सआदत हसन मंटोः जितने लोकप्रिय, उतने विवादित

   उर्दू अदब में मंटो सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले और बेहद विवादास्पद रचनाकार रहे जिन्होंने विभाजन से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखा और अदब को ठंडा गोश्त, खोल दो, टोबा टेक सिंह, काली सलवार जैसी चर्चित कहानियों के रूप में कई नायाब तोहफे दिये।
उर्दू अदब में मंटो सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले और बेहद विवादास्पद रचनाकार रहे जिन्होंने विभाजन से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखा और अदब को ठंडा गोश्त, खोल दो, टोबा टेक सिंह, काली सलवार जैसी चर्चित कहानियों के रूप में कई नायाब तोहफे दिये। मंटो के जीवनकाल में उनकी रचनाओं के खिलाफ मुल्ला मौलवियों ने तमाम फतवे जारी किये। अश्लीलता के आरोप में उन पर कई बार मुकदमे चले। लेकिन इन सब अड़चनों से मंटो हर्गिज हतोत्साहित नहीं हुए और उनकी कलम से जीवन की नंगी सचाई का निकलना जारी रहा।
उन्होंने समाज के हमेशा उन पात्रों और उन परिस्थितियों के बारे में कलम चलाई जिन पर आम लोग बात करने से परहेज करते हैं। समीक्षकों के अनुसार मंटो का साहित्य अपने समय से बहुत आगे था। यही वजह है कि उनकी रचनाओं की प्रासंगिकता आज भी कम नहीं हुई है और उनकी लोकप्रियता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। सआदत हसन मंटो ने अपने 43 साल के छोटे से जीवन में रेडियो की नौकरी की फिल्मों की पटकथा लिखी पत्र पत्रिकाओं का संपादन किया तथा कहानियां उपन्यास निबंध और नाटक लिखे। मंटो ने जिस तरह से अपनी रचनाओं में कभी कोई समझौता नहीं किया ठीक उसी तरह उन्होंने अपना जीवन भी अपनी शर्तों पर जिया। आजमगढ़ के उर्दू अदब रिसर्च सेंटर के उप प्रमुख मौलाना मोहम्मद उमेर के अनुसार मंटों ने अपने लेखन के जरिये समाज की कड़वी सचाइयों को सामने रखा। उनका लेखन गजब का था। उनके अफसानों को यदि एक बार पढ़ना शुरू किया जाये तो उसे बीच में नहीं छोड़ा जा सकता। उमेर ने कहा कि मंटो के खिलाफ फतवे दिये गये कई मुकदमे चले लेकिन उनकी कलम नहीं रूकी। उनकी कहानियों पर फिल्में बनी हैं। उन्होंने कहा कि मंटो के बगैर उर्दू अफसाना निगारी का इतिहास अधूरा है।
मंटो का जन्म 11 मई 1912 को पंजाब के लुधियाना में हुआ। स्कूली शिक्षा के दौरान ही उन्हें साहित्य की चसक लग गयी थी और उन्हें अंगेजी रूसी और फ्रांसीसी उपन्यासकारों की रचनाएं काफी पसंद आयी। शुरूआत में उन्होंने कुछ विदेशी रचनाकारों की कृतियों का उर्दू में अनुवाद किया। उनका पहला कहानी संग्रह आतिश पारे 1936 में आया। इसी साल वह बंबई चले गये और वहां उन्होंने साहित्यक पत्रिका का संपादन करने के साथ साथ फिल्मों के लिए संवाद और पटकथा लेखन शुरू कर दिया। बंबई के बाद मंटो ने दिल्ली का रूख किया और यहां उन्होंने रेडियो के लिए काम किया। करीब दो साल की नौकरी के बाद वह बंबई वापस चले गये। बंबई के दूसरे प्रवास में उन्होंने 'काली सलवार' और 'बू' जैसी मशहूर कहानियां लिखी। इसके अलावा उन्होंने मिर्जा गालिब जैसी कुछ फिल्मों के लिए पटकथा भी लिखी। भारत विभाजन के बाद 1948 में मंटो पाकिस्तान चले गये। अगले सात वर्ष उन्होंने लाहौर में बिताये। इस दौरान उन्होंने 'ठंडा गोश्त' और 'खोल दो' सहित तमाम चर्चित कहानियां लिखी। उन पर अश्लीलता के मुकदमे भी चले। लेकिन इन मुकदमों के बावजूद मंटो का हौसला नहीं टूटा।
   पाकिस्तान में आर्थिक तंगी शराब के कारण बिगड़ते स्वास्थ्य कट्टरपंथियों के बढ़ते विरोध के बावजूद मंटो की कलम उर्दू को एक से बढ़कर एक नायाब तोहफे देती रही। लेकिन भौतिक शरीर की भी एक सीमा होती है जो आखिरकार शराब के आगे हार गयी और उर्दू के इस महान कहानीकार ने 18 जनवरी 1955 को हमेशा के लिए आंख मूंद ली। उन्होंने उर्दू कहानी को एक नयी शैली और बिल्कुल नया मिजाज दिया। उनकी कहानियां मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख देती हैं। समीक्षक एवं आलोचक आधुनिक उर्दू अफसानानिगारों की त्रयी 'मंटो, इस्मत चुगताई और कृश्न चंदर' में आज भी उन्हें सबसे ऊंचे स्थान पर मानते हैं।
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