अपने ही लोग देश को लूट रहे हैं
जोगिंदर सिंह
भ्रष्टाचार को कई तरह से परिभाषित किया जा सकता है लेकिन सबसे अच्छी परिभाषा है : भ्रष्टाचार एक ऐसा अधिकार है जिसमें एकाधिकार तो प्राप्त है लेकिन पारदर्शिता बिलकुल नहीं है। भारत में यह इसलिए है क्योंकि सरकार चाहे किसी भी गठबंधन की हो, या तो स्वयं इसमें लिप्त रही है या इसे बहुत हलका मानकर चली है या फिर इसकी अनदेखी करती रही है।
घोटाले और ऊँचे दर्जे के भ्रष्टाचार के मामले इतनी जल्दी निपटा दिए जाते हैं कि उसमें कई तरह की लापरवाहियाँ आ जाती हैं। ये सब होता है हमारी संप्रभु केंद्र सरकार की नाक के नीचे जो अपनी कई एजेंसियों के माध्यम से देश के हर कोने-कोने में मौजूद है। बताया जा रहा है कि सीबीआई ने मुंबई, बेंगलुरू, रायपुर, कोलकाता और हैदराबाद में एक साथ छापे मारकर रेलवे में भर्ती के घोटाले का पर्दाफाश किया है। यह घोटाला सहायक लोको पायलट और सहायक स्टेशन मास्टर की परीक्षाओं को लेकर था।
रायपुर के तत्कालीन एआरडीएम ने मुंबई के रेलवे भर्ती बोर्ड के अधिकारियों की मदद से परीक्षा की तारीख से पहले ही प्रश्न-पत्र की एक प्रति हासिल करके कई उम्मीदवारों को उपलब्ध करवा दी थी। हर उम्मीदवार से 3.5 लाख रुपए वसूले गए थे। उम्मीदवारों से अपने मूल प्रमाण-पत्र रायपुर के सहायक रेलवे मैनेजर जगन्नाथन के पास जमा करवा लिए थे। गिरफ्तार किए गए लोगों में रेलवे भर्ती बोर्ड के अध्यक्ष एसएम शर्मा (जो अब तक निलंबित हैं) और उनके बेटे सहित रेलवे के कई बड़े अधिकारी शामिल हैं। प्रश्न-पत्र परीक्षा से एक दिन पहले उन्हें उपलब्ध कराया गया था।
किसी जमाने में डाकू सैकड़ों या हजारों में लूट करते थे, लेकिन सफेदपोश लुटेरों ने सरकारी पदों की ताकत हासिल कर अपने काम को ही दुधारू गाय बना दिया है सैकड़ों और हजारों रुपयों के घोटालों का जमाना अब बीत चुका है। अब तो लाखों से कम की बात कोई नहीं करता। तलाशी के बाद गिरफ्तार लोगों और उनके रिश्तेदारों के खातों से साठ लाख रुपए बरामद किए गए। हम यह कैसे भूल सकते हैं कि देश की सबसे महत्वपूर्ण समझी जाने वाली भारतीय प्रशासनिक सेवा के दो अधिकारी और दो सांसद निलंबित किए गए थे। उनके घरों की तलाशी में आयकर विभाग ने 3.26 करोड़ रु. नकद, 67 लाख रुपए के आभूषण और सात लाख रुपए मूल्य की विदेशी मुद्रा बरामद किए गए। इसी तरह छत्तीसगढ़ में छापों के दौरान 14 बैंक लॉकरों में से 52 लाख रु. नकद, 73 लाख रु. के आभूषण और 220 बेनामी खातों में 40 लाख रुपयों का लेन-देन पकड़ा था। यह सब तो शायद यूँ ही बिना किसी एहतियात से रखा गया थोड़ा-सा पैसा था। नकदी या उससे खरीदी गई भू-संपत्ति तो कहीं और ही छिपी रही होगी।
ऐसा नहीं है कि अन्य सेवाओं जैसे भारतीय पुलिस सेवा या आयकर विभाग या कस्टम विभाग या चिकित्सा विभाग या रक्षा विभाग बहुत साफ-सुथरे हैं। बस ये है कि इन विभागों में छुपा भ्रष्टाचार इस हद तक अभी सामने नहीं आया है। अगर ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के अनुमान को सच माना जाए तो 100 में से 34 अंकों के साथ हम दुनिया के ८३वें सबसे भ्रष्ट देश हैं, लेकिन मुझे तो यह सरकारी रिपोर्ट की तरह लगता है, जहाँ आप दिखाना चाहते हैं कि सब कुछ ठीक है।
किसी जमाने में डाकू सैकड़ों या हजारों में लूट करते थे। लाख तक तो आँकड़ा कभी-कभार ही पहुँचता था, लेकिन इन सफेदपोश लुटेरों ने तो सरकारी पदों की ताकत हासिल करके अपने काम को ही दुधारू गाय बना दिया है। राज्यसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में कार्मिक विभाग के प्रभारी मंत्री ने जवाब में बताया था कि 31 मार्च 2010 तक 84 आईएएस और 33 आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई के आपराधिक मामले चल रहे हैं।
विश्व बैंक के एक अधिकारी एड्रियन फोजार्ड के अनुसार विकासशील देशों में हर साल करीब 40 खरब अमेरिकी डॉलर मूल्य की परिसंपत्तियाँ रिश्वतखोरी और सरकारी पैसे के दुरुपयोग जैसे भ्रष्ट आचरण की भेंट चढ़ जाती हैं। पिछले 15 सालों में इसमें से सिर्फ 5 अरब डॉलर ही बरामद किए गए हैं। चोरी गया पैसा तो इससे कहीं ज्यादा है। हमारे देश की त्रासदी यह है कि इसे कोई विदेशी नहीं बल्कि अपने ही लोग लूट रहे हैं, जो येन-केन प्रकारेण सत्ता हासिल कर लेते हैं।
अभियुक्त के अधिकारों की रक्षा के नाम पर आज का यह भ्रष्ट लुटेरा खुला घूम रहा है और आम भारतीय नागरिक को अपना शिकार बनाने के लिए आजाद है। भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली देश में सीबीआई, सेंट्रल विजिलेंस कमीशन जैसी कई संस्थाएँ मौजूद हैं। इसी तरह हर राज्य में भी ऐसी संस्थाएँ हैं। फिर भी सरकार को नहीं पता कि इनकी नाक के नीचे ये सब कैसे हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने 17 अगस्त 1997 को निर्देश दिया था कि 1988 के एक आदेश के अनुसार संयुक्त सचिव या ऊपर के किसी अफसर के खिलाफ जाँच शुरू करने से पहले सरकार की अनुमति लिया जाना जरूरी है। इसे सितंबर 2004 में बिल के रूप में लाया गया। आश्चर्य की बात है कि किसी भी राजनीतिक दल के किसी व्यक्ति ने इस पर अँगुली नहीं उठाई। जब मैंने जाँच की तो पता चला कि भारत सरकार में निर्णय लेने का अधिकार संयुक्त सचिव स्तर से शुरू होता है। अगर इस स्तर के अधिकारियों को सुरक्षा नहीं दी जाती तो कोई भी अपने राजनीतिक आकाओं के इशारों पर कुछ भी गलत करने के लिए तैयार नहीं होगा।
आज की स्थिति यह है कि न तो सीबीआई और न कोई दूसरी संस्था यह पता लगाने के लिए भी जाँच शुरू नहीं कर सकती कि कोई आरोप सही है या नहीं। जाँच शुरू करने महीने या साल नहीं लेकिन दिन तो जरूर लग जाते हैं जैसा कि अकसर होता ही रहता है। नतीजा यह होता है कि भ्रष्ट व्यक्ति को सब पहले ही पता लग जाता है कि उसके खिलाफ क्या चल रहा है। जाँच के बाद पूरी रिपोर्ट, जिसमें पूरे सबूत और जाँच के नतीजे होते हैं, मंजूरी के लिए फिर सरकार के पास भेजे जाते हैं।
यह सब एक तरह के चक्रव्यूह या भूलभुलैया की तरह है जो गोल-गोल घूमता रहता है, इसीलिए भ्रष्टाचार कम जोखिम और ज्यादा पैसे वाला काम बन गया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सरकार द्वारा गरीबी के उन्मूलन की योजनाओं के लिए पैसा कितना रखा गया है, हजारों करोड़ की रकम की योजनाओं का पैसा तो बीच में ही निचोड़ लिया जाता है, वास्तविक लाभार्थी तक तो कुछ पहुँचता ही नहीं है।
राहुल गाँधी यह जानकार हैरान थे कि जिसके लिए दस रुपए खजाने से चलते हैं उस तक तो सिर्फ दस पैसे ही पहुँचते हैं। यह सब ऐसे नहीं चलेगा बल्कि और ज्यादा बढ़ेगा। सरकार को पहला सवाल तो खुद से ही पूछना चाहिए कि गरीबों को लूटने वालों को कई स्तरों पर सुरक्षा देकर क्या वह जनता की सेवा कर रही है। इसे खुद से ही पूछना चाहिए कि अपराध के जाहिरा मामलों में धारा 311 के तहत कितने लोगों को नौकरी से निकाला है। मेरी जानकारी में तो दफ्तरशाही के ऊपरी स्तर पर यह संख्या शून्य है। हर चीज को ठंडे बस्ते में डाल देने से काम नहीं चलेगा। कानून को अपना काम करने दिया जाए। सरकार अच्छी तरह से जानती है कि अदालतों में किस हद तक मुकदमे इकट्‍ठा हो गए हैं। किसी को अपने जीवनकाल में तो इन्साफ मिलना मुश्किल हो गया है क्योंकि हमारी न्याय प्रणाली में जजों की जगहों को भी पूरी तरह भरा ही नहीं गया है। सरकार क्या करे और कैसे करे, यह कोई मुश्किल सवाल नहीं है, लेकिन वह पहले यह त तय करे कि उसे कुछ करना है कि नहीं। (लेखक केन्द्रीय जाँच ब्यूरो के पूर्व निदेशक हैं)
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