हिंदी उर्दू का अद्वैत
प्रो.महावीर शरन जैन
मैंने केवल इशारा किया है कि जनता के द्वारा जो भाषा बोली जाती थी, उसको किस प्रकार दो भिन्न भाषाओं के रूप में प्रदर्शित करने के लिए षड़यंत्र रचा गया तथा एक को मुसलमानों की भाषा तथा दूसरी को हिन्दुओं की भाषा कहा गया। एक ही भाषा की दो स्टाइलें विकसित कराकर उनको भिन्न भाषाओं के रूप में प्रचारित प्रसारित करने तथा तदनन्तर उन्हें भिन्न धर्मों के साथ जोड़ देने की गहरी साजिश रची गई। उर्दू को इस्लाम धर्म या मुसलमानों के साथ जोड़ दिया गया। ग्रियर्सन तक ने कहा कि 'उर्दू' इस्लाम के साथ दूर-दूर तक फैली।
रब्बानी साहब ने बतलाया कि हम भी उर्दू को मुसलमानों की ज़बान मानते हैं तथा पाकिस्तान में उर्दू को अपने वतन की तहज़ीब एवं पहचान की ज़बान माना जाता है।
भाषा एवं धर्म
मैंने सवाल उठाया कि क्या धर्म की कोई भाषा होती है। मैंने यह स्थापना की कि धर्म की भाषा नहीं होती, किसी धर्म के ग्रंथों की भाषा अवश्य होती है। इस दृष्टि से इस्लाम के धर्मग्रंथ 'कुरान' की ज़बान अरबी है। मुसलमानों की कोई भाषा नहीं है, मुसलमानों के इस्लाम धर्म की 'कुरान' की भाषा अरबी है । इसी प्रकार ईसाइयों की कोई भाषा नहीं है, ईसाइयों के धर्म-ग्रंथ 'बाइबिल' (ओल्डटेस्टामेण्ट) की भाषा हिब्रू है। अरबी एवं हिब्रू दोनों ही 'सामी' या सेमेटिक परिवार की भाषाएँ हैं। इस्लाम धर्म एवं ईसाई धर्म के अनुयायी संसार के अलग-अलग मुल्कों में रहते हैं तथा जहाँ रहते हैं वहाँ की भाषा बोलते हैं। भारत में केरल के मुसलमान मलयालम बोलते हैं, तमिलनाडु के मुसलमान तमिल तथा पश्चिम बंगाल के मुसलमान बंगला। मैंने चुटकी ली और कहा कि बंगलादेश में भी जो मुसलमान रहते हैं वे उर्दू का नहीं, अपितु बंगला भाषा का प्रयोग करते हैं।
हिन्दी एवं उर्दू की भाषिक एकता के सम्बन्ध में मैंने रब्बानी साहब से यह प्रश्न किया कि क्या आप इस बात से सहमत हैं कि यदि दो लैंग्वेज भिन्न होती हैं, तो एक भाषा के वाक्य का हम दूसरी भाषा में अनुवाद या तर्ज़ुमा कर सकते हैं । उन्होंने सहमति व्यक्त की। मैंने कहा कि मैं हिन्दी के कुछ जुमले बोल रहा हूँ, आप मुझे यह बतलाने की कृपा करें कि उर्दू में इनका अनुवाद किस प्रकार होगा।
1.मैं रोजाना जाता हूँ।
2.मुझे चार रोटियाँ खानी हैं।
3.हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की धरती के पानी तथा आकाश की हवा में क्या फ़रक है ?

उन्होंने ठहाका लगाया और कहा कि प्रोफ़ेसर साहब आप तो उर्दू बोल रहे हैं और मुझसे कह रहे हैं कि मैं इनका उर्दू में ट्रान्सलेशन कर दूँ। आप हिन्दी में बोलिए तो मैं ट्रान्सलेशन करने की कोशिश करूँ।
अन्त मैं, मैंने रब्बानी साहब से कहा कि मैं भाषा विज्ञान का भी विद्यार्थी हूँ तथा मैंने भाषाविज्ञान में पढ़ा है कि भिन्न भाषा-भाषी व्यक्ति परस्पर बातचीत नहीं कर सकते, विचारों का आदान-प्रदान नहीं कर सकते। जैसे यदि मुझे फ्रेंच भाषा नहीं आती तथा फ्रेंच भाषी व्यक्ति को मेरी भाषा नहीं आती, तो यदि वह फ्रेंच बोलेगा तो मैं उसकी बात नहीं समझ पाऊँगा तथा मैं हिन्दी में बोलूँगा तो वह मेरी बात नहीं समझ पाएगा। दोनों के बीच संकेतों, मुख-मुद्राओं, भावभंगिमाओं के माध्यम से भले ही भावों का आदान-प्रदान हो जाए मगर भाषा के द्वारा विचारों का आदान-प्रदान नहीं हो पाएगा। मैंने प्रश्न किया कि हम लोग इतनी देर से बातचीत कर रहे हैं, मैं तो आपकी बातें पूरी तरह से समझ सका हूँ, आप मेरी बात समझ सके हैं या नहीं ? रब्बानी साहब ने कहा, ''बात समझने में तो मुझे भी दिक्कत नहीं हुई। अलबत्ता कुछ अल्फाज़ मेरी समझ में नहीं आए थे जिन्हें आपने अँगरेज़ी में ट्रान्सलेट कर दिया।'' मैंने कहा, ''रब्बानी साहब, आप कहते हैं कि आपको हिन्दी नहीं आती, आप कह रहे हैं कि इतनी देर तक आप उर्दू में बोले।मैं कह सकता हूँ कि मुझे उर्दू नहीं आती, मैं कहता हूँ कि इतनी देर तक मैं हिन्दी में बोला। मगर हम दोनों इतनी देर तक बातचीत करते रहे और एक-दूसरे की बात को समझते भी रहे । इसलिए मैं कहता हूँ कि हिन्दी तथा उर्दू अलग-अलग जुबान नहीं हैं।''
इस के बाद मेरी रब्बानी साहब से अनेक बार मुलाकातें हुईं। भाषा एवं जाति, भाषा एवं धर्म तथा भाषा एवं संस्कृति - जैसे विषयों पर उनके साथ विचार-विमर्श हुआ। रब्बानी साहब ने बतलाया कि इस्लाम की पैदाइश तो अरब में ही हुई। बाद को जब यह ईरान में फैला तो पर्शियन कल्चर का इस पर प्रभाव पड़ा। जब इस्लाम मज़हब हिन्दुस्तान आया तो इसका प्रभाव हिन्दुस्तान पर पड़ा।
मैंने कहा, ''रब्बानी साहब जैसे मैं मज़हब तथा भाषा (ज़बान) का संबंध नहीं मानता, वैसे ही जाति तथा भाषा, मज़हब तथा जाति, तथा मज़हब एवं कल्चर का भी अटूट संबंध नहीं मानता। हमें इनका फ़र्क पहचानना चाहिए।''
जाति तथा भाषा
एक जाति के लोग प्राय: एक भाषा बोलते हैं, इस कारण जाति और भाषा का संबंध मान लिया जाता है। अमेरिका में 'श्वेत' जाति अलग है, 'नीग्रो' अलग है। वहाँ लाखों नीग्रो अँगरेज़ी भाषा बोलते हैं। अँगरेज़ी बोलने के कारण इन नीग्रो लोगों को श्वेत जाति का नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार जर्मनी में दो जातियाँ रहती हैं (1) नार्डिक (2) आल्पाइन। मगर दोनों जातियाँ जर्मन भाषा बोलती हैं। आप रोमानिया को ही देख लीजिए। यहाँ रोमानियन, माग्यार (हंगेरियन), जर्मन, जिप्सी, उक्रेनियन, सेब्रेनियन, यहूदी, तुर्क अनेक जातियों के लोग रहते हैं मगर सब रोमानियन भाषा बोलते हैं।
जाति तथा धर्म
सामान्य व्यवहार में हम धर्म को जाति से जोड़ने की भूल करते आए हैं : हिन्दू जाति, मुस्लिम जाति, ईसाई जाति। वैज्ञानिक दृष्टि से इस तरह की बातें भ्रामक हैं। अँगरेज़ जाति, रूसी जाति, मग्यार जाति, चैक जाति - ये अलग-अलग जातियाँ हैं। ये सभी ईसाई धर्म को मानती हैं। भारत एवं पाकिस्तान में भी 'ईसाई' रहते हैं। क्या इन्हें इंग्लैंड के ईसाइयों की अँगरेज़ जाति का माना जा सकता है ?
धर्म एवं संस्कृति
धर्म को संस्कृति के साथ जोड़ना भी ठीक नहीं है। हिन्दू संस्कृति, मुस्लिम संस्कृति, ईसाई संस्कृति, बौध्द संस्कृति - जैसे शब्दों का प्रयोग होता है मगर ये प्रयोग अवैज्ञानिक हैं। बौध्द धर्म का प्रचार-प्रसार तिब्बत, लंका, जापान तीनों देशों में है। धर्म की दृष्टि से तीनों देश बौध्द धर्म को मानते हैं। मगर तीनों देशों की भाषाएँ अलग हैं, संस्कृतियाँ अलग हैं।
अँगरेज़ लोगों ने हिन्दुस्तान पर शासन किया। अँगरेज़ी भाषा का प्रभाव हिन्दुस्तान की भाषाओं पर पड़ा। यूरोपीय कल्चर ने हिन्दुस्तान की संस्कृति को प्रभावित किया। यह कहना अवैज्ञानिक है कि ईसाई भाषा ने हमारी भाषाओं को प्रभावित किया या ईसाई कल्चर से हमारी कल्चर प्रभावित हुई।
इण्डोनेशिया, इराक़, ईरान तथा सूडान ये चारों देश इस्लाम धर्म को मानते हैं। धर्म की दृष्टि से ये चारों मुस्लिम देश हैं। मगर इनकी भाषाएँ अलग हैं। इनकी कल्चर अलग हैं।
इण्डोनेशिया में आस्ट्रिनेशियन परिवार की इण्डोनेशियिन-बहासा तथा जावी आदि भाषाएँ बोली जाती हैं तथा यहाँ जावा-सुमात्रा-बोर्नियो आदि द्वीपों की कल्चर है।
इराक़ में सामी या सेमेटिक परिवार की अरबी तथा कुर्दिश भाषाएँ बोली जाती हैं। इराक़ मासोपोटामिया कल्चर का वंशधर है।
ईरान में इण्डो-यूरोपियन परिवार की 'इण्डो-ईरानियन' शाखा की फ़ारसी (पर्शियन) भाषा बोली जाती है तथा इसकी ईरानी या पर्शियन कल्चर है।
मैंने संदर्भ से यह भी बतलाना उचित समझा कि फ़ारसी की प्राचीन भाषा का नाम 'अवेस्ता' था जिसमें जोरोस्ट्रियन (अवेस्ता में 'ज़रथुस्त्र') धर्म ग्रंथ की रचना हुई थी।
सूडान में अफ्रीका महाद्वीप की संस्कृति है तथा वहाँ अफ्रीकन परिवार की डिन्का, नूबा आदि भाषाएँ बोली जाती हैं।
हिन्दुस्तान एवं इस्लामी संस्कृति
रब्बानी साहब ने कहा कि उन्होंने अनेक किताबें पढ़ी हैं जिनमें हिन्दुस्तान की कल्चर पर इस्लामी कल्चर का असर साफ़-साफ़ दिखलाया गया है। उन्होंने डॉक्टर ताराचंद की किताब ''इन्फ्लुयेन्सिस ऑफ इस्लाम ऑन इण्डियन कल्चर'' का नाम लिया। उन्होंने बतलाया कि प्रोफ़ेसर हुमायूँ कबीर ने भी 'अवर हेरिटेज़' नामक किताब में यही बात कही है। उन्होंने अन्य बहुत से विद्वानों के नाम तथा उनकी किताबों के नाम लिए जो मुझे इस समय याद नहीं हैं। मैंने कहा कि आपकी बात सही है। अँगरेज़ों ने हमारे पूरे समाज को हिन्दू एवं मुसलमान - इन दो भागों में बाँटकर देखा तथा दिखाया। मैंने कहा कि इस बारे में दो बातें हैं-
1. किसी मज़हब के असूलों का प्रभाव दूसरे मज़हबों पर पड़ता है या पड़ सकता है या किसी देश या जाति के लोगों के सोचने के ढ़ंग को भी प्रभावित कर सकता है मगर भाषाएँ तो भाषाओं से प्रभावित होती हैं तथा संस्कृतियाँ संस्कृतियों से प्रभावित होती हैं। हमारी भाषाओं पर अँगरेज़ी भाषा का प्रभाव पड़ा, हमारी कल्चर यूरोपीय कल्चर से प्रभावित हुई, न कि हमारी भाषाएँ एवं हमारी कल्चर 'ईसाई मज़हब' से प्रभावित हुईं।
2. हिन्दुस्तान में एक ही देश, एक ही जुबान तथा एक ही जाति के मुसलमान नहीं आए। सबसे पहले यहाँ अरब लोग आए। अरब सौदागर, फ़कीर, दरवेश सातवीं शताब्दी से आने आरंभ हो गए थे तथा आठवीं शताब्दी (711-713 ई. ) में अरब लोगों ने सिन्ध एवं मुलतान पर कब्जा कर लिया। इसके बाद तुर्की के तुर्क तथा अफ़ग़ानिस्तान के पठान लोगों ने आक्रमण किया तथा यहाँ शासन किया। शहाबुद्दीन गौरी (1175-12.6) के आक्रमण से लेकर गुलामवंश (12.6-129.), खिलजीवंश (129.-132.), तुगलक वंश (132.-1412), सैयद वंश (1414-1451) तथा लोदीवंश (1451-1526) के शासनकाल तक हिन्दुस्तान में तुर्क एवं पठान जाति के लोग आए तथा तुर्की एवं पश्तो भाषाओं तथा तुर्क-कल्चर तथा पश्तो-कल्चर का प्रभाव पड़ा।
मुगल वंश की नींव डालने वाले बाबर का संबंध यद्यपि मंगोल जाति से कहा जाता है और बाबर ने अपने को मंगोल बादशाह 'चंगेज़ खाँ' का वंशज कहा है और मंगोल का ही रूप 'मुगल' हो गया मगर बाबर का जन्म मध्य एशिया क्षेत्र के अंतर्गत फरगाना में हुआ था। मंगोल एवं तुर्की दोनों जातियों का वंशज बाबर वहीं की एक छोटी-सी रियासत का मालिक था। उज्बेक लोगों के द्वारा खदेड़े जाने के बाद बाबर ने अफ़ग़ानिस्तान पर कब्जा किया तथा बाद में 1526 ई. में भारत पर आक्रमण किया। बाबर की सेना में मध्य एशिया के उज्बेक़ एवं ताज़िक जातियों के लोग थे तथा अफ़ग़ानिस्तान के पठान लोग थे।
बाबर का उत्तराधिकारी हुमायूँ जब अफ़गान नेता शेरखाँ (बादशाह शेरशाह) से युध्द में पराजित हो गया तो उसने 154. ई. में 'ईरान' में जाकर शरण ली। 15 वर्षों के बाद 1555 ई. में हुमायूँ ने भारत पर पुन: आक्रमण कर अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त किया। 15 वर्षों तक ईरान में रहने के कारण उसके साथ ईरानी दरबारी सामन्त एवं सिपहसालार आए। हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ, औरंगजेब आदि मुगल बादशाह यद्यपि ईरानी जाति के नहीं थे, 'मुगल' थे (तत्वत: मंगोल एवं तुर्की जातियों के रक्त मिश्रण के वंषधर) फिर भी इन सबके दरबार की भाषा फ़ारसी थी तथा इनके शासनकाल में पर्शियन कल्चर का हिन्दुस्तान की कल्चर पर अधिक प्रभाव पड़ा।
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