आजादी के बाद करीब आई हिंदी और उर्दू
बंटवारे के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच भले ही बेगानियत बढ़ी हो, लेकिन इस दौरान दक्षिण एशिया की दो प्रमुख जबानें हिंदी और उर्दू एक-दूसरे के करीब आई। पाकिस्तान के उर्दू अदब के एक अफसानानिगार के अनुसार दोनों देशों के बीच सियासी तौर पर भले ही दूरियां रही हों लेकिन दोनों भाषाओं की नजदीकियां बढ़ी हैं और इस दरम्यान बड़ी संख्या में हिंदी रचनाओं का उर्दू में तर्जुमा हुआ है।पाकिस्तान के ख्यातिप्राप्त अफसानानिगार इंतजार हुसैन ने साहित्य अकादमी द्वारा पहली प्रेमचंद फेलोशिप के लिए चुने जाने पर खुशी का इजहार करते हुए कहा कि प्रेमचंद हिंदी और उर्दू अदब में एक ऐसे पुंज की हैसियत रखते हैं जहां दोनों जबानें गले मिलती हैं। प्रेमचंद उर्दू लघुकथा के पितामह हैं। उन्होंने बताया कि उर्दू गल्प कथा को मगरिब की दास्तानें, अरब की दास्तानें और हिंदुस्तान के पुराने क्लासिक ने प्रभावित किया। बेताल पच्चीसी, महाभारत, जातक कथाओं और पंचतंत्र का उर्दू में तर्जुमा हुआ है और उसका असर दिखाई देता है। उन्होंने बताया कि जिस प्रकार हिंदुस्तान में मंटो, कृष्णचंदर, फैज और जमील हाशमी जैसे उर्दू अदब के बड़े नामों को पढ़ने वाले है। उसी तरह पाकिस्तान में भी प्रेमचंद और निर्मल वर्मा सरीखे हिंदी के बड़े हस्ताक्षरों की अनुदित कृतियों को बड़ी शिद्दत के साथ पढ़ा जाता है। बीते दिनों पाकिस्तान में निर्मल वर्मा के साहित्य का उर्दू तर्जुमा पाठकों ने बड़े चाव से पढ़ा और सराहा। उर्दू अदब के सशक्त हस्ताक्षर इंतजार हुसैन का कहना है कि दोनों तरफ के पंजाब और भारत के उत्तरप्रदेश के लोगों ने विभाजन की आग को सबसे ज्यादा झेला और यही वजह है कि इस क्षेत्र के लेखकों के साहित्य में बंटवारे की तपिश सबसे ज्यादा महसूस होती है। उन्होंने कहा कि भारत के मुकाबले पाकिस्तान के सियासी हालात आजादी के बाद से ही उथल पुथल से भरे रहे जिसके चलते हिंदुस्तानी साहित्य के मुकाबले पाकिस्तान का उर्दू अदब सियासत के मसाइल पर ज्यादा गंभीरता के साथ लिखता रहा। हुसैन ने बताया कि उर्दू अदब में गल्प कथा को वह मकाम हासिल नहीं हो सका जो हिंदी साहित्य में हासिल है। जैसे कि अरेबियन नाइट (अलिफ लैला) जब मगरिब में ख्यात हो गई तब उसे उर्दू अदब ने स्वीकार किया। पाकिस्तान की इलाकाई जबानों पंजाबी, सिंधी, बलूची और पश्तो का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इन जबानों में बुल्ले शाह, वारिज शाह और अहमद राही जैसे बड़े नाम हुए हैं, लेकिन बंटवारे के बाद इन भाषाओं के साहित्य में काफी कुछ लिखा गया। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद से पहले के उर्दू अदब में आम तौर पर शहरी जिंदगी का ही वर्णन मिलता है। प्रेमचंद पहले अफसानानिगार थे, जो गांव की जिंदगी को उर्दू अफसाने में लेकर आए। उन्होंने कहा कि मगरिब के देश दक्षिण एशिया के अंग्रेजी में लिखे जा रहे साहित्य को तीसरी दुनिया का साहित्य बताते हैं जबकि हमारे यहां तमाम भाषाओं में लिखे जा रहे साहित्य के तर्जुमा का जिक्र भी नहीं करते। रवींद्रनाथ टैगोर की अमर रचना गीतांजलि के तर्जुमे को नोबेल मिला था, जबकि वर्तमान साहित्य के साथ ऐसा नहीं हो पा रहा है। इस पर हुसैन ने कहा कि टैगोर को डब्ल्यू जी गेट्स जैसे लोग और साहित्य के कद्रदां मगरिब में मिल गए थे, जिन्होंने उनके गीतांजलि का अनुवाद किया जिस कारण उनको दुनिया में वह मकाम हासिल हुआ जो औरों को नहीं मिल सका। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से विभाजन के वक्त पाकिस्तान गए इंतजार हुसैन ने कहा कि घर छोड़ने के बाद ही उसका महत्व समझ में आता है। 35 बरस बाद अपने घर की मिट्टी को छूने की हसरत लेकर हिंदुस्तान आए हुसैन यह ठानकर आए थे कि वह किसी से अपने घर गांव का रास्ता नहीं पूछेंगे और पुरानी यादों के सहारे खुद ही वहां तक पहुंच जाएंगे, लेकिन वक्त ने सब कुछ इतना बदल दिया था कि वह बुलंदशहर के करीब स्थित अपने गांव डिबाई में वह जगह नहीं ढूंढ पाए जहां उनका घर हुआ करता था। हिंदुस्तान से आखिरी खत, शहर-ए-अफसोस और वो जो खो गया के लेखक हुसैन को उर्दू अदब में अपने अलहदा अंदाज के लिए जाना जाता है। उन्होंने बताया कि उनकी कहानियों से हिंदुस्तान की महक आती है क्योंकि उनका बचपन और जवानी यहीं गुजरा जिसके नक्श उनके दिलों दिमाग पर आज भी दर्ज हैं
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