झूमर
भीष्म साहनी
खुले मैदान में अर्जुनदास कुर्सी पर बैठा सुस्ता रहा था। मैदान में धूल में उड रही थी, पांवों को मच्छर काट रहे थे, उधर शाम के साए उतरने लगे थे और अर्जुनदास का मन खिन्न-सा होने लगा था।
जिन बातों ने जिंदगी भर परेशान नहीं किया था, वे जीवन के इस चरण में पहुंचने पर अंदर ही अंदर से गाहे-बगाहे कचोटने-कुरेदने लगती थी। अनबुझी-सी उदासी, मन पर छाने लगती थी। कभी-कभी मन में सवाल उठता, अगर फिर से जिंदगी जीने को मिल जाती तो उसे मैं कैसे जीता? क्या करता, क्या नहीं करता? यह तय कर पाने के लिए भी मन में उत्सुकता नहीं थी। थका-थका सा महसूस करने लगा था।
यों तो ऐसे सवाल ही निरर्थक होते हैं पर उनके बारे में सोचने के लिए भी मन में उत्साह चाहिए, जो इस समय उसमें नहीं था। जो कुछ जीवन में आज तक करता आया हूं शायद फिर से वही कुछ करने लगूंगा, पर ज्यादा समझदारी के साथ, दायें-बायें देखकर, सोच-सूझकर, अंधाधुंध भावुकता की रौ में बहकर कुछ नहीं करूंगा। अपना हानि-लाभ भी सोचकर और इतनी जल्दबाजी में भी नहीं जितनी जल्दबाजी में मैं अपनी जिंदगी के फैसले करता रहा हूं। सोचते-सोचते ही उसने अपने कंधे बिचका दिए। क्या जिंदगी के अहम फैसले कभी सोच-समझकर भी किए जाते हैं?
साए और अधिक गहराने लगे थे। मैदान में बत्तियां जल उठी थी। लंबे-चौडे मैदान के एक ओर मंच खडा किया गया था। मंच पर रोशनियां, माइक्रोफोन आदि फिट किए जा रहे थे, मंच ऊंचा था लगभग छह फुट ऊंचा रहा होगा। मंच के नीचे, दायें हाथ को कनात लगाकर कलाकारों के लिए वेशभूषा कक्ष बना दिया गया था। अभी से कनात के पीछे से तबला हारमोनियम बजने की आवाजें आने लगी थी। युवक-युवतियां नाटक से पहले पूर्वाभ्यास करने लगे थे। अपनी-अपनी वेशभूषा में सजने लगे थे।
मंच को देखने पर उसके मन में पहले जैसी हिलोर नहीं उठी थी। इसी पुराने ढर्रे पर अभी भी हमारा रंगमंच चल रहा है। दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है, हम अभी भी वहीं पर खडे हैं जहां पचास साल पहले खडे थे। फटीचर-सा मंच खडा किया करते थे। बिजली की रोशनी नहीं मिलती तो गैस के लैंप उठा लाते। रात पड ज़ाती तो वहीं मंच पर अभिनय के बाद सो भी जाते थे। तब भी न जेब में पैसा था न कहीं से चंदा उगाह पाते थे। बस, खेल दिखाओ, दर्शकों के सामने झोली फैलाओ और खर्च निकाल लो। कोई दुवन्नी डाल देता, कोई चवन्नी, कभी कोई दर्शक अधिक भावुक हो उठता तो चमकता रूपए का सिक्का डाल देता। मैं और मेरे साथी, सबकुछ भूले हुए इसी काम में मस्त थे। इसी काम में सारी जवानी खप गई। न जाने कैसे खप गई। उन दिनों भी अर्जुनदास के पांवों में फटे हुए सस्ते चप्पल हुआ करते थे, आज भी वैसे ही चप्पल है, केवल अब जिंदगी ढलने लगी है। बहुत से साथी काल प्रवाह में बहते हुए न जाने किस ठौर जा लगे हैं। अब वह स्वयं बहुत कम अभिनय कर पाता है, सांस फूलने लगती है, आवाज बैठ जाती है, माथे पर पसीना आ जाता है और टांगे कांपने-थरथराने लगती है।
मैदान में युवक-युवतियां अब अधिक संख्या में इकठ्ठा होने लगे थे। कुछेक बडी उम्र के संयोजकों को छोडक़र बहुत कम लोग इसे जानते-पहचानते थे। कुछ लोग दूर से इसकी ओर इशारा करते। वह रंगमंच का खलीफा बन गया था, छोटा-मोटा नेता। इस रंगोत्सव में उसे पुरस्कार देने के लिए बुलाया गया था। आज से नाटय-समारोह शुरू होने जा रहा था। संयोजक उसकी खातिरदारी कर रहे थे। सब कुछ था, पर मन में वह उछाह नहीं था, जो कभी रहा करता था।
समारोह आरंभ होने में अभी देर थी। अब इस तरह के कार्यक्रम अर्जुनदास से निभते भी नहीं थे। नौ बजे का वक्त देते हैं, दस बजे शुरू करते हैं। दर्शक लोग भोजन करने के बाद, पान चबाते, टहलते हुए आएंगे गप्पे हांकते। कहीं कोई उतावली नहीं होगी, कोई समय का ध्यान नहीं होगा। यहां पर वक्त की पाबंदी कोई अर्थ नहीं रखती। किसी से पूछो, ''नाटक कब शुरू होगा?'' तो कहेंगे, ''यही नौ-दस बजे।'' ''समाप्त कब होगा?'' ''यही ग्यारह-बारह बजे।'' ''अध्यक्ष महोदय कब आएंगे?'' ''बस आते ही होंगे।'' वह जानता था कि नाटक अधकचरा होगा। मंच की साज-सज्जा से ही उसका नौसिखुआपन झलक रहा था। इसके मन में टीस उठने का एक कारण यह भी रहा था। अभिनय और कला कहां से कहां पहुंच चुकी है पर हमारा यह रंगमंच अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रहा है। आज रंगमंच में प्रविधि के स्तर पर एक विशेष निपुणता आ गई है। रोशनी का प्रयोग मंच की सज्जा, वेश-भूषा, चुस्ती-मुस्तैदी, वह नहीं कि धूल भरे मैदान में - जहां पानी का छिडक़ाव कराने तक के लिए पैसे संयोजकों की जेब में न हों - और फटे-पुराने पर्दे और कनातें और मुडी-निचुडी दरियां, और जहां हाथों से, खींच-खींचकर पर्दा गिराया जा रहा हो, और वह भी पूरी तरह स्टेज को ढक नहीं पाए और पर्दे के पीछे, इधर से उधर भागते अभिनेता नजर आ रहे हों। पर ऐसे ही रंगमंच पर अर्जुनदास ने जिंदगी बिता दी थी।
वह जानता था नाटक बेढंगा होगा, न ढंग की, वेशभूषा, प्रांपटर की आवाज पर्दे के पीछे से एक्टर की आवाज से ज्यादा ऊंची सुनाई देगी। केवल संवादों के बल पर नाटक चलेगा, या फिर गीतों के बल पर, वे असरदार हुए तो नाटक जम जाएगा, वरना वह भी नहीं जमेगा। युवा अभिनेता पंक्तियां भूलेंगे, स्टेज पर डोलते रहेंगे, एक-दूसरे का रास्ता काटते रहेंगे। तुम लोग केवल भावना के बल पर नाटक का अभिप्राय दर्शकों के दिल में उतारना चाहते हो, अब यह नहीं चलेगा। लोग नफासत मांगते हैं, और कला और अभिनय का ऊंचा स्तर और मंच कौशल। अनगढ नाटक के दिन बीत गए यहां लोग आएंगे, सैंकडोंं की संख्या में भले ही लोग इकठ्ठा हो जाएंगे, पर वह तुम्हारे नाटक के कारण नहीं वे तफरीह चाहते हैं, जिसे तुम मुफ्त में जुटा रहे हो, इसलिए आएंगे। तुम्हारी कला देखने नहीं आएंगे, रात को खाना खा चुकने के बाद पान चबाते हुए, यहां घडी दो घडी मन बहलाने आएंगे। वह भी इसलिए कि तुम अपने खेल मुफ्त में दिखाते हो, टिकट लगाते तो कोई देखने नहीं आता।
आज से दसियों साल पहले भी यही स्थिति थी। एक जगह पर नाटक खेलते फिर वहां से भागते हुए बगल में वेशभूषा का बुक्का दबाए किसी दूसरी बस्ती में नाटक खेलने पहुंच जाते। सिर पर जुनून तारी था, वरना धैर्य से सोच-विचार करते थे समझ जाते कि इस तरह यह गाडी दूर तक नहीं जा पाएगी कि लोग थक जाएंगे, नाटक खेलने वाले थक जाएंगे, दर्शक उब जाएंगे।
आज ही प्रातः कुछेक पुराने रंगकर्मियों की चौकडी ज़मी थी। वे सब युवा नाटय समारोह को एक तरह से आशीर्वाद देने आए थे। उनमें अर्जुनदास भी था। अर्जुनदास की पत्नी कमला भी थी। दो-एक अन्य स्त्रियां भी थीं जो किसी जमाने में इनके साथ गान मंडली आदि में भाग लिया करती थीं। सभी मिल बैठे गप्प लडा रहे थे। पुराने दिनों को याद कर रहे थे। अपने-अपने अनुभव, किस्से सुना रहे थे, पुराना उत्साह मानो फिर से जाग उठा था। तरह-तरह के अनूठे अनुभवों, जोखिम भरे अनुभवों की चर्चा चल रही थी।
''याद है? जब कि बस्ती में शिखरिणी खेला था?'' अर्जुनदास सुना रहा था, ''रात इतनी देर से शो खत्म हुआ कि सामान समेटते-समेटते एक बज गया। सभी बसें बंद, गाडियां बंद, कुछ हमारे साथी तो शो खत्म होते ही निकल गए थे, वे तो घरों को पहुंच गए, रह गया मैं और रमेश। हम रात को वहीं मंच पर पसर गए। जाते भी कहां? सुबह उठकर सामान बांधा, एक बैलगाडी भाडे पर ली, सारा सामान लादा और सामान के अंबार के ऊपर हम दोनों बैठ गए, ''कहते-कहते अर्जुनदास की आंखों में पहले-सी चमक आ गई, ''और बैलगाडी धीरे-धीरे एक सडक़ से दूसरी सडक़ और हम सामान के ऊपर बैठे गीत गा रहे थे, एक गीत के बाद दूसरा गीत, बैलगाडी रेंगती हुई, सुबह दस बजे की निकली दोपहर चार बजे कार्यालय के सामने जाकर रूकी। सारा दिन इसी में निकल गया पर उसी शाम शो भी हुआ, और शो के बाद हम लोग घर पहुंचे। ऐसे भी दिन थे
इस पर कोई दूसरा रंगकर्मी अपनी आपबीती सुनाने जा ही रहा था जब अर्जुनदास की बगल में बैठी उसकी पत्नी बोली, ''तुम तो दिन भर बैलगाडी पर बैठे गीत गा सकते थे, शहर भर की सैर कर सकते थे, तुम्हें मैं जो मिली हुई थी, घर में पिसने वाली।''
कमला ने कहा तो मजाक में कहने के बाद स्वयं हंस भी दी, पर इससे अर्जुनदास सिमटकर चुप हो गया।
पंजाब का एक वयोवृध्द साथी सुना रहा था, ''एक नाटक था, कुर्सी, तुम्हें याद होगा। उस नाटक पर सरकार ने रोक लगा दी थी। पर हमने वह नाटक अजीब ढंग से खेला। एक जगह खेलते तो फौरन ही बाद, बस में बैठकर अगले शहर जा पहुंचते, वहां खेलते और फिर अगले शहर के लिए रवाना हो जाते। पुलिस पीछे-पीछे, हम आगे-आगे ''
पुलिस की चर्चा चली तो अर्जुनदास को अपना एक और किस्सा याद हो आया -
''मेरे खिलाफ वारंट तो नहीं था। पर मुझे शहर में घुसने की इजाजत नहीं थी। पर वहां हमारी केन्द्रीय कार्यकारिणी की बैठक होने वाली थी। मुझे वहां पहुंचना था, मैं लुक-छिपकर पहुंच गया। एक स्कूल की ऊपर वाली मंजिल पर मीटिंग चल रही थी। अब मैं मीटिंग में अपनी बात कह ही रहा था जब खबर मिली कि बाहर पुलिस पहुंच गई है। मैं समझ गया कि मुझे ही पकडने आई होगी। मैंने अपनी बात खत्म की, अभी बहस चल ही रही थी कि मैं चुपचाप उठा और कमरे के बाहर आ गया। स्कूल का गलियारा लांघकर मैं पिछवाडे क़ी ओर जा पहुंचा। स्कूल के पीछे कोई मंदिर था। उस वक्त शाम के साए उतरने लगे थे और मंदिर में सायंकाल की आरती चल रही थी। घंटियां बज रही थी। गर्मी के दिन थे। मैं ऊपर बरामदे में खडा था। मैंने बुश्शर्ट उतारी और उसकी दोनों आस्तीनें कमर में बांध ली और उसकी छत पर से कूद पडा और सीधा मंदिर के आंगन में जा उतरा। जमीन कच्ची थी, मुझे चोट नहीं आई। फिर मैंने वैसे ही भक्तों की तरह, बुश्शर्ट को कमर में से उतारकर कंधे पर रखा और धीरे-धीरे टहलता हुआ बाहर निकल आया। मंदिर के फाटक के ऐन सामने सडक़ पर एक सिपाही खडा था। उससे थोडा हटकर दाईं ओर को, एक और सिपाही तैनात था। दोनों के हाथ में लाठियां थी, बहुत से भक्त आ जा रहे थे, सिपाही ने मेरी ओर कोई ध्यान नहीं दिया। मैं बाहर आ गया और दाएं हाथ को टहलता हुआ आगे बढने लगा। ज्यों ही मैं अंधेरे में पहुंचा कि मैं सरपट दौडने लगा, ऐसा भागा कि शहर के दूसरे कोने में ही जाकर दम लिया जहां हरीश, मेरा मित्र रहता था ''
इस जोखिम भरी घटना के ब्योरे को सुनते हुए भी उसकी पत्नी के मन मे क्षोभ-सा उठा था। उसे भी वह दिन याद आ गया था। उसे याद आ गया था कि उसी दिन उनकी बिटिया को खसरा निकला हुआ था और उसे तेज बुखार था, और थकी-मादी वह बच्ची के सिरहाने बैठी घडियां गिन रही थी कि कब उसका पति घर लौटेगा और बेटी के उपचार का कोई प्रबंध कर पाएगा। जिस मस्ती में अर्जुनदास का लडक़पन और जवानी बीते थे उसका आकर्षण अब कुछ मंद पड चुका था, स्वयं अर्जुनदास की नजर मंद पड चुकी थी। इतना वक्त इस काम को दिया, क्या तुक थी।
उसके इस जुनून की आलोचना, उसकी पत्नी, उन बीते दिनों में किया करती थीं। वह सुन लिया करता था और सिर झटक दिया करता था या हंस दिया करता था, क्योंकि उन दिनों उसे इस काम की सार्थकता में गहरा विश्वास था। पर अब, वर्षों बाद उसका विश्वास शिथिल पडने लगा था, और उसके साथ उसका आग्रह भी मंद पडने लगा था, और उसी समय से उसके अंदर एक प्रकार की अपराध भावना भी बढने लगी थी, कि वह मात्र अपनी आदर्शवादिता और जुनून में खोया रहा है, कि वह अभी भी व्यवहार के धरातल पर नहीं उतरा, अपने दायित्व नहीं निभाए, एक तरह से कहो तो 'स्वान्तः सुखाय ही जीता रहा है।
उसकी नजर फिर मंच पर पडी। अब वहां पहले से ज्यादा गहमागहमी थी। बार-बार माइक्रोफोन पर कुछ न कुछ बोला जा रहा था। माइक्रोफोन को टेस्ट किया जा रहा था। पर्दे पर बार-बार खींचा-खोला जा रहा था। बहुत से बच्चे और लौंडे-लपाडे मंच के आसपास मंडराने लगे थे। एक ऊंचा-लंबा, छरहरे शरीर वाला युवक, हाथ में एक कागज उठाए, कभी एक ओर तो कभी दूसरी ओर मैदान में भागता फिर रहा था, बार-बार माथे पर से बालों की लट को हटाता हुआ, वह शायद कार्यक्रम का संयोजक था, कागज पर खेलने वालों के नाम होंगे, जरूरी कामों की फेहरिस्त होगी, पर उसके चेहरे पर ऐसा भाव था मानो सारे देश का संचालन उसी के हाथ में हो, जैसे उसके हाथ में पकडा कागज का टुकडा, कोई सूची न होकर कोई ऐतिहासिक दस्तावेज हो। अर्जुनदास को उसकी भागदौड में अपनी भागदौड क़ी झलक नजर आ रही थी। कुछ बरसों बाद शायद इसका विश्वास भी शिथिल पडने लगेगा। इस समय तो अगर इसके हाथ से कागज का टुकडा गिर जाए तो मानों पृथ्वी की गति थम जाएगी। उसकी ओर देखते हुए अर्जुनदास के अंदर विचित्र-सी भावनाएं उठ रही थीं, कभी स्फूर्ति की लहर दौड ज़ाती। कभी संशय डोलने लगता, कभी उसके उत्साह में उसे बचकानापन नजर आने लगता।
और अब युवक, हाथ में कागज का फडक़ा उठाए अर्जुनदास की ओर बढता आ रहा था। शायद रंगमंच की रूप-सज्जा तैयार हो गई है और खेल शुरू होने वाला है। संभवतः युवक उसे कोई सूचना देने या बुलाने आ रहा है। चलिए, देर आए दुरूस्त आए, ज्यादा देर इंतजार नहीं करना पडा। ग्यारह बजे तक भी खेल समाप्त हो जाए तो जल्दी छुटकारा मिल जाएगा। लडक़ा पास आ गया था। अर्जुनदास ने कुर्सी पर से टांगें हटा लीं। पर युवक खडा रहा। बुजुर्ग के सामने उसे कुर्सी पर बैठने में झेंप हो रही थी।
''कहो बरखुरदार, सब तैयारी हो गई? अब पर्दा उठने वाला है?''
''नहीं साहिब, हमारे दो कलाकार अभी तक नहीं पहुंच पाए हैं। उन्हें स से आना है, उन्हें पहुंचने में देर हो गई है।''
अर्जुनदास के मन में खीझ उठी पर वह चुप रहा। स्वयं अतिथि होने के कारण कुछ कहते नहीं बनता था। ओखली में सिर दिया तो रोना क्या।
''क्या वे स से आ रहे हैं?''
''जी!''
''वह तो बहुत दूर है।''
''जी पर बसें, हर आधे घंटे के बाद चलती रहती हैं। उन्हें अब तक पहुंच जाना चाहिए था।''
अर्जुनदास चुप रहा। यह सोचकर कि वे दोनों युवक इस आयोजन में भाग ले पाने के लिए इतनी दूर से बसों में धक्के खाते पहुंचेंगे, दो घंटे के शो के लिए दस घंटे का सफर तय करके आएंगे और फिर कल लौट जाएंगे। यह मौका शिकायत करने का नहीं था।
अर्जुनदास ने युवक की ओर देखा। बडा प्यारा-सा लडक़ा था, मसें भीग रही थीं, चेहरे पर जवानी की लुनाई थी, आखों में स्वच्छ-सी चमक जिसका भास सायंकाल के इस झुटपुटे में भी हो जाता था।
''बैठो।'' अर्जुनदास ने खाली कुर्सी की ओर इशारा करते हुए कहा।
लडक़ा कुछ सकुचाया, फिर बैठ गया।
''सर, आपसे एक अनुरोध है, आप मेरी सहायता करें।''
''क्या बात है?''
''सर, आप मेरे पिताजी को समझाएं। वह नहीं चाहते कि मैं रंगमंच का काम करूं।''
''वह क्या चाहते हैं?''
''वह चाहते हैं मैं नौकरी करूं, कोई सरकारी नौकरी। वह इसे फिजूल काम समझते हैं, आप समझाएंगे तो वह समझ जाएंगे।''
अर्जुनदास ने हंसकर कहा, ''मैं क्या समझाऊंगा। मैं तो बाहर का आदमी हूं। मैं तुम्हारी परिस्थितियों को तो नहीं जानता हूं।''
''नहीं सर आपने बहुत काम किया है आपको जिंदगी भर का अनुभव है।''
अर्जुनदास को अपनी जवानी के दिन याद आए। वह दिन भी जिस दिन उसने स्वयं रंगमंच के साथ नाता जोडा था। पर वह तो किसी से परामर्श करने अथवा सहायता लेने नहीं गया था। उसने तो न पत्नी से पूछा था, न घर वालों से, और इस काम में कूद पडा था। इसने कम से कम अपने पिता की बात सुनी तो। इतनी समझदारी तो की।
''अभी तुम व्यस्त हो, तुम्हारा शो हो जाए अभी मैं यहीं पर हूं। बाद में मिल-बैठकर बात करेंगे। यह मसला सुलझाना इतना आसान नहीं है।''
''अच्छा सर, मैं कल आपसे मिलूंगा।''
और वह उठकर, कदम बढाता रंगमंच की ओर चला गया।
इस युवक ने अर्जुनदास की पुरानी यादों को और ज्यादा कुरेद दिया था।
रंगमंच के साथ जुडने से पहले वह देश के स्वतंत्रता संग्राम की ओर उन्मुख हुआ था। न जाने वह भी कैसे हुआ। शायद इसलिए कि वातावरण में अजीब सी धडक़न पाई जाती थी, अजीब सा तनाव और आत्मोत्सर्ग की भावना। दिल में भावनाओं के ज्वार से उठते थे और एक दिन वह खादी का कुर्ता-पायजामा पहनकर घर के बाहर निकल आया था। बात मामूली-सी थी, खादी का कुर्ता-पायजामा पहनने में क्या रखा है, लेकिन उसकी नजर में यह देश-सेवियों का पहरावा था। विद्रोह का प्रतीक था। इसे पहनना देश के विराट आंदोलन के साथ जुडना था, उसे बार-बार रोमांच हो रहा था, उसे लग रहा था जैसे वह किसी घेरे को तोडक़र बाहर निकल आया है, और ठाठें मारते किसी महानगर में कूद गया है। रंगमंच की ओर भी वह कुछ इसी तरह से ही आकृष्ट हुआ था। बंगाल में दुर्भिक्ष पडा था और बंगाल से कलाकर्मियों का एक दल उसके शहर में आया था। वे लोग बंगाल के संकट को नाटक-संगीत द्वारा प्रस्तुत कर रहे थे। उस दिन वह शाम को घूमने के लिए कैन्टोन्मेंट की तरफ निकल गया था। आम तौर पर वह सैर करने के लिए खेतों की ओर निकल जाया करता था, उस दिन अनायास ही उसके पांव इस ओर को उठ गए थे। उसे इस अभिनय की जानकारी भी नहीं थी। घूम चुकने पर वह घर की ओर लौट रहा था जब एक सिनेमाघर के सामने उसे छोटी सी भीड ख़डी नजर आई थी और अर्जुनदास कुतूहलवश उस ओर चला गया था।
पर्दा उठने पर एक वयोवृध्द व्यक्ति, कोई अभिनेता, जो वयोवृध्दा व्यक्ति की भूमिका निभा रहा था, पीठ झुकी हुई, सफेद दाढी, हाथ में हरीकेन लैंप उठाए मंच पर आया था और कांपती आवाज में बोला था, ''सुनोगे? अभागे बंगाल की कहानी सुनोगे?''
और अर्जुनदास को जैसे बिजली छू गई थी। और उसके बाद जितने दृश्य सामने आए थे सभी उद्वेलित करने वाले, सभी उसके दिल को मथते रहे थे। लगभग डेढ घंटे तक कार्यक्रम चलता रहा था, अनेक गीत थे, वृंदगान के रूप में, कुछ हिंदुस्तानी में, कुछ बंगला में, सभी हृदयस्पर्शी, दिल को गहरे में छूने वाले, वह पहली बार ऐसा नाटक देख रहा था जो अन्य नाटकों से भिन्न था। मंच-सज्जा न के बराबर थी, अनगढ-सी पर हाल में बैठे लोग मंत्र-मुग्ध से देखे जा रहे थे। दृश्य श्रृंखलाबध्द भी नहीं थे। पर उनमें कुछ था जो सीधा दिल में उतरता था।
और अंत में उसी वयोवृध्द ने मंच पर से उतरकर दुर्भिक्ष-पीडितों के लिए झोली फैलाई थी और झोली फैलाए दर्शकों की पांतों के सामने आने लगा था। तभी अर्जुनदास के आगे वाली सीट पर बैठी एक भावविह्वल युवती ने अपने कानों में से झिलमिलाते सोने के झूमर उतारकर वयोवृध्द की झोली में डाल दिए थे, और उसी क्षण मानो अर्जुनदास के जीवन का कांटा भी बदल गया था।
तब भी उसने किसी से परामर्श नहीं किया था और रंगकर्मियों की टोली में शामिल हो गया था।
यह मेरे स्वभाव का ही दोष रहा होगा कि मैं भावोद्वेग में अपना संतुलन खो बैठता हूं और बिना हानि-लाभ पर विचार किए बिना आगा-पीछा देखे, कूद पडता हूं। पर यह स्वभाव का दोष केवल मेरा ही तो नहीं रहा। अनेकानेक लोगों का रहा है और वे कितने निखरे-निखरे व्यक्तित्व वाले लोग थे। कितने सच्चे, कितने ईमानदार।
उसकी आंखों के सामने दूर अतीत का किसी जलसे का दृश्य घूम गया। तब वह बहुत छोटा सा था, स्कूल में पढता था। न जाने वह आदमी कौन था, उन दिनों नमक का कानून तोडने का आंदोलन चल रहा था। भरे जलसे में, जहां मंच पर गैस का लैंप जल रहा था, और समूचे जलसे के लिए यही एक रोशनी थी, एक आदमी मंच पर चढक़र आया था। छोटी सी सिर पर पगडी, पतली-पतली सी मूंछें, हाथ उठाकर उसने एक शेर पढा था ः
''वह देख सितारा टूटा है,
मगरब का नसीब फूटा है।''
और उसके साथ ही जेब में से एक कागज की पुडिया निकाल लाया था, और गैस की रोशनी में सभी को दिखाते हुए ऊंची आवाज में बोला था, ''साहिबान, यह नमक की पुडिया है। आज मैंने नमक कानून तोडा है। यह मेरी बापू को छोटी-सी भेंट है। छोटी नदी के किनारे पानी को सुखाकर नमक तैयार किया गया है। वंदे मातरम्!'' कहकर मंच पर से उतर गया था। हॉल तालियों से गूंज उठा था। श्रोताओं के आगे वाली पांत में पुलिस के तीन बावर्दी अफसर कुर्सियों पर बैठे थे और भीड क़े पीछे मैदान में ही एक सिरे पर पुलिस की सींखचों वाली गाडी ख़डी थी। जलसा अभी खत्म ही हुआ था कि उसे हथकडी लगा दी गई थी और उसे पुलिस की गाडी में धकेलकर बंद कर दिया गया था और देर तक जब तक बंद गाडी दूर नहीं चली गई, उसके नारे सुनाई देते रहे थे, ''इंकलाब जिंदाबाद!'' बोल महात्मा गांधी की जय।'' और वह जैसे ही लोगों की आंखों के सामने आया था वैसे ही ओझल भी हो गया था। क्या मालूम उस रोज अर्जुनदास, बंगाल के दुर्भिक्ष से जुडे अभिनय को देखने हॉल में अचानक प्रवेश नहीं कर जाता तो कभी इस रास्ते आता ही नहीं। क्या मालूम हॉल में अर्जुनदास के सामने बैठी युवती ने अगर सोने के झूमर उतारकर उस अभिनेता की झोली में नहीं डाल दिए होते तो उसकी जिंदगी का कांटा नहीं बदलता। कौन जाने? क्या मालूम जिंदगी का कांटा बदलने के लिए कोई और कारण बन जाता।
उसके कानों में फिर से उसकी पत्नी का वह वाक्य गूंज गया। जिसे वह अकसर कहा करती थी, ''तुम्हें ब्याह नहीं करना चाहिए था। तुम जैसे लोग ब्याह करके अपने घर वालों को भी दुखी करते हैं और खुद भी दुखी होते हैं ''
जिंदगी में अनेक अवसरों पर उसकी पत्नी उसे झिंझोडती रही थी। अपने बच्चों का वास्ता डालती रही थी। सुबह से शाम तक घर के कामों में पिसती रही थी पर अर्जुनदास के सिर पर तो जुनून सवार था। बंबई में कांग्रेस का अधिवेशन था। अर्जुनदास को तो जाना ही जाना था। ''तुम भी चलो।'' उसने अपनी पत्नी से कहा। पर छोटे-छोटे दो बच्चों को छोडक़र कैसे जाती? ''देश सेवा का काम तो मर्दों के लिए बना है, तुम ही जाओ। मैं घर में ठीक हूं।'' और अर्जुनदास बुक्का उठाकर चला गया था। हर बार ऐसा ही होता था। बुक्का उठाकर चल देता था।
अर्जुनदास को धनोपार्जन के लिए और तो कोई धंधा नहीं सूझा था, उसने पुस्तकों की दुकान खोल ली थी। यह काम रंगकर्म के आडे नहीं आता था। कभी-कभी छोटी-मोटी पूंजी लगाकर पुस्तकें प्रकाशित भी कर देता। पर दुकान खोल देना एक बात है, उसे चलाना, बिल्कुल दूसरी बात। लोग-बाग मुफ्त में पुस्तकें उठाकर ले जाते। अपने पैसे लगाकर पुस्तक छापता, पुस्तक-विक्रेता महीनों तक अदायगी नहीं करते। दुकान पर मित्रों, रंगकर्मियों का तांता लगा रहता। सभी अर्जुनदास की जेब से चाय पीते और गप्पें हांकते, कुछ लोग अपनी घटिया किताबें छपवा लेते। उसी दुकान में ही गान-मंडली की रिहर्सलें होती, ऊंची-ऊंची तानें उठतीं।
कमला को पता चलता तो मन ही मन कुढती रहती, अंत में जब बच्चे कुछ बडे हुए तो वह स्वयं दुकान पर जाकर बैठने लगी थी। इससे कुछ तो इस महादानी पर अंकुश लगेगा, चाय की प्यालियां कुछ तो कम होंगी, और इसके निगोडे साथियों को कुछ तो शर्म आएगी। पर दुकान पर बैठने का मतलब था, घर पर भी पिसो और अब दुकान पर भी। तभी कमला ने निश्चय किया कि वह किसी स्कूल में नौकरी कर लेगी। जिस दिन उसे एक प्राइमरी स्कूल में नौकरी मिली और उसने दुकान पर लड्डू बांटें, उसी दिन अपने पति से यह कह भी दिया, ''अब तुम स्वतंत्र हो, जो मन में आए करो।'' और ऐन इसके महीने भर बाद अर्जुनदास जेलखाने में पहुंच गया था।
बंबई में जहाजियों की बगावत हुई थी। जगह-जगह पर विरोध-प्रदर्शन हुए थे और पकड-धकड शुरू हो गई थी। कमला ने दुकान को ताला लगाया और घर चली आई। सारा रास्ता मन को समझाती रहीः
''उसे पकडे तो जाना ही था। वह कुछ भी नहीं करता तो भी सरकार इसे पकड ले जाती।''
पूरे दो साल तक अर्जुनदास जेल में रहा था। और पूरे दो साल तक कमला, प्रति सप्ताह उसे मिलने पांच मील दूर, जेलखाने जाती रही थी। जीवन की कठिनाइयों को देखने के अलग-अलग नजरिए होते हैं। कमला ने अर्जुनदास की सरगर्मियों को स्वीकार कर लिया था। वह जानती थी कि वह उन्हें छोडेग़ा नहीं। इसी ढर्रे पर उसका जीवन चलेगा। जब कठिनाई बढ ज़ाती तो वह रो देती। पर मन ही मन उसने अपनी नियति को स्वीकार कर लिया था और नियति को स्वीकारने का एक परिणाम यह भी हुआ था कि कमला की भावनाओं में से कटुता और झल्लाहट कम होने लगी थी, और कभी-कभी उसके मन में अपने प्रति सहानुभूति-सी भी उठने लगी थी। करता है, पर कोई बुरा काम तो नहीं करता, अपनी भूख-प्यास भी तो भूले हुए है। जब अर्जुनदास जेल से छूटकर आया तो वह वामपंथी बनकर लौटा था। जेल के अंदर कुछ ऐसे देशभक्त भी थे जो मार्क्स और लेनिन की चर्चा किया करते थे, अर्जुनदास उनकी बातें सुनता रहता, उनकी दी हुई किताबें पढता। कहने को तो वह भी अनायास ही हुआ था। अगर उसी जेल में दर्शनसिंह कैद होकर नहीं आता तो अर्जुनदास पर मार्क्सवादी विचारों का रंग नहीं चढता। पर ये सब कहने की बातें हैं। होता वही है जो होकर रहता है।
आजादी आई। देशवासियों के हाथ में सत्ता की बागडोर आई। उसके अनेक साथियों ने हवा का रूख देख लिया और समझ गए कि अब जेलयात्रा वाले आंदोलन नहीं चलेंगे। अर्जुनदास के बहुत से पुरानी साथी छिटक गए। पर अर्जुनदास तो यह कहता फिरता था कि स्वतंत्रता-आंदोलन अभी समाप्त नहीं हुआ है बल्कि अब तो निर्माण कार्य होगा न्यायसंगत समाज की स्थापना के लिए संघर्ष होगा।
मतलब कि अर्जुनदास की गाडी पहले की ही भांति चलती रही। उसकी चाल बेढंगी ही रही। उन्हीं दिनों दिल्ली की एक सडक़ पर उसे देवराज मिला था। देवराज आकाशवाणी में नौकरी करता था और अच्छे ओहदे पर था। उसने उसे आकाशवाणी में नौकरी करता था और अच्छे ओहदे पर था। उसने उसे आकाशवाणी में नौकरी कर लेने का सुझाव दिया था। देश का बंटवारा हो गया था और शरणार्थी सडक़ों पर मारे-मारे घूम रहे थे।
''बहुत सी नौकरियां निकली हैं। कहो तो बात करूं?'' देवराज ने कहा था।
और अर्जुनदास ने देवराज की ओर यों देखा था मानो देवराज ने उसका अपमान किया हो। वह और नौकरी? इस पर सरकारी नौकरी? देवराज के मन में यह ख्याल ही कैसे आया था। उसी शाम उसकी गान मंडली ने कनाट प्लेस के बडे मैदान में अपना रंगारंग प्रोग्राम प्रस्तुत करना था और नए गीत पेश करना था। यह तो वह यों ही चाय का प्याला पीने एक ढाबे में चला आया था। देवराज को इस बात का ख्याल ही कैसे आया कि मैं नौकरी के लिए दर्ख्वास्त दूंगा और उसने देवराज को नाटक देखने का न्यौता दिया था। बहुत दिन बाद, जब एक दिन, उसने डींग हांकते हुए इस घटना की चर्चा अपनी पत्नी से की थी तो उसने सुनकर मुंह फेर लिया था, ''तुम्हें घर परिवार की चिंता होती तो तुम नौकरी करते। तुम तो आदर्शवाद के घोडे पर सवार तीसमारखां बने घूम रहे थे। जमीन पर तुम्हारे पांव ही नहीं टिकते थे।'' फिर तनिक संयत होकर बोली, ''उस वक्त रेडियो की नौकरी कर ली होती तो इस वक्त क्या मालूम तुम डायरेक्टर होते, पंडारा रोड पर तुम्हें बंगला मिला होता, बाद में पेंशन मिलती, मैं भी कुछ सीख-पढ लेती।''
उन्हीं दिनों अनेक अन्य अनुभव भी हुए। आजादी के बाद कुछ ही सालों में बडा अंतर आ गया था। उसके अनेक साथी छिटककर अलग हो गए थे। वैद्य रमानाथ का औषधालय चल निकला। हंसराज को ठेके पर ठेके मिलने लगे। मोहनसिंह विदेशी दूतावासों के साथ संपर्क बढाने लगा, उनके पेम्फलैट छापता और देखते ही देखते उसने अर्जुनदास के ही मुहल्ले में एक दुमंजिला मकान खरीद लिया। वारे-न्यारे होने लगे।
उसकी आंखों के सामने बोधराज का चेहरा घूम गया। बोधराज स्वतंत्रता संग्राम के विलक्षण सेनानी रह चुके थे। जीवन के सोलह वर्ष जेलों में काट चुके थे, पर आजादी के बाद एक ही झटके से मानों घूरे पर फेंक दिए गए थे। आजादी के बाद एक नई पौध उभरी थी - सियासतदानों की। सियासतदान उभरने लगे थे और देशभक्त घूरे पर फेंक दिए गए थे। आजादी के बाद पांचेक साल में ही, वह आदमी जो कभी घर-घर जाकर स्वतंत्रता-संग्राम के लिए लोगों को उत्प्रेरित किया करता था, अब अपने मुहल्ले में पडा सड रहा था, देश को कहीं भी उसकी जरूरत नहीं रह गई थी। और काम तो क्या करता, लोगों के घर-घर जाकर तंबाकू नोशी के नुकसान समझाता फिरता था और उनसे वचन लेता फिरता था कि वे सिगरेट नहीं पिएंगे। हुआ यह कि हंसराज - जो आजादी के बाद ठेके लेने लगा था, बोधराज को राजधानी में ले गया था। वहां वह उन्हें किसी केन्द्रीय नेता के पास ले गया। केन्द्रीय नेता बडे आदर-सत्कार के साथ बोधराज से मिले थे, हंसराज को धन्यवाद कहा था कि उसके सौजन्य से वह एक अनन्य देशसेवी के दर्शन कर पाए हैं। हंसराज ने ही यह सुझाव रखा कि एक समाज कल्याण योजना बनाई जाए जिसकी अध्यक्षता बोधराज जी करें। अभी बात चल ही रही थी और बोधराज प्रस्ताव की तह तक पहुंचने की कोशिश कर ही रहे थे कि उनके हाथ में कलम थमा दी गई थी। और वह किसी कागज पर हस्ताक्षर कर रहे थे।
यह तो बहुत बाद में उन्हें चेत हुआ कि हंसराज उनके साथ दांव खेल गया है। उन्हीं का नाम लेकर उन्हीं के नाम पर पचास हजार रूपए का अनुदान हडप गया है। यह उन्हें तब पता चला जब साल भर बाद, सरकार की ओर से बोधराज को एक पत्र मिला कि अनुदान का हिसाब भेजें, और बोधराज भौंचक्के रह गए थे, और बोधराज की वह रगडाई हुई थी कि दिन को भी उन्हें तारे नजर आने लगे थे।
वहीं स्वतंत्रता सेनानी बोधराज अब लोगों के सिगरेट छुडवाता फिर रहा था।
ऐसे ही धक्के अर्जुनदास के दिल और दिमाग को उन दिनों बार-बार लगते रहे थे और वह पिटा-पिटा सा महसूस करने लगा था।
एक दिन उसे भी एक पत्र मिला। जिस समय डाकिया चिठ्ठी लेकर आया उस समय कमला घर पर नहीं थी। वास्तव में यह पत्र न होकर एक निमंत्रण था। स्वतंत्रता सेनानियों का कोई जमाव राजधानी में होने जा रहा था और उसमें एक जाने-माने स्वतंत्रता सेनानी के नाते उसे आमंत्रित किया जा रहा था। पत्र के साथ एक फॉर्म भेजा गया था जिसे भरकर सम्मेलन के कार्यालय को भेजना था। फॉर्म में यह पूछा गया था कि स्वतंत्रता संघर्ष में आपका क्या योगदान रहा है। उनके प्रश्न थे ः कितने दिन जेल काटी, कभी भूख हडताल की, जेल के अंदर, जेल के बाहर, कभी किसी लाठी चार्ज में जख्मी हुए, किसी गोली-कांड में, रचनात्मक कार्य में कैसा योगदान रहा, कभी पदाधिकारी रहे तो, रहे हों तो किस समिति के स्थानीय, जिला अथवा प्रादेशिक? आदि आदि। लगता था इस फॉर्म में दी गई सूचनाओं के आधार पर सरकार स्वतंत्रता आंदोलन का कोई वृहद इतिहास-ग्रंथ छापेगी। पत्र देख चुकने पर उसके मन की पहली प्रतिक्रिया तो यही हुई कि चलो, देर से ही सही, सरकार को स्वतंत्रता सेनानियों की सुधि तो आई। उनकी निष्ठा, उनके काम पर उनकी कुर्बानियों की ओर किसी का ध्यान तो गया।
कमला अभी बाहर से लौटी नहीं थी, और अर्जुनदास हाथ में पत्र उठाए, खाट की पाटी पर बैठा अपने योगदान पर विचार कर रहा था। वह कमला को यह पत्र और फॉर्म दोनों दिखाना चाहता था। और उसकी प्रतिक्रिया जानना चाहता था। कमला के इंतजार में वह बार-बार बरामदे में जाकर खिडक़ी में से दाएं-बाएं बाहर देखता रहा था। और गली की ओर देखते हुए पहली बार उसका ध्यान इस ओर गया था कि मुहल्ला अब भले लोगों के रहने लायक नहीं रह गया है। कमला की बहुत दिनों से शिकायत रही थी कि मुहल्ले में तरह-तरह के लोग आ गए थे। शराब और जुए के अड्डे बन गए थे, माल लादने वाले ट्रकों के ड्राइवर जो सुनने में आया था, तस्करी भी करने लगे थे। कमला कहा करती थी, बेटी बडी हो रही है, अब हमारा यहां पर रहना ठीक नहीं। पर जवाब से अर्जुनदास तुनक उठा करता था।
''हम लोग शरीफ हैं तो ये लोग बदमाश है, क्या? हाथ से काम करने वाले लोग कभी बुरे नहीं होते। इस बात को समझ लो।''
पर आज पहली बार उसे लगा था कि नहीं, मुहल्ला बदनाम बस्ती सा बनता जा रहा है। इसमें अब रहना ठीक नहीं, बच्चों पर बुरे संस्कार पडेंग़े।
और तभी उसे कमला सडक़ पर आती नजर आई थी और उस पर आंख पडते ही उसका दिल भर आया था। पत्नी को घर के अंदर देखना एक बात है, और उसे सडक़ पर अकेले चुपचाप चलते हुए देखना बिल्कुल दूसरी बात। तब उसके प्रति अपनेपन की भावना अधिक जागती है। तब उसमें स्त्री सुलभ कमनीयता भी होती है और अपनत्व का भाव भी। तभी अर्जुनदास को इस बात का भी भास हुआ कि उसकी पत्नी को उसके साथ रहते हुए बहुत कुछ सहना पडा है कि वह उसे कोई भी सुख-सुविधा नहीं दे पाया। कमला के प्रति भावना का ज्वार-सा उसके अंदर उठा था। जब कमला अंदर पहुंची, हाथ-मुंह धोए, दो घूंट पानी पिया और दुपट्टे से हाथ-मुंह पोंछती हुई उसके पास आकर बैठी तो उसने बात चलाई।
''सरकार की तरफ से चिठ्ठी आई है।''
''तुम्हें?'' उसने तनिक हैरानी से पूछा।
''हां, मुझे।''
''क्या लिखा है?''
''बुलाया है।''
''तुम्हें बुलाया है? सरकार को तुम्हारी क्या जरूरत पड ग़ई?''
''आजादी की वर्षगांठ है, बहुत से लोगों को बुलाया है जिन्होंने आजादी की लडाई में भाग लिया था राजधानी में।''
''वहां तुम लोगों का अचार डालेंगे क्या?'' और कमला हंस दी थी।
कमला की लापरवाही-सी हंसी को लेकर अर्जुनदास को तनिक झेंप हुई थी। वह स्वयं सारा वक्त सरकार की आलोचना करने लगा था, पर यह पत्र मिलने पर उसे अपनी विशिष्टता का कुछ-कुछ भास होने लगा था।
''जाओगे?''
''हां, जाएंगे, क्यों नहीं, जाएंगे। आजादी की सालगिरह है।'' फिर फॉर्म की ओर इशारा करते हुए बोला, ''यह फॉर्म भेजा है।'' और फॉर्म कमला की ओर बढा दिया।
कमला देर तक बैठी उसे पढती रही। फिर बोली, ''यह किसलिए है? क्या देशभक्तिों को उनकी देशसेवा का मुआवजा मिलेगा?'' और लापरवाही से फॉर्म पति को लौटा दिया। मुआवजे का ख्याल अर्जुनदास को नहीं आया था। मुमकिन है सरकार कुछ मुआवजा देने की ही सोच रही हो। बात अनोखी-सी थी पर देर तक उसके मन में बार-बार उठती रही। वह राजधानी गया था। उसके शहर से नौ और व्यक्ति भी गए थे। राजधानी पहुंचने पर वह बेहद उत्साहित हुआ था। स्वतंत्रता सेनानियों का कैंप लगा था। तंबू ही तंबू थे। पूरी की पूरी बस्ती उठ खडी हुई थी। अर्जुनदास पुलक-पुलक उठा था। मेरी भी इस महायज्ञ में अल्प-सी आहुति रही है, वह मन ही मन बार-बार कहता। राजधानी में रैली क्या रही थी मानो मानवता का सैलाब उमड पडा था। उसका मन चाहा इस जनप्रवाह में डूब जाए, उसे बार-बार रोमांच हो आता। मैं इस मिट्टी की उपज हूं और अपने देश की इसी मिट्टी में मिल जाना चाहता हूं। इसी प्रकार के उद्गार उसके दिल में हिलोरे ले रहे थे।
और यहां पहुंचकर एक और निर्णय उसने भावावेश में कर डाला था।
बात मुआवजे को लेकर ही थी। कमला को फार्म का आशय ठीक ही सूझा था।
जब से अर्जुनदास राजधानी पहुंचा था, कैंप में जगह-जगह सरकारी भत्ते की ही चर्चा सुन रहा था। सरकार प्रत्येक स्वतंत्रता सेनानी का मासिक भत्ता बांधने जा रही थी, ऐसा सुनने में आया था। चारो ओर उसी की चर्चा चल रही थी। तरह-तरह की टिप्पणियां सुनने को मिलतीं। उसके अपने शहर से नौ और देशसेवी आए थे।
''क्या सभी को एक जैसा भत्ता देंगे? इसमें क्या तुक है? जिसने तीन महीने जेल काटी है, उसे भी उतना ही भत्ता मिले जितना उस आदमी को जिसने ग्यारह साल जेल काटी है?'' कोई कह रहा था। इस पर किसी ने हंसकर जोडा, ''नहीं सबको तोल-तोलकर मिठाई बांटेंगे, कुर्बानी के मुताबिक।''
''क्या सूत कातना भी कुर्बानी माना जाएगा? प्रभात फेरी भी? तामीरी काम भी? इसे भी फॉर्म में लिखूं?''
उन्हीं के तंबू में एक बार झगडा उठ खडा हुआ था। किसी ने कहा, ''अब मैं नाम नहीं लेना चाहता लेकिन रोशन लाल ने कौन-सी जेल काटी है? एक जुलूस में उसने भाग लिया था जिस पर लाठी चार्ज हुआ था। मैंने अपनी आंखों से रोशन लाल को वहां भागते हुए देखा था, भागकर हलवाई के तख्ते के नीचे छिप गया था। वह भी यहां भत्ता लेने पहुंचा हुआ है।''
इस पर एक और ने जोडा, ''ऐसे लोग भी भत्ता मांगेंगे जो कांग्रेस में काम भी करते थे और अंग्रेज सरकार की मुखबरी भी करते थे।''
''कुर्बानी की तसदीक कौन करेगा?''
कोई कह रहा था, ''कौन दरयाफ्त करने जाएगा कि मैंने तीन महीने जेल काटी है या तीन साल? भत्ता मांगने वालों में ऐसे लोग भी होंगे जो झूठी दर्ख्वास्तें देकर भत्ता मंजूर करवा लेंगे।''
इस पर कोई आदमी बिफरकर बोला था, ''और जो मर गए, जो फांसी चढ ग़ए? उन्हें क्या मिलेगा?''
दो आदमियों को उसने फुसफुसाते हुए भी सुना था।
''दर्ख्वास्त तो दे दो, जो मन में आए भर दो, तसदीक करवा लेंगे। तसदीक करने वाला भी मिल जाएगा, क्या मुश्किल है।''
इसी तरह एक आदमी घबराया हुआ, चिंतित-सा कह रहा था ः
''मैंने तो जेल, सियालकोट में काटी है, और वह पाकिस्तान में चला गया है। मैं तसदीक किससे करवाऊंगा ''
तरह-तरह के टिप्पण सुनता रहा था और उत्तरोत्तर अटपटा महसूस करता रहा था। कहीं कुछ घट रहा था जो उसकी समझ में नहीं आ रहा था।
नतीजा यह हुआ कि वह कार्यालय में अपना फॉर्म दिए बिना घर लौट आया था।
और जब घर लौटकर आया और पत्नी को सारी वार्ता कह सुनाई तो भावावेश में बोला, ''मैंने भत्ते के लिए दर्ख्वास्त नहीं दी। यह मेरी देशसेवा का अपमान नहीं है क्या? क्या मैं जेल इसलिए गया था कि एक दिन मैं उसके लिए भत्ता मांगूंगा?''
कमला चुप रही थी। वह न तो निराश हुई थी न ही आश्वस्त, केवल मुस्कराकर सिर हिला दिया था, ''अगर तुम दर्ख्वास्त देकर आते तो मैं जरूर हैरान होती।'' उसने कहा था और वह अपने काम में लग गई थी।
यह बात भी धीरे-धीरे आई-गई हो गई थी, अर्जुनदास को इसका खेद भी नहीं था, वह इसे भूल भी चुका था, पर कहीं पर एक हलका-सा बोझ उसकी छाती पर छोड ग़ई थी। बाद में बहुत से लोगों को भत्ता मिला। महंगाई बढ रही थी, इस छोटे से भत्ते से निश्चय ही लोगों को लाभ पहुंचा था, पर घर पर इसकी चर्चा बंद हो गई थी, न कभी अर्जुनदास ने की, न कभी कमला ने।
राजधानी से लौटते समय एक और अटपटा-सा अनुभव अर्जुनदास को हुआ था, जिसने निश्चय ही उसे विचलित किया था। उसे लगा था जैसे कुछ घट रहा है जो उसकी पकड में नहीं आ रहा जैसे कोई चीज पटरी पर से उतर गई हो।
राजधानी से लौटते समय रेलगाडी ख़चाखच भरी थी। उसके डिब्बे में उसके अपने शहर के देशवासियों के अतिरिक्त बहुत से वयोवृध्द देशभक्त बैठे थे। किसी को कहीं पर उतरना था, किसी को दूसरे स्टेशन पर। जब गाडी चली तो प्लेटफॉर्म पर नारे गूंज उठे। वातावरण में फिर से उत्तेजना और देशभक्ति की लहर दौड ग़ई। अर्जुनदास भी इससे अछूता नहीं रहा। लगा पहले वाला वक्त फिर से लौट आया है। जब गाडी ने रफ्तार पकडी तो डिब्बे में बैठे बहुत से वयोवृध्द देशभक्त एक आवाज होकर गाने लगे ः
''जरा वी लगन आजादी दी
लग गई जिन्हां दे मन विच्च!
और मजनूं वण फिरदे ने
हर सहरा हर वन दे विच्च!''
कुछ लोग सुर में गा रहे थे। कुछ बेसुरे थे, कुछेक की आवाज सधी हुई, कुछेक की खरखराती। कोई पंचम में, कोई सप्तम में, कुछेक को खांसी आ गई, पर मस्ती में सभी के सिर हिल रहे थे, सभी वज्द में थे।
दूसरी बार जब गीत की दूसरी पंक्ति गाई गई ः
''लग गई जिन्हा दे मन दे विच्च!''
तो डिब्बे में कहीं से हंसने, मसखरी करने की आवाज आई ः
'' वि च च च!''
''ओ बाबू, यह विच्च क्या हुआ?'' कहीं से ठहाका फूटा।
सचमुच इस विच्च शब्द से बडी मजाकिया स्थिति बन गई थी। दूसरी बार जय देशभक्तिों ने वही पंक्ति दोहराई, ''हो गई जिन्हां दे मन दे विच्च!''
तो चार-पांच मनचले डिब्बे में एक ओर को बैठे हुए एक साथ बोल उठे, ''विच्च'' और फिर ठहाका हुआ।
अब की बार भी देशभक्तों ने विशेष ध्यान नहीं दिया पर फिर अगली पंक्ति के अंत में यही शब्द आया।
''ओह मजनूं बण फिरदे ने
हर सहरा, हर बन दे विच्च!
तो अब की बार पूरा डिब्बा गूंज उठा ः
''विच्च!''
अर्जुनदास मन ही मन बौखला उठा। तमतमाते चेहरे के साथ उठ खडा हुआ।
''आपको शर्म आनी चाहिए देशभक्ति के गीत का आप मजाक उडा रहे हैं?''
इस पर चार-पांच नौजवान फिर बोल उठे, ''विच्च!''
और फिर ठहाका हुआ।
पर अर्जुनदास तर्जनी हिला-हिलाकर गुस्से से बोलने लगा, ''आपने शर्म हया बेच खाई है? ये लोग जो यहां बैठे हैं, सब देशभक्त हैं, इन्होंने कुर्बानियां दी हैं, जेले काटी हैं, देश आजाद हुआ तो इनके बल पर और आज ''
अर्जुनदास का वाक्य अभी पूरा नहीं हुआ था कि फिर से कोई मनचला चहक उठा,'' विच्च!''
रेलगाडी आगे बढती जा रही थी। अर्जुनदास मन मसोसकर बैठ गया। सारा मजा किरकिरा हो गया था। त्याग और आत्मोत्सर्ग का जो माहौल इस गीत से बनने लगा था, वह छिन्न-भिन्न हो गया। कुछ लोगों पर अभी भी वज्द तारी था। उनमें से एक ने फिर से कोई इंकलाबी गीत गाना शुरू कर दियाः
''सर फिरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं
देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में हैं।''
कुछ देर के लिए तो डिब्बे में चुप्पी छा गई। लोग ध्यान से सुनने लगे। अर्जुनदास ने भी मन ही मन कहा, ''क्यों नहीं सुनेंगे इस गीत को तो देश का दुश्मन भी सिर झुकाकर सुनेगा। यह गीत लिखने वाला तो स्वयं फांसी के तख्त पर झूल गया था।
पर अर्जुनदास भूल कर रहा था। मनचले फिर से खी-खी करने लगे थे। एक ने फिर से ''विच्च'' चिल्लाकर कहा। दूसरे ने गीत के गंभीर स्वर की नकल उतारते हुए कहा, ''हाय, मार डाला!'' तीसरे ने दिल पर हाथ रखकर कहा, ''कुंद छुरी से जबह कर डाला!'' और फिर से ठहाके लगने लगे।''
अर्जुनदास को अभी भी समझ लेना चाहिए था कि बीते काल के माहौल को फिर से पकड पाने का प्रयास, उसे फिर से जीवित कर पाने का प्रयास विफल रहेगा, कि उनकी मानसिकता पकड नहीं पा रही है, कि उनका कालखंड समय के प्रबल प्रवाह में कब का डूब चुका है।
राजधानी से लौटकर अर्जुनदास अपनी नई गान मंडली संगठित करने में जुट गया था। बेशक राजधानी के उस दौरे से से धक्का लगा था पर वह बिल्कुल अप्रत्याशित भी नहीं था। पिछले दौर की अपनी मांगे थीं, आज के दौर की अपनी मांगे हैं। अपनी भावुकता भरी यादों के कारण तो वह पिछले दौर से चिपटा नहीं रह सकता था।
उसके मन में कभी-कभी जरूर सवाल उठता ः क्या मैं दिग्भ्रमित हो गया हूं? क्या सचमुच मैं आदर्शवाद के हवाई घोडे पर सवार इधर-उधर भटक रहा हूं? क्या वे लोग जो आजादी मिलने के बाद अपने पैर जमाने के लिए ठेकें और लाइसेंस हथियाने लगे थे, ज्यादा समझदार थे जो हवा का रूख पहचानते थे? पर अर्जुनदास का मन नहीं मानता था कि वह भूल कर रहा है। अर्जुनदास की गाडी पहले की ही भांति चलती रही, अभी भी दुकान थी, प्रकाशन गृह था। पर अब उसमें समाजवाद का समर्थन तथा प्रचार करने वाली पुस्तकें अधिक छपती थीं, वाम कवियों के संग्रह छपते थे। अर्जुनदास सन् 45 के नाविक विद्रोह के बाद जब जेल से छूटकर आया था तो मार्क्सवादी विचारों का रंग उस पर गहरा हो गया था। जेल के अंदर कुछ ऐसे देशभक्त भी थे जो मार्क्स और लेनिन की चर्चा किया करते थे। अर्जुनदास उनकी बातें सुनता रहता, उन्होंने कुछ साहित्य पढने को दिया। उसे भी वह बडे चाव से पढता रहा था। अर्जुनदास पहले की तुलना में और ज्यादा कर्मठ और उत्साही हो गया था। उधर गान मंडली भी बदल गई थी। नए-नए युवक युवतियां उसमें आ गए थे, स्फूर्ति और उत्साह पाए जाने लगे थे। अमरदास उन्हीं में से था। हाथ पसारकर ऐसी तान छेडता कि सारा पंडाल गूंज उठता। सच तो यह है कि अब जलसों-जुलूसों के मात्र देशभक्ति के अथवा गांधी-नेहरू के प्रति श्रध्दा के गीत बहुत जमते भी नहीं थे। भले ही स्वर योजना कितनी ही सुरीली क्यों न हो। मात्र भारत माता का गौरवगान दिल को छूता नहीं था, झिंझोडता नहीं था। अर्जुनदास की दुकान और प्रकाशन गृह पहले ही तरह घिसट रहे थे। न दो कौडी क़ी कमाई आजादी के पहले हुई थी, न दो कौडी क़ी कमाई आजादी के बाद हो रही थी। पर अपने ढर्रे पर अर्जुनदास के पांव फिर भी नहीं डगमगाए थे। अब वह हर बात का आर्थिक-सामाजिक कारण निकाल लेता और संतुष्ट हो जाता। यदि पत्नी के दिल में अभी भी अच्छे रहन-सहन की चाह है तो इसलिए कि बचपन में उसका लालन-पालन मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। और मध्यवर्ग वह वर्ग है जो सदा धन-ऐश्वर्य को प्राथमिकता देता है, आदि आदि। पत्नी की मांगे इतनी बडी और असाध्य नहीं थी। पर अर्जुनदास की धृष्टता उनके आडे आती रही थी। आदर्शवाद ने उसे अंदर से कडा बना दिया था वरना क्या था, वह ऐसे घर में रहना चाहती थी जिसके आगे छोटा सा आंगन हो, जिसमें वह बेल-बूटे उगा सके। या कि उनका घर किसी संकरे बाजार में न होकर किसी खुले इलाके में हो। इसके पिता छोटे सरकारी अफसर रहे थे, इसलिए उनका रहन-सहन अधिक सुचारू और करीने वाला था, समय पर भोजन वह भी मेज पर, साफ-सुथरे कपडे, हर चीज अपनी जगह पर, घर में कहीं भी बेतरतीबी नहीं थी, बडा सुचारू सुव्यवस्थित जीवन था।
पर अर्जुनदास को इसमें भी, अंग्रेजियत की बू आया करती थी। सुव्ववस्थित रहन-सहन की इन विशिष्टताओं को भी वह अंग्रेजियत का नाम दिया करता था। एक बार यह वह जमाना था जब शादी के कुछ ही साल बाद वह सक्रिय रूप से रंगमंच पर काम करने लगा था। वे दोनों किसी रेलवे स्टेशन पर उतरे थे और कुछ फल खरीदकर साथ में ले लेना चाहते थे। उसकी पत्नी आम खरीदना चाहती थी जबकि वह खरबूजा लेने के हक में था। खरबूजे की तुलना में उसकी पत्नी को आम ज्यादा पसंद था और जब उसने आम लेने पर इसरार किया तो वह तुनक उठा था। वह आम इसलिए लेना चाहती है क्योंकि आम ज्यादा महंगा फल है, उसे ऊंचे दर्जे के लोग खाते हैं, जबकि खरबूजा आम आदमी का फल है। अंत में वह चुप हो गई थी और उसने खरबूजा लेना ही मान लिया था, लेकिन उसे यह तर्क सुनकर बडा अचंभा हुआ था।
''मैंने कब कहा है आम बडे आदमियों का फल है। और खरबूजा छोटे आदमियों का? यह तुम कैसी बातें करने लग जाते हो?'' और वह रो पडी थी।
आज इस छोटी सी घटना को याद करके उसका मन आत्म-ग्लानि से भर उठता था। पर उन दिनों उसे इसका कोई क्षोभ नहीं हुआ था।
जिंदगी इसी तरह हिचकोले खाती यहां तक पहुंची थी। जमाना बीतता गया था। न तो अर्जुनदास की अपनी दिनचर्या बदली थी न पत्नी की। किताबों की कमाई में वृध्दि तो असंभव थी, हां, पत्नी की जोड-तोड से नौका डूबने से बची रही। वह स्कूल में भी पढाती रही और दुकान का काम भी देखती रही। घर बना रहा, बेटी बडी हो गई, उसकी शादी भी हो गई। बेटा जहीन निकला उसे राजनीति से तो चिढ थी, पर किताबों के माहौल में पला था इसलिए उसकी जिज्ञासा बनी रही और वह अपनी नौका अलग से ठेल ले जाने में सफल हो गया। अधेड उम्र तक पहुंचते-पहुंचते, हर आए दिन विचित्र अनुभव होते रहे थे। उनकी बेटी उनके आदर्शवाद की खिल्ली उडाने लगी थी।(वैसे ही जैसे, बरसों पहले रेलगाडी क़े सफर में, मनचले युवक देशभक्तों के गीत की खिल्ली उडाते रहते थे।) बेटी को, या तो मन-ही-मन अपनी मां के साथ हमदर्दी थी कि उसके पिता ने उसकी मां को परेशान किया था और इसके लिए वह उसे क्षमा नहीं कर पा रही थी। या यही नहीं, उसकी मूल आपत्ति उसकी मान्यताओं, उसकी आदर्शवादिता के प्रति थी, जिसमें उसका कोई विश्वास नहीं था। उसकी बातें सुनते हुए, अर्जुनदास हताश तो नहीं होता था - हर युग के अपने ध्येय अपने आदर्श होते हैं - उसे अचंभा इस बात का होता था कि उसकी आदर्शवादिता उसकी बेटी को कहीं पर भी छूती तक नहीं थी। ''बस बस, पिताजी, सुन लिया, बहुत सुन लिया'' वह उसका मुंह बंद करने के लिए खीझकर कहती और उठकर चली जाती थी।
बेटे ने भी कुछ बरस बाद ऐसा ही रूख अपनाया था। जब बी।ए। की पढाई खत्म कर चुका तो एक दिन बाप से तुनककर बोला, ''न आपको कोई पूछता है, न जानता है, आप मेरी मदद क्या करेंगे?''
जहां धन का अभाव हो वहां जिंदगी आए दिन थपेडे मारती रहती है, छोटे-मोटे थपेडे तो यों ही पडते रहते हैं, पर बडा धक्का तभी लगा जब पहले एक फिर दूसरा बच्चा, हाथ से निकल गए थे।
और जब पति-पत्नी वृध्दावस्था में प्रवेश कर रहे थे तो पहली बार अर्जुनदास को इस बात का भास होने लगा था कि उसका आदर्शवाद तो रोशनी की लौ की तरह उसका पथ प्रदर्शन करता रहा था, कुछ-कुछ मंद पडने लगा और यह सवाल बार-बार उसके मन में उठने लगा था। क्या मैंने अपनी जिंदगी नासमझी में व्यतीत की है? यदि मैं फिर से जन्म लेकर आऊं तो क्या फिर से ऐसा ही जीवन व्यतीत करना चाहूंगा?
मैदान में बैठा वह अपने से यही प्रश्न पूछ रहा था और उसे कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिल रहा था। बैठे-बैठे ही वह बुदबुदाया।
''जिस दिल पे मुझको नाज था,
वह दिल नहीं रहा।''
तभी रंगमंच की ओर घंटी की आवाज सुनाई दी। अर्जुनदास मानों तंद्रा से जागा। मैदान में अच्छी-खास भीड ज़मा थी। रोशनी कम थी, केवल कुछ खंभों पर ही तारें जोडक़र रोशनी के कुमकुमे लगाए गए थे, वह भी मध्दम से। कार्यक्रम आरंभ होने वाला था।
सहसा अर्जुनदास को चेत हुआ, कार्यक्रम के बाद युवक उसके पास आएगा, मार्गदर्शन के लिए, मैं उससे क्या कहूंगा? क्या मैं उससे कहूंगा कि बेटा, कूद जाओ, दिल का रास्ता ही सीधा रास्ता होता है या मैं उससे कहूंगा कि जो निर्णय करो, सोच-विचार कर करो, अपनी स्थिति पर विचार करके, अपने दायित्वां पर भी।
उसकी आंखों के सामने युवक का चेहरा उभर आया, ऊंचा-लंबा कद छरहरा बदन, मसें भीगी हुईं, स्वच्छ उत्साह भरी आंखें, अनछुआ व्यक्तित्व, कहीं किसी थपेडे क़ी छाया नहीं, न ही किसी संघर्ष का तनाव। उत्साह ही उत्साह, उत्साह और उत्सुकता। आज वह उस स्थल पर खडा है जहां से उसकी जीवनयात्रा आरंभ होगी।
मैं उससे क्या कहूंगा? उसे कहूं कि प्रत्येक ध्येय की एक उम्र होती है, वह उस समय तक जीवित रहता है और लोगों को उत्प्रेरित करता रहता है जब तक उसके चरितार्थ किए जाने की संभावना बनी रहती है। जब वह संभावना समाप्त हो जाती है तो उस ध्येय की प्रासंगिकता भी समाप्त हो जाती है, यदि एक बार पता चल जाए कि वह जीवन की संभावनाओं से दूर हो गया है तो उसकी सार्थकता समाप्त हो जाती है।
पर क्या वह समझ पाएगा? और क्या सचमुच इस युवक के ध्येय की प्रासंगिकता समाप्त हो गई है? क्या सचमुच स्थितियां बदल गई हैं और ध्येय की सार्थकता मंद पड ग़ई है? कहीं ऐसा तो नहीं - अर्जुनदास ने मन ही मन कहा - कि मैं अपनी कमजोरी को आदर्शों-ध्येयों पर थोप रहा हूं? यह समझ रहा हूं कि जिन आदर्शों का दामन पकडक़र मैं दसियों साल पहले इस रास्ते पर आया था वे अपनी सार्थकता खो चुके हैं। वास्तव में अपने जीवन की विकट स्थितियों को मैं संभाल नहीं पाया, अपने निजी विरोधाभासों को मैं देख नहीं पाया, और आदर्शों और ध्येयों को दोष देने लगा हूं।
सहसा उसके कानों में किसी गीत के स्वर पडे। बहुत से कंठ एक साथ गा रहे थे, और स्वर लहरियां वातावरण में हिलोरे लेने लगी थीं। अर्जुनदास उठ खडा हुआ और धीरे-धीरे चलता हुआ दर्शकों की पांतों की ओर बढ ग़या। उसे पता नहीं चला कि कब उसके वयोवृध्द साथी, उसकी पत्नी, अन्य लोग, मैदान में पहुंच गए थे और कहां पर जा बैठे थे। खंभों पर लगी मध्दिम-सी बत्तियों की रोशनी में वह मैदान में बढता हुआ, पिछली एक पांत में बैठ गया। मैदान में भारी भीड ज़मा हो गई थी और ऊंचे मंच पर, माइक के पीछे एक गान मंडली खडी ग़ा रही थी। मंडली के आगे वही युवक खडा था, अपना दायां हाथ ऊंचा उठाए, गहरी रूंधी हुई भावना में ओतप्रोत आवाज में वह सहगान में अपनी मंडली का नेतृत्व कर रहा था। सारा वातावरन उद्वेलित होने लगा था।
''एक साथ है कदम, जहान साथ है ''
लोगों की भीड पर उस गीत का असर होने लगा था। देश की विकट स्थिति आंखों के सामने उभरने लगी थी, मानो उनकी आवाज में वह दारूण स्थिति मुखर हो उठी हो। स्वर लहरियां उठ रही थी, गीत के शब्द दिलों पर दस्तक देने लगे थे। अर्जुनदास पीछे की कतारों में से एक कतार में चुपचाप आकर बैठ गया था। लोग इस भावोद्वलित गीत को सुनने में इतने तन्मय थे कि संयोजकों में से किसी का ध्यान वयोवृध्द अर्जुनदास की ओर नहीं गया, नहीं तो उसके पास दौडे आते और उसका हाथ थामकर उसे अगली पांत में बैठने के लिए ले जाते। गीत समाप्त हुआ, पर उसका स्पंदन वायु मंडल को उद्वेलित किए रहा। फिर एक और गीत गाया गया, वही मंडली फिर से गा रही थी। मंडली के पास केवल एक ढोल और एक हारमोनियम था, गानेवाले भी सही निपुण कलाकार नहीं थे, परंतु भावना सभी अभावों की पूर्ति कर रही थी, कहीं कुछ था जो उनके अनगढ, क़हीं-कहीं बेमेल आवाजों में भी मर्मस्पर्शी संगीट का संचार कर रहा था। अर्जुनदास को बैठे-बैठे अमरदास याद हों आया जो हाथ पसारकर ऐसे तान छेडता था कि सारा पंडाल गूंज उठता था। अमरदास जो अभावों में मरा था, पर जो हजारों-हजार लोगों के दिलों को बांध लिया करता था।
अर्जुनदास धीरे-धीरे उस कार्यक्रम में खोता चला गया। ऐसा अकसर होता था, गीत सुनते हुए भाव-विभोर हो उठता था, पर कार्यक्रम समाप्त हो जाने पर उसका नशा जल्दी उतरने भी लगता और वस्तुस्थिति के कंकड-पत्थर जैसे फिर से उसे चुभने लगते।
फिर वैसी ही बात हुई जैसी दसियों साल पहले, अर्जुनदास की जवानी के दिनों में हुई थी, मानो अतीत के धुंधलके में घटी हो। वही छरहरे शरीर वाला युवक मंच पर लालटेन उठाए बूढे बुजुर्ग की दाढी लगाए, ऊंची थरारती आवाज में कह रहा था, ''सुनोगे? इस विपदा की कहानी सुनोगे?''
और दर्शकों की भीड दत्तचित्त सुने जा रही थी। उस युवक के हाथ में झूलता हरीकेन लैंप लगता किन्हीं सुनसान बियाबानों को लांघ रहा था। लगभग डेढ घंटे बाद खेल समाप्त हुआ। खेल समाप्त होने पर वही युवक मंच पर से उतर आया और झोली पसारे मैदान में बैठे दर्शकों की पांतों की ओर बढने लगा। युवक के पीछे-पीछे मंडली के अन्य युवक युवतियां भी उतर आए थे। सभी नीचे पहुंचकर छितर गए थे और झोली फैलाए एक पांत से दूसरी पांत की ओर जाने लगे थे। जब वही युवक, झोली फैलाए, अर्जुनदास के निकट, सामने वाली पांत के सामने से गुजर रहा था तो एक स्त्री ने भावविह्वल होकर अपने दोनों हाथ उठाकर अपने कानों में से झूमर उतारकर युवक की झोली में डाल दिए थे।
अर्जुनदास चौंका, उसने ध्यान से देखा उसकी पत्नी कमला ने झूमर उतारकर झोली में फेंके थे। उसका एकमात्र झूमरों का जोडा जो बेटी की शादी के समय उसने अपने लिए बनवाया था। झूमर फेंक चुकने के बाद, कमला सिर पर अपनी ओढनी ठीक कर रही थी और अपनी आंखें पोंछ रही थी।
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