मुहर्रम और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम
मुहर्रम का महीना मन-मस्तिष्क में भव्य एवं महान आन्दोलन की याद को जीवित करता है। मुहर्रम हुसैन इब्ने अली के नाम से जुड़ा हुआ है। हुसैन इब्ने अली उस महान व्यक्ति का नाम है जो वर्ष ६१ हिजरी क़मरी में करबला के मैदान में अपने ७२ निष्ठावान और त्यागी साथियों के साथ शहीद हुए। यह घटना, इस्लामी इतिहास में महान एवं भविष्य निर्धारण करने वाली घटना थी। इस घटना ने नैतिकता, वीरता तथा त्याग के अनुदाहरणीय दृष्य प्रस्तुत किये हैं। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आन्दोलन की स्पष्ट विशेषता यह थी कि वह समय और स्थान के बंधनों तक सीमित नहीं रहा बल्कि वह भौगोलिक एवं ऐतिहासिक सीमाओं से आगे बढ़ता गया और समस्त कालों के लिए प्रभावी एवं प्रेरणादायक हो गया। अब जब भी अत्याचार से मुक़ाबले और न्याय की सुरक्षा की बात आएगी तो हुसैन इब्ने अली का नाम हर ज़बान पर अवश्य आएगा। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का आन्दोलन अपने आरम्भिक काल से अब तक उस चमकते हुए सूर्य की भांति है जो अपने प्रकाश से अंधकार को समाप्त करता है और अत्याचार से थके हुए लोगों को ऊर्जा प्रदान करता है।
सलाम हो हुसैन पर। सलाम हो उस वास्तविकता पर जो सदैव जीवित है। ईश्वर की कृपा हो उसपर जिसने ईश्वर के धर्म को जीवित करने के लिए अपने जीवन को न्योछावर कर दिया ताकि इस्लाम का मार्गदर्शन करने वाला ध्वज सदा फहराता रहे।
इस्लाम में नेतृत्व के गंभीर दायित्वों में से एक, लोगों को मार्गदर्शन के स्पष्ट मार्ग पर ला कर खड़ा करना है। जिस विषय ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को तत्कालीन समस्याओं के विरुद्ध आन्दोलन के लिए प्रेरित किया वह धर्म के मूल मानदंडों से तत्कालीन सरकार और समाज का विमुख हो जाना था। यह एसी कटु वास्तविक्ता थी जिसने पैग़म्बरे इस्लाम (स) के स्वर्गवास के पश्चात पचास वर्षों के दौरान धीरे-धीरे रूप धारण किया था। पैग़म्बरे इस्लाम की शिक्षाओं को भुला देना, उनके परिजनों को अलग-थलग कर देना, इस्लामी समाज में आध्यात्म का पतन, सत्ताधारियों द्वारा धन एकत्रित करना और धर्म में न पाई जाने वाली बातों को प्रचलित करना आदि वे तत्व थे जिन्होंने समाज को अज्ञानता के काल की ओर वापस लौटने की भूमिका प्रशस्त की थी।
उस समय समाज का पतन इस सीमा तक हो चुका था कि इस्लामी राष्ट्र के भविष्य का निर्धारण, यज़ीद जैसे अत्याचारी एवं भ्रष्ट शासक के हाथों में था जिसने मुसलमानों के मान-सम्मान को भारी आघात लगाया था। माविया के पुत्र यज़ीद ने जब सत्ता संभाली तो उसने सर्वप्रथम पैग़म्बरे इस्लाम (स) के नाती इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से बैअत अर्थात आज्ञा पालन का वचन मांगा। यज़ीद के लिए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम जैसे व्यक्ति से बैअत लेना बहुत ही महत्वपूर्व था जो इस्लामी जगत में उच्च स्थान के स्वामी थे। यज़ीद भ्रष्ट एव अयोग्य था। सब लोग उसकी अयोग्यता और भ्रष्टता से भलि भांति अवगत थे। निश्चित रूप से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम किसी भी स्थिति में इस प्रकार के व्यक्ति की बैअत अर्थात उसकी आज्ञापालन का वचन नहीं दे सकते थे। इमाम हुसैन की दृष्टि में बनी उमय्या ऐसे लोग थे जिन्होंने ईश्वर की अवज्ञा आरंभ कर दी थी और वे भ्रष्टाचार में डूब गए थे।
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने यज़ीद की बैअत अर्थात आज्ञा पालन का वचन देने से इन्कार किया। यह विषय, समाज पर यज़ीद के शासन के अवैध होने को दर्शाता था। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम द्वारा यज़ीद की बैअत न करने के कारण मदीने के गवर्नर को आदेश दिया गया कि वह इमाम हुसैन पर कड़ाई करे। ऐसी स्थिति में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने मदीना छोड़ने का निर्णय लिया। अपने इस कार्य के लिए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम उचित अवसर की प्रतीक्षा में थे। संघर्ष की गतिविधियां जारी रखने के लिए उस समय पवित्र नगर मक्का, एक अच्छा विकल्प था। विशेषकर इसलिए कि हज का समय निकट था और हज़ में बड़ी संख्या में लोगों की उपस्थिति ने इमाम हुसैन के लिए अनुकूल स्थिति उपलब्ध करवा दी थी।
मदीने से निकलते समय इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा थाः- मैं अपने नाना के धर्म के अनुयाइयों के कार्यों में सुधार करने के लिए मदीने से जा रहा हूं और मैं लोगों को भलाई का आदेश दूंगा और बुराइयों से रोकूंगा।
मक्के में प्रविष्ट होने के साथ ही इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने आन्दोलन की भूमिका प्रशस्त करने के भरसक प्रयास आरंभ कर दिये। दूसरी ओर कूफ़ा नगर में पैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों से श्रद्धा रखने वालों ने जब इमाम हुसैन की ओर से यज़ीद की बैअत न करने अर्थात आज्ञा पालन का वचन न देने की बात सुनी तो उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की। मानों उन्हें नया जीवन मिल गया हो। क्योंकि वे ओमवी शासकों के अत्याचारों से थक चुके थे। पैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों से श्रद्धा रखने वालों में से कुछ वरिष्ठ लोगों ने, जो कूफ़े मे रहते थे, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को पत्र लिखकर उन्हें कूफ़े आने का निमंत्रण दिया था। इन लोगों ने अपने पत्रों में इमाम के साथ हर प्रकार के सहयोग का वचन दिया था। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने पत्रों को प्राप्त करके मुस्लिम इब्ने अक़ील को स्थिति की समीक्षा के लिए कूफ़े भेजा। इतिहास में मिलता है कि हज़ारों कूफ़ावासियों ने मुस्लिम इब्ने अक़ील की बैअत की। जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने परिस्थिति को अनुकूल पाया तो उन्होंने हज की यात्रा को अधूरा छोड़ते हुए आठ ज़िलहिज सन ६१ हिजरी क़मरी को कुफे की ओर प्रस्थान किया।
रास्ते में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को सूचना मिली कि कूफ़े की स्थिति परिवर्तित हो चुकी है। इसका कारण यह है कि यज़ीद ने कूफ़े के शासक को उसके पद से हटाकर उसके स्थान पर उबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद नामक एक निर्दयी एवं भ्रष्ट व्यक्ति को नियुक्त किया है। इब्ने ज़ियाद ने दमन और आतंक के सहारे कूफ़ावासियों के विरोध को शांत कर दिया। कूफ़े के कुछ लोग भय और स्वयं को सुरक्षित रखने के दृष्टिगत इमाम हुसैन के सहयोग से पीछे हट गए। इस बीच जिन लोगों ने प्रतिरोध किया वे या तो शहीद कर दिये गए या फिर उन्हें जेलों में डाल दिया गया। कूफे के घटनाक्रम में ही इमाम हुसैन के प्रतिनिधि मुस्लिम इब्ने अक़ील को भी शहीद कर दिया गया। मुस्लिम इब्ने अक़ील की शहादत की सूचना मिलने के बावजूद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम दृढ़ता से अपने मार्ग पर बढ़ते रहे। उन्होंने अपने साथियों को संबोधित करते हुए कहाः- हे लोगो, कूफ़ियों ने हमें अकेला छोड़ दिया है। तुममे से जो कोई भी वापस जाना चाहता है वह यहीं से वापस जा सकता है। इतिहास में मिलता है कि यह बात सुनकर कुछ लोग इमाम हुसैन के कारवान को छोड़ कर चले गए। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने मुट्ठी भर निष्ठावान साथियों के साथ कूफ़े की यात्रा जारी रखी।
अत्याचारियों के विरुद्ध संघर्ष में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की दृढ़ता इतनी अधिक थी कि उन्हें अपने साथियों की कम संख्या पर कोई चिन्ता नहीं थी। उन्होंने अपने पिता हज़रत अली अलैहिस्सलाम से यह अर्थपूर्ण बात सुन रखी थी कि मार्गदर्शन के मार्ग में लोगों की कम संख्या से भयभीत न हो।
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को भलिभांति ज्ञात था कि वे अपने साथियों की कम संख्या से सैनिक विजय प्राप्त नहीं कर सकते और धोखा खाए हुए लोगों एवं कायरों से सहयोग एवं सहकारिता की प्रतीक्षा नहीं की जा सकती। उनके लिए जो बात महत्वपूर्ण थी वह अपने दायित्वों का निर्वाह था। वे केवल ईश्वरीय दायित्वों के निर्वाह के बारे में सोचते थे चाहे इस मार्ग में वे शहीद ही क्यों न कर दिये जाएं। इमाम हुसैन (अ) की दृष्टि में विजय और पराजय के मापदंड ही अलग थे।
कूफ़ा पहुंचने से पहले ही करबला नामक स्थान पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के कारवां का यज़ीद के तीस हज़ार सैनिकों ने परिवेष्टन कर लिया। इसी स्थान पर आशूर के दिन सन ६१ हिजरी को बड़ी संख्या में कमज़ोर ईमान वालों और कम संख्या में दृढ़ संकल्प एवं आत्मविश्वास वालों के बीच ऐसा युद्ध हुआ जो इतिहास में अनउदाहरणीय है।इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का आन्दोलन मानवीय एवं नैतिक विशेषताओं का स्पष्ट एवं उच्च उदाहरण है। इसका कारण यह है कि उस समय का रणक्षेत्र, कुफ़्र और भ्रष्टाचार के मुक़ाबले में ईमान और आध्यात्म का सच्चा उदाहरण था और प्रेम तथा ईमान के मार्ग में दृढ संकल्प वालों से वीरता, साहस तथा महान कार्यों के अतिरिक्त किसी अन्य बात की अपेक्षा नहीं की जा सकती।यही कारण है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का आन्दोलन, इतिहास में मूल्यवान ख़ज़ाने की भांति है जिसका संदेश एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ियों तक स्थानांतरित होता रहता है।

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