं, इनसे सुख नहीं मिल सकता, ये शांति नहीं ला सकते। डंके की चोट पर देश-प्रेम की ऐसी बुलन्द आवाज उस युग में हाली के सिवा और किसकी थी? वे बड़ी बेरहमी से भारतीय समाज का पोस्टमार्टम करते हैं - अमीरों पर चोट करते हैं-
बच्चे जब घर में बिलबिलाते हैं, रोके माँ-बाप को रुलाते हैं
कोई फिरता है माँगता दर दर, हैं कही पेट से बंधा पत्थर
कौम मरती है भूक से तो मरे, काम उन्हें अपने हलवे माँढ़े से।
इस करुणा और मार्मिकता के भीतर विस्फोटक गुस्सा भी है। 'फाजिलों को है फाजिलों से इनाद, पंडितों में पड़े हुए है फसाद।' कैसे सभी आपस में बँटे हुए हैं। एक दूसरे से ईष्र्या-द्वेष कर रहे हैं।
रहते हो अहले इल्म हैं इस तरह, पहलवानों में लाग हो जिस तरह
ईदों वालों का है अगर पट्ठा, शेख वालों में जा नहीं सकता
शायरों में भी यही तकरार, खुशनसीबों को है यही आजार
लाख मेकों का क्यों न हो एक नेक, देख सकता नहीं है एक को एक
यह विभाजित समाज द्योतक है। आगे वे ललकारते हैं कि तुम समय की मांग को समझो। पहचानों और देश के लिए-
कुछ दिनों ऐश में खलल डालो, पेट में जो है सब उगल डालो
इल्म को कर दो कूं-बकू, अरमां हिन्द को कर दिखाओं इंगलिस्तां
मां खुदा से यह मांगती है मुराद, कौम पर हो निसार हो औलाद
अपने इल्म को बाँटों। देश का बलिदान देने को प्रेरित करती ये अनमोल पंक्तियां हाली के दुर्लभ व्यक्तित्व और योगदान का साक्ष्य रखती है। इस समय तक कविता और गद्य में उन्होंने काफी कुछ लिख दिया था और उनकी कई पुस्तकें भी छप चुकी थीं। एक तरफ परंपरा की गहरी जड़ें और दूसरी ओर आधुनिकता का संयोग। एक तरह से हाली के व्यक्तित्व में नवजागरण के नायकत्व की सारी तैयारियां मुकम्मिल हो चुकी थीं। अब उर्दू और उसकी जनता उनसे नयी भूमिका की आशा कर सकती थी। दिल्ली प्रवास के दौरान उनकी निकटता मुस्लिम नवजागरण के अग्रदूत सैयद अहमद खान से काफी बढ़ गई थी। जबकि दोनों का व्यक्तित्व अलग था एक बेहद दबंग तो दूसरा बेहद विनम्र। सैयद साहब ने उनकी प्रतिभा बखूबी पहचान ली थी। उन्होंने मुस्लिम कौम की परस्ती, पतन और जहालत का हवाला देकर उन्हें ऐसी रचना करने की प्रेरणा दी, जो उनको अपनी महान विरासत की याद दिलाये। उनको झकझोरकर जगाये, उनमें नयी जागरुकता और जोश पैदा करे। यह उन्हीं की प्रेरणा थी कि हाली में 1879 में अपनी मशहूर रचना मद्दो जजरे-इस्लाम लिखी जो मुसद्दसे-हाली के नाम से मशहूर हुई। इस रचना का इतना जबर्दस्त असर पड़ा कि लोग इसे चौक-चौपाल में ढोल-मंजीरे के साथ गाते थे। कव्वाल इसे मेले-बाजार में गाते थे। नर्तक-नर्तकियों की जुबान तक इस रचना की पहुंच थी और इसके पच्चीसों संस्करण लगातार प्रकाशित हुए और बिके। इस रचना ने मुस्लिम कौम में नवजागरण की एक लहर पैदा कर दी। यह सच है कि यह पुस्तक हाली ने सैयद अहमद साहब के आग्रह पर लिखी थी। हाली साहब इतने सहज और विनम्र थे कि उनकी छबि पूरी तरह सैयद साहब के हमजबान की बन गई।
दरअसल अलताफ हुसैन हाली और सैयद अहमद का रिश्ता ऐसा नहीं था कि उसे इस शक्ल में विश्लेषित किया जाये। हयाते जावेद में सैयद अहमद के जीवन-चरित लिखने में उनकी तटस्थ ईमानदारी और यथार्थ आकलन की कोशिश का अंदाजा उनकी भूमिका से होता है। उनके व्यक्तित्व की ठीक-ठाक पहचान के लिए उन्होंने जिस आलोचनात्मक दृष्टि की चर्चा की है उसमें उनका समर्पण नहीं, बल्कि संतुलित विवेक का पता चलता है। उन्होंने साफ कहा है कि ''यह आवश्यक है कि उनका सोना कसौटी पर कसा जाय और उसका खरापन ठोक-बजा कर देखा जाय। वह पहला व्यक्ति है जिसने धार्मिक साहित्य में टीका-टिप्पणी की नींव रखी है। इसलिए यही उचित है कि सबसे पहले उसी के जीवन में उसकी पैरवी की जाय। जबकि हम सर सैयद के मासूम होने का न तो दावा करते हैं और न उसे प्रमाणित करने का इरादा रखते हैं। ङ्गङ्गङ्ग जरूरी है कि उनके हर-एक काम को आलोचना की दृष्टि से देखा जाय।'' (16-17) इस भूमिका को पढ़ते हुए यह बात बार-बार प्रमाणित होती है कि हाली उनके हायात और कारनामों के चमत्कारिक गुणों से प्रभावित हैं। वे उसे युगांतरकारी तो मानते ही हैं बल्कि खुद उससे सहमत और गहरे जुड़े होने का भी प्रमाण देते हैं साथ ही साथ यह बात भी गौर करने वाली है कि वे उसे कसौटी पर कसना चाहते हैं और आलोचनात्मक नजरिये से देखने पर जोर देते हैं। वह आगे लिखते हैं -
''वह (सैयद अहमद) हमको विश्वास दिलाते हैं कि थोड़ी सी शिक्षा और बहुत सा अनुभव तथा पूरी तरह सच्चाई, यह तीनों मिलकर किसी काम को बंलंदियों तक पहुँचा सकते हैं जो बड़े-बड़े दार्शनिकों और बुद्धिजीवियों से भी संभव नहीं। वह हमको कट्टरपंथ से अलग कर दूसरे समुदाय के साथ मेल-मिलाप से रहना सिखाता है। वह हमें मित्रों के साथ चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान, ईसाई हों या यहूदी, सच्चाई और शिष्टाचार के साथ मिलना सिखाता है।(13) इससे केवल सैयद अहमद के व्यक्त्वि पर रोशनी नहीं पड़ती, बल्कि इस सोच की पहचान करने वाली हाली साहब की सोच और व्यक्तित्व पर भी पड़ती है। उनकी अभेद मानसिकता और विनम्रता का प्रभाव उनकी भाषा पर साफ दिखता है- ''मैंने सोचा कि वैसे तो कौम में लायक आदमी दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं मगर मजदूरों की कमी होती जा रही है।'' आगे उन्होंने एक कहावत का इस्तेमाल किया है- ''जोहरियों से बाजार भरा पड़ा है मगर कान खोदने वाले नदारद हैं।'' उनके गद्य में सादगी और ठेठपन का जबर्दस्त सौन्दर्य है। इतना साफ-सुथरा, सहज और आत्मीय गद्य, जो बेरोकटोक अंदर उतर आता है। उनका नजरिया भले आलोचनात्मक हो, मगर दिल बिल्कुल साफ-सफ्फाक! हाली की ऊंचाई उनके गद्य में ही दिखाई देती है। ऐसे में उनके बारे में ऐसी सोच की कोई गुंजाइश ही नहीं। तारीफ की बात यह कि उनके स्वभाव की विनम्रता उनकी दृष्टि की आलोचनात्मकता को कहीं से प्रभावित नहीं करती। मुझे लगता है जब हाली की बहाली दिल्ली कॉलेज में हुई, तो उनकी निकटता सैयद साहब से काफी सघन हो गई। सैयद साहब उनकी माली हालत से परिचित थे। जब 1888 में हैदराबाद के प्रधानमंत्री अलीगढ़ विश्वविद्यालय में आये तो सैयद साहब ने सिफारिश करके उनको 75 रुपये की मासिक वृत्ति दिलवा दी, जो बाद में 100 रुपये हो गई। संभव है सैयद साहब की यह इनायत तत्कालीन समय में उर्दू के कुछ दूसरे हकदारों को अखर गई हो, क्योंकि इसको लेकर उर्दू जगत् में उनकी खिल्ली तक उड़ाई गई। सज्जाद हुसैन ने उन्हें निशाने पर लेकर यह शेर लिखा-
सैयद सरगुजिश्त को हाली से पूछिये।
गाजी मियां का हाल उफाली से पूछिये।।
(तकनीबी हाशिये प.237 गोय, 719)
मजनूँ गोरखपुरी ने लिखा कि भले ही मुसद्दस की प्रतियाँ हर मुसलमान के यहाँ आल्मारी में रखी मिल जाये लेकिन बमुश्किल दो-चार ऐसे निकलेंगे जो उसे पढ़ते भी हों।718 लेकिन मुसद्दस को हिन्दी में अनूदित करने वाले जफर अंसारी जफर ने दोनों के बीच अंतर को हिगराते हुए इस बात का खंडन किया है। उनके अनुसार सैयद साहब यूरोप को इस्लाम से श्रेष्ठ समझते थे। इसलिए वे चाहते थे कि हाली इस्लाम का ऐसा रूप सामने लाये, जो यूरोप की कसौटी पर खरा उतरे। लेकिन हाली बिना मुखर प्रतिवाद किये इस्लाम को इस्लाम की कसौटी पर रखकर ही उसकी श्रेष्ठता सिद्ध करने के पक्षधर थे। इस्लाम की विरासत में उनको कोई कमी नहीं दिखती थी, वे तो मौजूदा पस्ती, निराशा और पतन से उबार कर इस्लाम की महान् विरासत की पुनप्र्रतिष्ठा चाहते थे। वे किसी स्तर पर इस्लाम को संशोधित कर यूरोप की निगाह में प्रशंसा पात्र बनने के हक में नहीं थे, वे इस्लाम का पुनरोद्धार चाहते थे। जफर साहब ने हाली के सैयद अहमद और उनके काम से यह कथन उद्धरित किया है कि - ''मैं न कभी पहले उनका हमजबान हुआ और न अब हूँ और उम्मीद है कि आगे को भी न हूँगा'' (मकालते-हाली पृ. 11)19 हाली जिस मुस्लिम कौम में नवजागरण के संवाहक थे, उसे हर हाल में चेतस और जागरूक करने के हिमायती थे। वे इस्लाम और मुस्लिम कौम की तत्कालीन दुर्दशा से आहत थे। मुसद्दस को गौर से पढ़ें तो हमें हर जगह उनके आहत मन और गहरे खेद की कसक महसूस होगी। उनके भीतर गहरी पीड़ा है, सघन दु:ख है और इसे बदल देने की ईमानदार छटपटाहट भी है। अगर मुसद्दस को उर्दू नवजागरण का महाकाव्य कहा जाये, तो कोई गलत बात न होगी। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि मुसद्दस की अनुकृति के रूप में ही हिन्दी में मैथिलीशरण गुप्त ने भारत-भारती लिखी। हाली ने लिखा - कि कल कौन थे जो आज क्या हो गए तुम/अभी जानते थे अभी सो गये तुम। मैथिलीशरण गुप्त की पक्तियाँ- हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी/आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएं अभी। इस तरह हाली में हिन्दी नवजागरण को भी गहरे प्रभावित किया। उन्होंने लोगों की पीठ नहीं थपथपाई, झकझोर कर जगाया - दुख जहाँ में नहीं कोई ऐसा/कि जिसकी दवा हक ने की हो न पैदा। उन्होंने एक आत्मविश्वास पैदा किया। पूरे उर्दू नवजागरण में ऐसी एक भी रचना नहीं, जिसका असर लोगों पर ऐसा पड़ा हो जैसा मुसद्दस का पड़ा। अगर कोई हाली के पूरे काव्य साहित्य से सरसरी तौर भी गुजरेगा तो उसे काव्य सौष्ठव और दूसरे उर्दू कवियों की तुलना में कला और सौन्दर्य के नजरिये से शायद प्रभावित न करें, मगर अंतर्वस्तु और विचार की दृष्टि से वे असाधारण लगेंगे। ऐसे में निजी स्तर पर उनका सैयद अहमद से जैसा भी रिश्ता रहा हो, विचार और सृजन को लेकर वे सैयद अहमद के विचारों का अतिक्रमण कर बहुत आगे दिखाई पड़ेंगे।
हाली की भाषा आमफहम बोलचाल वाली है। संभवत: नजीर के बाद ऐसी भाषा शायद ही किसी उर्दू शायर की हो। उनमें प्रेम की गहन अनुभूतियाँ भी हैं। सरल भाषा में भी वे गहरी मार्मिकता पैदा कर देते हैं। लेकिन उनकी रचनाओं का मुख्य स्वर नैतिक सुधार और राष्ट्रीयता का ही है। उस समय भारत में जो सुधार और उन्नति की लहर चल रही थी उसका चाक्षुष अनुभव उनकी रचनाओं में मिलता है। वे सोद्देश्य सामाजिक जागरुकता को स्वीकार करते थे। जहाँ तक उनकी सोच का मसला है, उनमें देशभक्ति और राजभक्ति के द्वैत मौजूद हैं। यह दरअसल उस युग की ही प्रवृति थी जो हिन्दी-उर्दू दोनों भाषाओं के लेखकों में समान रूप से देखने को मिलती है।
1887 में उनकी दूसरी रचना 'मुनाजाते-बेवा' छपी-उसमें भी समाज के नैतिक सुधार और पुनर्जीवन के स्वर थे। 'मजजू-ए-नज्म हाली' में उनकी छोटी बड़ी कविताएं संग्रहित हुई। 1904 में उन्होंने बेमन से 'शम्सुल-उलमा' की उपाधि स्वीकार की। 1914 में अपने इंतकाल के पहले उन्होने उर्दू के पद्य और गद्य में अनेक ऐतिहासिक रचनाएँ दे दी थीं। उनकी रचनाओं में मसनवियाँ- 'मनाजिरा तअस्सुबो-इंसाफ', 'रहमो-इंसाफ', 'बरखा रूत', 'नैशाते उम्मीद', 'हुब्बे वतन' हैं। इसके अलावे 'मुसद्दते हाली', 'कुल्लियाते-हाली', 'मुनाजतो बेवा और चुप की दाद' और फारसी कविता संग्रह है। उनकी आलोचनात्मक पुस्तक 'मुकद्दमए-शेरो-शायरी' तथा गालिब और हकीम महमूद खां के मरसिये प्रसिद्ध हैं। जीवनी लेखन में उनकी यादगार पुस्तकें 'यादगार-ए-गालिब' 'हयाते जावेद' जो सर सैय्यद अहमद की जीवनी है तथा 'हयाते सादी' है। 'मजालिसुन्निसा', 'तुरियाक', 'शवाहिदुलइस्लाम' आदि भी उनकी रचनाएँ है। फिराक गोरखपुरी ने उनकी कविताओं के बारे में कहा है कि हाली जैसा प्रतिभाशाली कवि नहीं होता तो नवीन स्वाभाविकतावादी आंदोलन कभी सफल नहीं होता। नवजागरण का स्पष्ट संदेश देने वाली उनकी कविताओं में उर्दू काव्य परंपरा की वह नजाकत, शब्दाडंबर और आलंकारिता नहीं थी, जिसके कारण उनका विरोध भी हुआ लेकिन उन्होंने अपनी राह कभी नहीं बदली। इसलिए उनकी उपदेशात्मक कविताओं में उर्दू काव्य वाला पाठ-सुख कम मिलता है। उनकी रचनाओं में एक उपदेशक और शिक्षक हमेशा मौजूद रहा है। लेकिन यह बात भी सच है कि उनकी कविताओं में आने वाले समय की पदचाप सुनाई पड़ती है। कविता के रूप और अंतर्वस्तु को लेकर उनकी सोच बिल्कुल अलग थी।
हाली ने जिस तरह उर्दू साहित्य में उर्दू कविता के प्रचलित ढर्रे और ढाँचे को तोड़कर एक सर्वथा नई शैली विकसित की, उसी तरह उर्दू आलोचना में भी उन्होंने मुहम्मद हुसैन आजाद की तरह एक नई राह कायम की। उनकी भाषा बेहद सरल लेकिन वैचारिक नजरिये से गंभीर थी। उनकी आलोचना भी उर्दू के लिए एकदम नई शैली वाली थी। इसमें संदेह नहीं कि वे अपने समय से आगे थे और वे उर्दू में नये युग का सूत्रपात कर रहे थे। हाली ने जीवनी साहित्य में उर्दू को समय से पहले की असाधारण ऊँचाई पर पहुँचा दिया। सैयद अहमद खां, गालिब और सादी की उन्होंने जो जीवनियाँ लिखी हैं, उसका ताना-बाना बिल्कुल आधुनिक और वैज्ञानिक था। उसमें उनकी रचनाओं, कारनामों और जिन्दगी के पहलुओं का बारीक विश्लेषण भी था। उन पर यह आरोप लगता है कि वे सैयद अहमद खां के विचारों के अंधसमर्थक थे। लेकिन यह सच नहीं है। एक तो उनमें प्रगतिशील तत्व ज्यादा हैं दूसरे वे उनके विपरीत अपनी मूल अस्मिता और आस्था के प्रति पूरी तरह सचेत थे। पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान और आधुनिकता को तो वे देश और समाज की प्रगति के लिए जरूरी मानते थे, मगर सांस्कृतिक और धार्मिक रीति-रिवाजों के मामले में वे किसी पाश्चात्य प्रभाव को सख्ती से नकारते भी थे। वे धार्मिक ईष्र्या-द्वेष को व्यक्ति तथा समाज का शत्रु समझते थे। वे धार्मिक द्वेष त्यागकर अपनी संस्कृति, रीति-रिवाज तथा रहन-सहन में युगानुकूल सुधार को जरूरी मानते थे। उन्होंने 1874 में ही 'मजलिसुन्निसा' नाम से स्त्री शिक्षा को लेकर भी एक महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी थी। मुस्लिम कौम को देखते हुए यह एक क्रांतिकारी काम था। वे आजादी को सौभाग्य और परतंत्रता को अपमानजनक मानते थे। उनकी सोच थी कि गुलाम जब तक आजाद नहीं होता, वह नीच और तिरस्कृत समझा जाता रहेगा। वे स्वदेशी आंदोलन के भी समर्थक थे। वे कहते थे कि स्वदेशी आंदोलन जैसे हिन्दुओं के लिए लाभकर है, वैसे ही मुसलमानों के लिए भी। वे मानते थे कि राष्ट्र वह समुदाय है, जिसकी भाषा, धर्म और प्रजाति एक हो। लेकिन वे हिन्दु-मुस्लिम एकता के समर्थक थे। 'मजमुआ नज्म हाली' का यह पद है -
हिंद में इत्तिफाक होता अगर खाते गैरों की ठोकरें क्योंकर,
कौम जब इत्तिफाक खो बैठी अपनी पूँजी से हाथ धो बैठी,
हो मुसलमान इसमें या हिंदू, बौद्ध मजहब हो या कि हो ब्रह्म,
जाफरी होवे या के हो हनफी या के हो विष्णोई, जैन मत होवे,
सबको मीठी निगाह से देखो, समझो आँखों की पुतलियाँ सबको।
यह दुर्लभ स्वर हाली को असाधारण रूप से महत्वपूर्ण बना देता है। देश की खैर हमारी अवाम की एकता में है। हम सभी को आँख की पुतलियाँ समझेंगे। मीठी निगाह का बिम्ब जितना मोहक है उतना ही आत्मीय और व्यंजक भी। हाली की यह सोच सैयद अहमद के सोच में आये बदलाव की तरह बदलती नहीं है, वह ताउम्र उनके साथ रहती है। वे इस बात को गहराई से महसूस करते ही नहीं कराने की कोशिश भी करते हैं कि एकता का अभाव ही हमारी असल समस्या है। इस पर वे बार-बार जोर देते हैं। सभी भिन्न मतों वाले भारतीयों को आखों की पुतलियाँ मानने वाले हाली को सिर्फ मुस्लिम उन्नायक मानकर उनके योगदान को सीमित करने वालों को सबसे माकूल जवाब महान् शिक्षाविद् और पूर्व राष्ट्रपति जाकिर हुसैन साहब ने दिया है। उनके अनुसार देश-भक्ति देशवासियों की नि:स्वार्थ सेवा और बेलाभ सेवा में है। लिखते हैं - ''मेरा तो ख्याल है कि हिन्दुस्तान के साहित्य में पहली बार हाली ही ने देशभक्ति की सही अवधारणा का उपदेश दिया है और व्यक्तिगत हितों की पूजा के अंधकार में नि:स्वार्थ सामूहिक सेवा का दीया रोशन किया है और जब तक हमारे देश की आम राष्ट्रीय भाषा उर्दू जिन्दा है उसकी रोशनी में सही देशभक्ति का रास्ता हिंदियों को मिलती रहेगी।'' जिस काल में मुसद्दस तथा ऐसी अन्य रचनाओं के द्वारा वे नवजागरण का इंकलाब ला रहे थे उनमें एक कौम विशेष को लेकर उनकी भूमिका तब तक सवालों के घेरे में नहीं आ सकती, जब तक वह दूसरी कौम के प्रति विद्वेष भरने से बची है या उससे सायास परहेज करती है। इसी बात को लेकर जाकिर साहब ने आगे लिखा है - ''वह हाली जिसने देश में सबसे पहले (अर्थात स्वयं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन से कई वर्ष पहले) देशभक्ति की ऐसी विस्तारित अवधारणा हिन्दुस्तानियों के सामने पेश की जिसमें इस देश के सब वासी शामिल हो सकें, जिसने व्यक्तिगत को सामूहिक सेवा का सबक सिखाया। जिसकी कलम की जबान ने वो कौन सी संस्था और कौन सा तबका है जिसके दिल पर नश्तर का काम नहीं किया है पर जिससे एक शब्द, हाँ, एक शब्द ऐसा न निकला जिससे किसी हम वतन का दिल इसलिए दुखा हो कि वह किसी दूसरे धर्म पर चलताहै, जिसने अपने व्यक्तिगत जीवन में विभिन्न धर्म के लोगों से मुहब्बत प्यार का वह ढंग अपनाया जिसके नमूने हाली के मानस में संकीर्णता की खोट तलाशी ही नहीं जा सकती। यह तो सच है कि गुरबत और जलालत की जिन्दगी जीने वाली कौम को उन्होंने एकबारगी झकझोर दिया। बदलाव के इस इंकलाब ने ही उन्हें अपने युग में नवजागरण का महानायक बना दिया। मुसद्दस काव्य-सौष्ठव की दृष्टि से श्रेष्ठ है या सामान्य, यह विवाद की बात है लेकिन उसकी भूमिका अपने समय में असाधारण थी-इसमें कोई विवाद नहीं है।
हाली ने कविता, आलोचना और जीवनी के क्षेत्र मे युग प्रवत्र्तन का काम किया। उनमें अपनी सोच, अपने विश्वास को कहने का भरपूर साहस था। उनका जीवन जितना सहज और सरल था, वैसी ही उनकी भाषा भी थी। वे समय, समाज और जीवन की जटिलताओं को करीब से जानते थे। उनका मानना था कि उर्दू को ठीक से जानने के लिये हिन्दी और प्राकृत का ज्ञान होना जरूरी है। इतिहास का वह ऐसा दौर था, जब हिन्दू-उर्दू विवाद अपने चरम उत्कर्ष पर था। दोनों भाषाओं के पक्षधर दंगाई मुद्रा में एक-दूसरे के खिलाफ जहर उगल रहे थे। वातावरण इतना विषाक्त था कि तथ्य, तर्क और विवेक गौण पड़ गये थे। भारतेन्दु से ही यह सिलसिला शुरू हुआ था और उनके जैसे प्रबुद्ध युग प्रवत्र्तक ने उर्दू को कोठे वाली भाषा तह कह दिया था। दोनों पक्ष सरकारी संरक्षण के लिये एक-दूसरे की काट में लगे थे। ऐसे हालात में भी मौलाना अलताफ हुसैन हाली ने अपने स्वभाव की विनम्रता और विवेक को बनाये रखा। उनके अनुसार उर्दू कविता एक ऐसी बैलगाड़ी की तरह है, जिसके बैल अरबी-फारसी हैं और पहिये हिन्दी। निश्चित रूप से कोई भी बैलगाड़ी बैल और पहिए के बगैर नहीं चल सकती। हिन्दी-उर्दू की अभेदता, अंतरंगता और सहयात्रा का ऐसा प्रतीकात्मक उल्लेख इस दौर में एक बड़ी बात थी। यह प्रतीक उस समय का प्रतिबिम्ब था जो उन्होंने अपनी मशहूर पुस्तक मुकद्दमा-ए-शेर-ओ-शायरी में लिखी थी।
''जैसा कि विदित है, उर्दू भाषा की नींव हिन्दी भाषा पर रखी गई है। उसकी सारी क्रियाएं, सारे वर्ण और अधिकांश संज्ञाएँ हिन्दी से ली गई हैं और उर्दू कविता की नींव फारसी पर रखी गई है, जो अरबी कविता से प्रभावित है, फिर उर्दू भाषा में संज्ञाओं का बड़ा भाग अरबी और फारसी से लिया गया है। अत: उर्दू का जो कवि हिन्दी भाषा बिल्कुल नहीं जानता और केवल अरबी-फारसी के सहारे गाड़ी चलाता है, वह मानों अपनी गाड़ी बिना पहियों के गन्तव्य स्थान तक पहुँचाना चाहता है और जो अरबी-फारसी नहीं जानता और केवल हिन्दी भाषा अथवा केवल मातृभाषा के बल पर इस भार का वहन करता है, वह एक ऐसी गाड़ी ठेलता है, जिसे बैल नहीं जोते गए।''(सांझी-66)
इसी तरह एकदम आवेगहीन होकर, बिना पक्षधरता के उन्होंने भाषा के भीषण शोरगुल वाले माहौल में वास्तविक यथार्थ को सीधे-सीधे रख दिया है-बिलकुल सहूलियत वाली शांत जुबान में।
सारांशत: वे भविष्य पर गहरी नजर डाले अपने पांव मजबूती से परंपरा पर रोपे रहने वाले रचनाकार थे। डा. एहतेमाम हुसैन ने लिखा है कि - ''हाली को बदलती हुई सभ्यता का प्रतिनिधि कहना असंगत न होगा। वे न तो पुरानी बातों पर आग्रहपूर्वक अड़े रहने के पक्ष में थे और न बिना सोचे-समझे नयी बातों को ग्रहण करने पर।''
आधार ग्रंथ-
1. हयाते-जावेद - मौलाना अल्ताफ हुसैन 'हाली'
2. मुसद्दसे-हाली - संपादन जाफर अंसारी 'जफर'
3. इस्लाम और आधुनिक बारत - प्रो. मुकुट बिहारी लाल
4 उर्र्दू भाषा और साहित्य - फिराक गोरखपुरी
5. ऊर्दू साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास - एहतेशाम हुसैन
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