हर कौम पुकारेगी हमारे हैं हुसैन
मासूम ज़हरा, जेo एनo यूo, नई दिल्ली
लखीमपुर खीरी,किसी शायर ने कहा है कि इंसान को वेदार तो हो लेने दो, हर कौम पुकारेगी हमारे हुसैन हैं। हिजरी कैलेंडर का नया साल मुहर्रम महीने से शुरू होता है। साल शुरू होते ही पैगम्बरे इस्लाम के नवासे हजरत इमाम हुसैन की शहादत तमाम इंसानों के दिलों दिमाग में ताजा होने लगती है। लगभग चौदह सौ साल पहले हजरत इमाम हुसैन ने हक और इंसाफ के लिए कर्बला के मैदान में अपने बहत्तर साथियों के साथ अपनी जान की कुर्बानी दी थी।
पैगम्बरे इस्लाम हजरत मुहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन की पैदाइश इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक पांच शाबान सन् 04 हिजरी को मदीना शरीफ में हुई। पैदाइश के सातवें दिन आपके नाना ने आपका नाम हजरत इमाम हुसैन रखा और अकीका कराया। पैगम्बरे इस्लाम अपने नवासे हजरत इमाम हुसैन से बहुत मोहब्बत करते थे। उन्होंने फरमाया कि हुसैन मुझसे हैं और मै हुसैन से। जिसने हुसैन से मोहब्बत की उसने अल्लाह से मोहब्बत की। हजरत इमाम हुसैन ने अपने जीवनकाल में पैदल चलकर पचीस हज किए। हजरत इमाम हुसैन की शहादत की खबर उनके नाना पैगम्बरे इस्लाम को अल्लाह की तरफ से उनके पैदाइश के समय ही दे दी गई थी। मुआविया के निधन के बाद उनके पुत्र यजीद ने हुकूमत की बागडोर संभाली और अन्य लोगों के साथ हजरत हुसैन से भी बैअत लेने का आदेश जारी कर दिया। चूंकि यजीद इस्लामी शरीयत के खिलाफ था। इसलिए हजरत इमाम हुसैन ने यजीद की बैअत कुबूल नहीं की और अपने वतन मदीना शरीफ से पलायन करके कूफा की तरफ रवाना हो गए। अनेक कठिनाइयों और परेशानियों का सामना करते हुए दो मोहर्रम सन् 61 हिजरी को हजरत इमाम हुसैन अपने साथियों सहित कर्बला नामक स्थान पर ठहर गए। उधर यजीद के आदेश पर इब्नेसाद नामक व्यक्ति तीन मुहर्रम को चार हजार की फौज लेकर कर्बला पहुंच गया। और वहां पर धीरे-धीरे बाइस हजार का लश्कर जमा हो गया। मुहर्रम की सात तारीख को हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों का पानी बंद कर दिया गया। नौ मोहर्रम की रात हजरत इमाम हुसैन को अपनी शहादत का एहसास हो गया था। उन्होंने अपने साथियों से चले जाने को कहा लेकिन वफादार साथियों ने साथ नहीं छोड़ा। दस मोहर्रम को यजीदी फौज से आपका मुकाबला हुआ और जख्म खाने के बाद आप सजदे में गिर गए और अल्लाह का शुक्र अदा करते समय शहादत का जाम पी लिया। उस समय आपकी आयु छप्पन वर्ष पांच माह पांच दिन की थी। हजरत इमाम हुसैन की शहादत के पहले उनके वफादार साथियों और परिवार वालों में हजरत हुर्र, हजरत अब्दुल्ला बिन मुस्लिम, हजरत जाफर बिन अकील, व छह माह के हजरत अली असगर ने भी दीन की हिफाजत के लिए अपनी जान की कुर्बानी दी। 680ई0 में होने वाली इस अजीम कुर्बानी को 1300 सौ से भी अधिक का समय हो चुका है, लेकिन आज भी इमाम हुसैन इंसाफ और हक की आवाज बनकर इंसानियत के इतिहास में जिंदा हैं। सिर्फ मुसलमान ही नहीं बल्कि दुनियां की तमाम कौम हजरत इमाम हुसैन की शहादत की यादों को अपने दिलों में ताजा किए हुए हैं। यजीद ने समझा था कि उसने हजरत इमाम हुसैन को मार डाला लेकिन कर्बला का कण-कण यही पुकारता है ऐ हुसैन तू जिंदा है वल्लाह। तू जिंदा है वल्लाह।

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