दौर-ए-हयात आएगा ज़ालिम क़ज़ा के बाद,
है इंब्तिदा हमारी तेरी इंतिहा के बाद
(क़त्ल-ए-हुसैन अस्ल में मरगे यज़ीद है, इस्लाम ज़िंदा होता है हर कर्बला के बाद) हज़रत इमाम हुसैन रज़ि. हज़रत अली रज़ि. और हज़रत फ़तिमा ज़हरा रज़ि. के दूसरे नम्बर के फरज़ंद हैं। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की पैदायश सन् चार हिजरी क़मरी में शाबान महीने की तीसरी तारीख़ को मदीना मुनव्वरा में हुई थी। आप की पैदायश के बाद पैग़म्बर हज़रत मौह्म्मद(स.) ने आपका नाम हुसैन रखा। तारीख़ी तज़करों के मुताबिक़ इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम छः साल की उम्र तक नबी. करीम (स.) के साथ रहे। पैगम्बर(स.) इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को बेहद प्यार करते थे।नबी. करीम उनकी छोटी तकलीफ भी बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। नबी-ए-करीम की वफात के बाद हज़रत इमाम हुसैन रज़ि. तकरीबन तीस साल तक अपने बालिद-ए-माजिद हज़रत इमाम अली रज़ि. के साथ रहे। हर मामले और परेशानी में हर तरह से शाना-ब-शाना शामिल-ए-हाल रहे। हज़रत इमाम अली रज़ि. शहादत के बाद दस साल तक अपने बड़े भाई इमाम हसन के साथ रहे। सन् पचास हिजरी में उनकी शहादत के बाद दस साल तक होने वाले वाक़यात का मुशाहदा करते रहे। सन् साठ हिजरी में हज़रत मआविया के इंतिक़ाल के बाद उनके बेटे यज़ीद ने खिलाफ़त का मंसब सम्भालने के बाद हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से बैअत करने के लिए कहा, तो आपने बैअत करने से मना कर दिया। और इस्लाम की हिफ़ाज़त के लिए वीरता बहादुरी से लड़ते हुए शहीद हो गये।हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम सन् 61 हिजरी में यज़ीद के ख़िलाफ उठ खड़े हुए। इक़तदार की ज़ियादतियों से तंग आकर हज़रत इमाम हुसैन रज़ि. मदीना छोड़ने पर मजबूर हो गये तो उन्होने अपने क़ियाम के बारे में कहा कि मैं अपनी निजी ज़िंदगी को चमकाने या आरामदेह ज़िंदगी बसर करने या मुख़ालिफत फैलाने के लिए क़ियाम नहीं कर रहा हूँ, बल्कि मैं सिर्फ अपने नाना, पैगम्बरे-इस्लाम स. की उम्मत की भलाई के लिए कर रहा हूँ। और मेरा इरादा इंसानियत को अच्छाई की तरफ बुलाना और बुराई से रोकना है। मैं अपने नाना पैगम्बर(स.) और अपने वालिद माजिद इमाम अली रज़ि. के बताए रास्ते पर चलूँगा। साथ ही एक दूसरे मौक़े पर कहा कि ऐ अल्लाह तू जानता है कि हम ने जो कुछ किया वोह इक़तदार की मुख़ालिफत या दुनियांवी लालच की वजह से नहीं किया, बल्कि हमारा मक़सद ये है कि तेरे दीन की निशानियों को मुस्तहक़ीन तक पहुँचाए। तेरे बंदो में सुधार हो ताकि तेरे बंदे ज़ालिमों से महफूज़ रह कर तेरे दीन-सुन्नत, वाजिबात पर अमल कर सके। जब आप की मुलाक़ात यज़ीद की फौज से हुई तो, आपने कहा कि ऐ लोगो अगर तुम अल्लाह से डरते हो और हक़ को हक़दार के पास देखना चाहते हो तो यह काम अल्लसाह को खुश करने के लिए बहुत अच्छा है। ख़िलाफ़त के लिए ज़ालिम दावेदारों के मुक़ाबले हम अहल-ए-बैत सबसे ज़्यादा मुस्तहिक़ हैं।एक मुक़ाम पर कहा कि हम अहल-ए-बैत इक़तदार के उन लोगों से ज़्यादा मुतहिक़ हैं जो शासन कर रहे है। इस सबका मक़सद सिर्फ यही था कि उम्मते मुसलिमा में सुधार हो जाए,उम्मत को अच्छे कामों की तलक़ीन की जा सके,अवाम को बुरे कामों से करने से रोका जा सके,नबी करीम स. की सुन्नत को लागू करना, समाज को सकून और हिफाजत देना,अल्लाह के हुकमों को पूरा करने का माहौल तैयार करना, यह सभी मक़ासिद उसी वक्त पूरे हो सकते हैं जब इक़तिदार की बाग़ डोर खुद इमाम के हाथो में हो, जो इसके असल हक़दार भी हैं। इसीलिए इमाम ने कहा भी है कि इक़्तिदार हम अहल-ए-बैत का हक़ है न कि हुकूमत कर रहे उन लोगों का जो ज़ालिम हैं।

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