किरदार- ए- करबला
by: ceemaa sharma.....
हिजरी सन 1432 का पहला महीना मोहर्रम (8 दिसंबर को) शुरू हो रहा है। इस मौके पर इमाम हुसैन की शहादत का एक स्मरण....
कोई यज़ीद-ए-वक्त हो
या शिम्र हो या हुरमुला
उसको खबर हो या न हो
रोजे़ हिसाब आने को है
नज़दीक है रोजे़-जज़ा
ऐ करबला ,ऐ करबला
सीने में दर्द है। आंखें आंसुओं से तरबतर है। अलम उठ रहे हैं। अलम बढ़ रहे हैं। ये देखो, हुसैन का कारवां। ये देखो, जांनिसारों का लुटना। अपनी आंखों के सामने भरेघर का कुर्बान होना। ग़म क्यों न हो? इमाम हुसैन नहीं हैं। लेकिन वह यहीं तो हैं। सबके सीने में। सबके आंसुओं में। अल्लाह ने खुशी और गम की मियाद तय की है। हमेशा खुशी नहीं रहती और हमेशा गम नहीं रहता। लोग आते हैं और चले जाते हैं। नाते रिश्तेदार थोड़े दिन ग़मज़दा होते हैं। फिर आंसू भी सूख जाते हैं। बस, नाम रह जाता है। काम रह जाता है। दुनिया का यही दस्तूर है। यही फलसफा-ए-जिंदगी है। मगर करबला का ग़म कभी न मिटने वाला ग़म है। लहू से स्याही बनी। सीना कागज बना। कहानी ऐसी कि दुनिया रोए। और हर कौम पुकारे कि हमारे हैं हुसैन।
शाम का बादशाह यजीद क्रूर तानाशाह था। अल्लाह और नबियों की सीख से बेपरवाह। हुकूमत चलाने के लिए उसने इसलाम के विपरीत आचरण किए। उसके आगे सब झुक गए। लेकिन सल्ल.अलैहि वसल्लम हजरत मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन ने उससे वैत नहीं की। सच्चा रास्ता अल्लाह का रास्ता। सबसे बड़ी सीख..नबियों की। यहीं से शुरू हो गई- इंसानियत और शैतानियत के बीच जंग।
मोहर्रम का महीना इसलामी कलेंडर का पहला महीना है। यूं इस महीने से तमाम और तारीख भी बावस्ता हैं लेकिन वाकयात-ए-करबला केबाद शहादत और गम केसफे इस तरह तरबदतर हुए कि खुशियों की अनदेखी हो गई। जाहिर है, जब गम और मातम हो, तो खुशियां कहां? पहली मोहर्रम से शिया अकीदतमंद सोग में डूब जाते हैं। मजलिसें होती हैं। मातमी जुलूस बरामद होते हैं। काले लिबास पहन लिए जाते हैं। हाथ में अलम और सीनाकौंवी। यही सिलसिला दस मोहर्रम तक चलता है। आठ रवि उल अव्वल तक सोग का सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है। रंजोगम के इस कारवां में हर कोई शरीक होता है और कह उठता है--हमारे हैं हुसैन।
वाकयात-ए-करबला में इमाम हुसैन ने अपना पूरा कुनबा, कुर्बान कर दिया। अपने भाई जनाबे अब्बास को जंग करने से रोका ताकि कोई यह नहीं कह सके कि यह जंग राजशाही के लिए थी। कहा जाता है कि हजरत अब्बास इतने बहादुर थे कि अकेले पूरी फौज पर भारी थे। बड़े भाई को दिया वचन हजरतअब्बास ने अपनी जान देकर भी निभाया। तानाशाह यजीद ने इमाम हुसैन को झुकाने के लिए नहरे फराद का पानी बंद कर दिया। इमाम हुसैन के कारवां में बच्चे भी थे और वृद्ध भी। कुल 72 लोगों का कारवां था। हजरत अब्बास से बच्चों की प्यास देखी नहीं गई। उन्होंने इमाम से कहा कि वह पानी लेने जाएंगे। इमाम हुसैन ने पहले तो इनकार किया। फिर बोले-जाओ मगर तुम जंग नहीं करोगे। जिसके आगे न शमशीर की चली और न जंजीर की, दुनिया का सबसे ताकतवर यह इंसान अपने भाई के प्यार में हार गया। केवल मश्क लेकर नहर पर गया। सकीना की प्यास बुझाने। जालिम यजीद ने अब्बास को शहीद कर दिया। मश्क गिर गया। पानी बिखर गया। रह गई प्यास।
हजरत कासिम से लेकर अली असगर की शहादत भी हजरत इमाम हुसैन ने देखी। बेदर्द जालिम हुरमला केतीर ने अली असगर (छह माह के बालक) को भी शहीद कर दिया। रह गए सिर्फ जलते हुए खेमे। रह गई केवल प्यास। करबला की दास्तान दुनिया की शायद पहली ऐसी जंग (एकतरफा) है जिसमें पानी भी एक कारण रहा। दस मोहर्रम वह तारीख है, जब इमाम हुसैन को नमाज अदा करते वक्त शहीद किया गया।
इमाम हुसैन सहित सभी ने दीन और दुनिया केसामने आदर्श रखे। भाई से भाई का रिश्ता-बहन से भाई का रिश्ता, सगे और सौतेलों का रिश्ता। हक के लिए लड़ो। हकीकत से मुंह मत मोड़ो। इस्लाम की पहचान यजीद या फिरऔन से नहीं बल्कि अल्लाह के फर्ज, नबियों की सीख और हुसैन जैसे किरदारों से है। रावण हो या कंस, फिरऔन हो या यज़ीद इस नाम का दुनिया में कोई नहीं। राम, कृष्ण, हुसैन, मोहम्मद लाखों करोड़ों हैं। यही किरदार-ए-करबला है। महात्मा गांधी खुद इसके कायल रहे। हिंदुस्तान आना चाहते थे हुसैन इमाम हुसैन को हिंदुस्तान से बेहद प्यार था। उनकी एक मुंहबोली बहन भी हिंदुस्तान में ही रहती थी। वह हिंदुस्तान आना चाहते थे। काश...ऐसा हो पाता। इमाम हुसैन की बहन थी जै़नब। जै़नब को शहादत-ए-इमाम हुसैन और दास्तान-ए-करबला को दुनिया के सामने लाने का श्रेय जाता है।

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