रोटी के लिए भटक रहे हैं, विकास के बलिदानी

दयाशंकर मिश्र
हरसूद की तीसरी बरसी पर विशेष
हरसूद क्या था ? इस सवाल का एकदम रटारटाया सरकारी जवाब है... इंदिरा सागर बांध परियोजना के लिए एकदम जरूरी शहर। जिसे पर्याप्त मुआवजे के साथ सरकार द्वारा अधिग्रहित कर दिया गया। यह संभवत: अपनी किस्म का पहला ऐसा मामला है, जिसको लेकर न तो विपक्ष ने कभी हल्ला किया, न ही सत्ता पक्ष ने विरोधियों पर किसी तरह की राजनीति करने का आरोप लगाया। जाहिर है हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों ने चाहे वह किसी भी पक्ष के हों, सामाजिक सरोकार के प्रति उनकी निश्ठा बुरी तरह से संदिग्ध है। यह हरसूद विस्थापन की तीसरी बरसी है। इस मौके पर नए हरसूद में विस्थापितों के साथ ही ऐसे विस्थापित भी हैं जो किन्हीं कारणों से यहां से दूर चले गए हैं, अपने प्रिय शहर की याद में एक बार फिर से एकत्रित हो रहे हैं। सरकार कहती है कि उसने नए हरसूद में हर तरह की सुविधाएं जुटाई हैं, यह पिछले शहर की तुलना में कहीं अधिक बेहतर शहर हैं,लेकिन यह दावा महज बेइमानी, आंकड़ों की जादूगरी के अलावा कुछ भी तो नहीं है। विस्थापन के तीन साल पूरे होते-होते यहां न तो लोगों के लिए रोजगार के साधन मुहैया करवाए गए हैं और न ही उनके लिए रोजी-रोटी का मुकम्मल इंतजाम किया गया है। आलम यह है कि नए हरसूद में बाजार को विकसित करने के लिए 529 लोगों से दो करोड़ 25 लाख लिए गए लेकिन आज तक अधिकांश दुकानें बंद हैं। ऐसा हाल केवल हरसूद अकेले का नहीं है, वास्तव में इंदिरा सागर बांध के विस्थापित 40000 से अधिक परिवारों का यही हाल है। तमाम सरकारी दावों के बाद भी अब तक कायदे से 5000 परिवारों को भी नहीं बसाया जा सका है। फिलहाल हरसूद की बात करें तो यहां के लोगों को जिस कथित आदर्श स्थल पर बसाया गया है, वहां पर न तो कोई औद्योगिक ईकाई है और न ही ऐसे साधन जो कि रोजगार मुहैया करवा सकें। यही कारण है कि हरसूद से विस्थापित 5600 परिवारों में से केवल 1600 परिवार ही नए हरसूद में रह रहे हैं। क्योंकि यहां पर रोजगार का कोई साधन नहीं है। न तो पुस्तों से किसानी कर रहे लोगों के पास हल चलाने को जमीन है और न ही मेहनतकशों के लिए काम। पढे लिखों के लिए एक अदद कारखाने की तलाश अभी जारी है। सरकारी अफसर कहते हैं कि आखिर उस 1815 में बसी नगरी में क्या था, जो इस आधुनिक नगर में नहीं है। शायद उन्हें नहीं मालूम कि हरसूद अपने में एक कंप्लीट एकोनॉमिक जोन था। जहां किसानों की बड़ी मंडी थी, जिस तक लगभग 200 गांवों की सीधी पहुंच थी, जिससे वहां हर किसी के लिए काम था। वहां खेती किसानी के लिए भरपूर जमीन थी, जिससे न केवल किसान बल्कि मजदूरों का उदर पोषण भी आसानी से हो जाया करता था। वहां के लोगों के पास रोजगार का सबसे बड़ा साधन खेती किसानी थी, जिसके मालिक वे खुद ही थे, साथ ही कुछ करखाने भी थे, जिनसे लोगों को आसानी से काम मिलता रहता था। जबकि नए आशियाने में हालत बिल्कुल ही बदली हुई है, यहां पक्के मकानों, सरकारी परियोजनाओं के अफसरों के कार्यालयों के अलावा कुछ भी नहीं है। लोग अक्सर यह सवाल करते हैं कि हरसूद के डूबने पर इतनी हाय-तौबा क्यों, जबकि उसने तो विकास के लिए उसका बलिदान अंतिम विकल्प था। लेकिन हरसूद के लोगों की निष्ठा पर अंगुलि उठाने वाले यह भूल जाते हैं कि क्यों ऐसे लोगों को अपने पुरखों की जड़ों से एक अदद सम्मानजनक विदाई नसीब नहीं हो सकी। एक आजाद मुल्क की यह कैसी विकास की अवधारणा है, जो अपने ही मुल्क के बाशिंदों के मौलिक अधिकारों, उनके हितों को कुचलने को बेताब है। वैसे हरसूद तो उस कथित विकास की प्रक्रिया का ताजा शिकार भर है, जिसके कारण आजादी के बाद से अब तक तीन करोड़ से अधिक लोग अपनी जमीन और संस्कृतियों से विलग हो चुके हैं। सरकारों के पास उन विस्थापितों का कोई आंकड़ा नहीं होता है, जो कि कम मुआवजे, रोजगार के अवसरों की कमी के कारण विस्थापितों के लिए तय स्थल की जगह दूसरी जगहों पर जाने को विवश हो जाते हैं। इनमें बड़ी संख्या में बच्चे शामिल होते हैं, जिनके भविष्य पर सबसे अधिक विस्थापन की मार पड़ती है। विकास के नाम पर किए जा रहे विस्थापनों के बीच तमाम लोकतांत्रिक विरोध बेअसर से दिखते हैं, क्योंकि सरकार अनशनकारियों के खिलाफ आए दिन बर्बरता और अलोकतांत्रिक तरीके से पेश आती है। इसका उदाहरण सरकार ने हाल ही में खंडवा में धरना दे रहे लोगों पर भारी बलप्रयोग करके दिया। नए हरसूद में बेहाली के बीच मप्र सरकार और बांध की कर्ताधर्ता कंपनी एनएचडीसी तो अपने काम पर ही मंत्रमुग्ध हैं। इसलिए उनको न तो पीड़ितों का दर्द महसूस होता है और न ही वह सचमुच इस दिशा में कुछ करना चाहते हैं। सरकार के दलित एजेंड़ों के बीच न्यू हरसूद के सेक्टर सात जिसे दलित सेक्टर भी कहा जाता है, वहां के पचास से अधिक घरों में ज्यातर के बच्चे अब अपनी पीठ पर से स्कूली बस्तों को उतार कर गैंती-फावड़ा उठा रहे हैं। जो बच्चे हरसूद उजड़ने के समय वहां से बड़े जतन से किताबें, कापियां सहेज रहे थे, वह अपने नए आशियाने में बस्ते को खूंटी पर टांग चुके हैं, क्योंकि उनके लिए पढ़ाई से अधिक जरूरी है, उसके परिवार के लिए रोटी। इन दलितों के लिए यहां कोई नारा लगाने वाला नहीं है, क्योंकि यह लोग दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के उस वोट बैंक का हिस्सा नहीं हैं, जिनको ध्यान में रखकर कम से कम सरकारें कुछ करने का नाटक तो करती ही रहती हैं। ऐसे में जबकि देश के 330 से अधिक जिलों में रोजगार गारंटी योजना का क्रियान्वयन किया जा रहा, यह समझ से परे है कि क्यों अफसरों को रोटी को मोहताज हो रहे हरसूद के विस्थापितों की मदद के लिए इस योजना का सहारा लेने की सुध नहीं मिली। विस्थापितों के लिए इंतजाम के कर्ताधर्ताओं को इस बात पर शर्म आनी चाहिए कि हरसूद के मोही रैयत में 30 आदिवासी परिवारों के 150 लोग यहां से जाने को कतई तैयार नहीं हैं, क्योंकि उनको अभी तक मुआवजे की रकम नहीं मिली है। इन्हीं परिवारों में से श्यामलाल, रामशरण, मांगीलाल के साथ ही 90 वर्षीय कुरेषा बी का कहना है कि सरकार द्वारा धारा 4 के नियमों के अनुसार मांगे जा रहे सारे दस्तावेज होने, कई बार अधिकारियों के दरवाजे खटखटाने के बाद भी अब तक मुआवजा नहीं मिल सका है। विकास की मार झेल रहे इन लोगों को सबसे अधिक चिंता इस बात की सता रही है कि अगर इस बार उन पर इंद्र देवता की कृपा नहीं हुई तो क्या होगा। क्योंकि पिछली बरसात में इनकी बस्ती के बिल्कुल पास तक पानी पहुंच गया था। वैसे नए हरसूद में ऐसे लोगों की भी कोई कमी नहीं है, जिनके हिस्से की राहत या तो अधिकारी निगल गए या फिर दबंग पड़ोसी। जिन्होंने इस विपदा की घड़ी में भी सहज मानवीय गुणों को बहा देने से कोई गुरेज नहीं किया। जहां तक प्रशासन का सवाल है तो प्रभारी कलेक्टर संजय गोयल के पास इसका कोई उत्तर नहीं है कि लोगों की समस्याओं का कब तक निराकरण हो सकेगा। वह लगातर यही कह रहे हैं कि हम अपना काम पूरी ईमानदारी से कर रहे हैं। ऐसे में लाख टके का सवाल है, जब प्रशासन अपना काम ठीक से कर रहा है, सरकार अपने वायदों को पूरा कर रही है तो आखिर ये लोग किस बात की सजा भुगत रहे हैं, संभवतः उस कसूर की जो इनमें से किसी ने नहीं किया है। क्या यह स्थितियां हमारी उस व्यवस्था को शर्मशार करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, जो हमेषा ही हरसूद जैसे हरी-भरी सांस्कृतिक विरासतों को उस विकास के नाम पर मिटाता जा रहा है, जो कि हमारी अनियंत्रित भूख और संसाधनों को बढ़ाने के नाम पर उपजी हैं।

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