अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े वर्ग व अल्पसंख्यक वर्गों के लिए शिक्षा
मासूम ज़हरा ,जेएनयू नई दिल्ली
भारत, धर्म, जाति, उप जाति के आधार पर कई समूहों में बँटा हुआ है। देश में सामाजिक वर्गीकरण की जड़ें बहुत गहरी है। इससे देश में जाति आधारित हिंसा तथा उच्च वर्गों द्वारा निम्न जातियों पर अत्याचार की घटनाएँ हमेशा घटती रहती है। संविधान निर्माताओं, जिसमें डॉ. बी. आर. आम्बेडकर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है, ने एक रचनात्मक कार्य नीति या आरक्षण नीति का प्रतिपादन किया। ताकि देश के पारंपरिक जाति व्यवस्था के दुष्प्रभाव को कम किया जा सके और स्वतंत्रता एवं शिक्षा के अधिकार से वंचित लोगों को वे सुविधाएँ मुहैया कराई जा सकें।
कुछ तथ्य
1921- मद्रास प्रेसीडेंसी ने गैर-ब्राह्मण समुदाय के लिए विशेष आरक्षण का प्रावधान किया।
1935 – भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने एक संकल्प पारित किया जिसे पूना समझौता कहा जाता है। इसमें कमजोर वर्गों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र का प्रावधान किया गया।
1942 – डॉ. बी. आर. आम्बेडकर ने अखिल भारतीय दलित वर्ग संघ की स्थापना की ताकि अनुसूचित जातियों को आगे बढ़ाया जा सके। उन्होंने सरकारी सेवा और शिक्षा में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की माँग की।
1947 – भारत को आजादी मिली। डॉ. आम्बेडकर को भारतीय संविधान की मसौदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। भारतीय संविधान में जाति, धर्म, रंग, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव पर रोक लगाई गई। परन्तु सभी नागरिकों को समान अवसर प्रदान करते समय संविधान में “सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों या अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग की उन्नति” के लिए आरक्षण का विशेष प्रावधान किया गया है। अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग का राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए संविधान में 10 वर्षों के लिए (जिसे संवैधानिक संशोधन द्वारा प्रत्येक 10 वर्षों के लिए बढ़ाया जा रहा ) अलग निर्वाचन क्षेत्र का प्रावधान किया गया है।
1979- मंडल कमीशन की स्थापना की गई ताकि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति का मूल्यांकन किया जा सके। कमीशन के पास पिछड़े वर्ग की उप-जाति के लिए तथ्यपरक आँकड़े उपलब्ध नहीं है। पिछड़े वर्ग की जनसंख्या आँकड़े के लिए आयोग 1930 के जनगणना रिपोर्ट का प्रयोग कर रहा है। इसके अनुसार इस वर्ग की संख्या कुल जनसंख्या का 52 प्रतिशत है तथा इसके अंतर्गत 1257 जातियाँ पिछड़े वर्ग के अंतर्गत चिह्नित की गई है।
1980 में आयोग ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की और वर्तमान कोटा में बदलाव लाते हुए इसे 22 प्रतिशत से बढ़ाकर 49.5 प्रतिशत तक करने की सिफारिश की। वर्ष 2006 में पिछड़े वर्ग की सूची में जातियों की संख्या बढ़कर 2279 तक पहुँच गई जो मंडल कमीशन द्वारा तैयार सूची से 60 प्रतिशत अधिक है।
1990 - सरकारी नौकरियों में मंडल कमीशन की सिफारिशों को क्रियान्वित किया गया।
1991 - उच्च वर्ग की जाति के लोगों के लिए नरसिम्हा राव सरकार ने 10 प्रतिशत अलग आरक्षण व्यवस्था का प्रारंभ किया।
1992- अन्य पिछड़े वर्ग के लिए प्रस्तावित आरक्षण को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने स्थगित किया।
1998- केन्द्र सरकार ने विभिन्न सामाजिक समूह की आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति को आँकने के लिए पहली बार राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण आयोजित किया।
2005 में 93वें संवैधानिक संशोधन के माध्यम से निजी शैक्षणिक संस्थाओं में अन्य पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति व जनजाति वर्गों के लिए आरक्षण को सुनिश्चित किया गया है।
2006 में केन्द्र सरकार के उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में अन्य पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावदान किया गया। इस तरह संपूर्ण आरक्षण 49.5 प्रतिशत तक पहुँच गया।

 भारत में बढ़ता सामाजिक कलंक
मासूम ज़हरा
आज सारा समाज कई घटकों में बँटा है । ऊँच नीच, छुआछूत का भेद पहले भी था, उत्पीड़न भी था, पर आजादी के साठ साल बाद वर्गभेद और कई रूपों में उभरकर आया है । उसमें शिक्षा के क्षेत्र में हम सबके द्वारा बरती गयी कोताही, वर्तमान राजनैतिक संरचना (जो हमें अंग्रेज विरासत में दे गये हैं) तथा सामाजिक संगठनों द्वारा नूतन निर्माण के क्षेत्र में उपेक्षा जिम्मेदार है । किसी भी राष्ट्र का निर्माण वहाँ के नागरिक की मानसिक-भावनात्मक पृष्ठभूमि के आधार पर होता है । बुरे रीति-रिवाजों, बुराइयों से भरे वातावरण में निकृष्ट व्यक्ति ही उत्पन्न होंगे । यदि समाज का वातावरण बदल दिया जाय, तो सामाजिक संस्कारों की छाप भी मन पर डाली जा सकती है । आज जो अव्यवस्थाएँ पूरे समाज में फैली हैं, उनके लिए सरकार नहीं, हम सभी जिम्मेदार हैं, क्योंकि अभी तक हमारे अंदर राष्ट्रवादी विचारधारा पनप नहीं पाई । भव्य समाज की नव्य संरचना होगी, तभी राष्ट्र अखण्ड एवं सशक्त बन सकेगा । इसके लिए कुछ बिन्दुओं पर हमें ध्यान देना होगा ।
जातिवाद का विष जातिगत विभाजन, जिस पर आज सबसे अधिक गर्म बहस चल रही है, एक बड़ी चिन्ता का विषय है । पूर्वकाल में वर्ण विभाजन गुण-कर्मों के आधार पर किया गया था, न कि जन्मजाति के आधार पर । जन्म से तो सभी शूद्र होते हैं । आज गाँव-गाँव, कस्बों-गली मुहल्लों-नगरों में हम जातियों में बँटे हुए हैं । हमारी पहचान जाति से होती है, कर्म व चरित्र से नहीं । सारी राजनीति इसी पर आधारित है । उसी उम्मीदवार को खड़ा किया जाता है, जिसकी जाति के लोग उस क्षेत्र में अधिक होते हैं । बहुमत की राजनीति ने कट्टर जातिवाद को बढ़ावा दिया है । ऐसा लोकतंत्र किस काम का? पंच भी, सरपंच भी चुने गए, तो वही आधार रहा-गाँवों की समरसता चली गयी-चुनावों में न जाने कितनों की जानें गयीं, न जाने कितने अभी और खोयेगें । सत्ता से जुड़ी राजनीति अब पूर्णतः जातिवाद-वंशवाद पर आधारित है । किसी उम्मीदवार की व्यक्तिगत विशेषताओं का कोई मायने नहीं रह गया ।
कैसे बुझाएँ यह आग जातिगत आरक्षण की आग में झुलस रहा देश उन सभी निर्णयों के परिणाम भुगत रहा है, जो अविवेकपूर्ण दृष्टि के कारण लिये गये । आरक्षण पिछड़ेपन के आधार पर आर्थिक अवसर न मिल पाने के आधार पर होता, तो सभी को ऊँचा उठने का अवसर मिलता । दलित वर्ग कहे जाने वाले समूह को आज सारे अवसर मिल रहे हैं, यह प्रसन्नता की बात है, उनकी उपलब्धियाँ भी हैं, पर क्या इसी आधार पर समाज व देश को बाँट दिया जाना चाहिए? हम मानते हैं कि यह सब हमें एक उन्मादी युद्ध-गृहकलह की ओर ले जा रहा है । इसके विपरीत अभी भी कई क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ ऊँची जाति वालों के कुएँ से कोई पानी नहीं पी सकता-बारात तक उनके घर के सामने से नहीं ले जा सकता । यदि दो अलग-अलग वर्गों के युवा-युवती प्रेम विवाह कर लें तो उन्हें जंगली कानून के अन्तर्गत शूली पर चढ़ा दिया जाता है । क्या हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं? मन दुखी होता है, कचोटता है कि क्या होगा समाधान? परम पूज्य गुरुदेव ने सभी जाति-वर्गों को एक कर, एक विशाल अखिल विश्व गायत्री परिवार खड़ा कर दिया । इसमें सभी वर्गों-जातियों के व्यक्ति ब्राह्मणत्व को अंगीकार कर एक लाल मशाल के संरक्षण में चल रहे हैं । पूज्यवर ने जो क्रांति की, उसके सार्वजनीन होने-भारतव्यापी होने की एक महती आवश्यकता है । अभी हम पूरी आबादी का मात्र तीन या चार प्रतिशत भर हैं तथा अभी एक कमी और है । एक गुरु से जुड़े होने ज्ञानयज्ञ-विचार क्रांति के अंग होने के बावजूद विवाह की बात आती है, तो अपनी उपजाति-जाति में ही करते हैं । कुछ साहसिक कदम उठे हैं, पर वे पर्याप्त नहीं । पहले पद, उपनाम (सरनेम) हटने की क्रांति हो, ऋषियों के नाम से हम जाने जायँ और फिर पारस्परिक विवाह संबंध हों, तभी युगऋषि का सपना पूरा होगा । फिर इस मॉडल को पूरे देश में लागू किया जा सकता है ।
लिंग भेद एवं कन्या भ्रूण हत्या लिंगभेद (जेण्डर इन इक्वेलिटी) एक बहुत बड़ी समस्या है । लड़का-लड़की भेद इस सीमा तक है कि इतनी राष्ट्रीय स्तर की जागरूकता के बाद भी नर-नारी अनुपात में विसंगति बढ़ती जा रही है । कन्या भ्रूण हत्या के कारण यह समस्या पैदा हुई है । लड़का ही वंश चलाएगा, यह एक मूल भ्रांति है और इस संबंध में एक व्यापक अभियान गायत्री परिवार द्वारा चलाया जा रहा है । यदि अन्य आध्यात्मिक शीर्ष वक्ता, सामाजिक संगठन और अधिक जागरूक होकर इस क्षेत्र में अपनी शक्ति झोंक दें, तो हम इस कलंक से मुक्ति पा सकते हैं । बड़े आधुनिक शहर यथा चण्डीगढ़ में भी यह अनुपात जब हम 1000/750 का देखते हैं, तो लगता है कि पढ़े-लिखे भी उतने ही पिछड़े व नासमझ हैं । इस संबंध में रैलियाँ निकलें, इन्टरनेट से लेकर प्रिण्ट मीडिया, प्रदर्शनी के सभी साधन प्रयुक्त हों एवं दोषियों को कड़े दण्ड दिये जायँ, तभी कुछ हो सकता है ।
खर्चीली शादियाँ एवं दहेज का दानव समाज की नूतन संरचना में सर्वाधिक बाधक है हमारे यहाँ पाया जाने वाला आर्थिक वर्गभेद एवं एक मान्यता कि जितनी अधिक खर्चीली शादी होगी, जितना अधिक दहेज दिया जाएगा, जितना अपव्यय किया जाएगा, उतना ही वह व्यक्ति बड़ा माना जाएगा । खर्चीली शादियाँ हमें दरिद्र एवं बेईमान बनाती हैं यह हमारी गुरुसत्ता ने आज से सत्तर वर्ष पूर्व से कहना आरंभ कर दिया था । आज भी दहेज का दानव हमें निगलता हुआ समाज की प्रगति में रोड़े डाल रहा है । लगता तो यह है कि जैसे-जैसे तथाकथित अमीरी बढ़ी है, दिखावे की वृत्ति भी बढ़ी है, दहेज में दी जाने वाली राशि भी बढ़ी है, सभी के रेट निर्धारित हैं एवं साथ में दहेज के नाम पर जला दी जाने वाली बहुओं की संख्या भी बढ़ी है । गायत्री परिवार ने आदर्श विवाहों का आंदोलन चलाया एवं शान्तिकुञ्ज, गायत्री तपोभूमि, विभिन्न शक्तिपीठों पर इनके आयोजन की श्रृंखला चलायी है । अभी तक दो लाख से अधिक ऐसे आयोजन हो चुके हैं, जिनमें पाँच रुपये की नाममात्र की राशि में सादगी भरे विवाह हुए हैं । पर यह तो समुद्र में एक बूँद के समान है । सामाजिक संगठनों के आदर्श विवाहों का सिलसिला भी चले एवं दहेज व अपव्यय के खिलाफ माहौल बने, यह जरूरी है । युवा शक्ति यह संघर्षात्मक आंदोलन चला सकती है ।
सम्प्रदाय-भेद हमारे देश में सम्प्रदायगत भेद भी इतना है कि लगता है हम हिन्दू, मुस्लिम भाई-भाई नहीं-कई वर्गों में बँटे कबीले हैं । एक राष्ट्र की रचना में ये भेद घातक हैं । अपनी उपासना पद्धति हमारी हो सकती है, पर एक अखण्ड भारत, सबको शिक्षा-सबको ज्ञान, बढ़ने के समान अवसर पर तो हम एक हो सकते हैं । सबके लिए सद्बुद्धि सबके लिए उज्ज्वल भविष्य की हमारी गायत्री मंत्र की प्रार्थना एक सार्वभौम प्रार्थना बन सकती है । यदि मंत्र से कोई परहेज हो, तो उसके अर्थ पर तो एक राय बनायी जा सकती है । सम्प्रदायवाद के नाम पर आतंकवाद तो इस राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा नासूर है । इसके लिए सबको मिलकर युद्ध करना चाहिए एवं अपने राष्ट्र मन्दिर की-संस्कृति प्रधान मूल्यों की रक्षा की जानी चाहिए । एक और समस्या हमारे यहाँ है । भिक्षा व्यवसाय हमारे यहाँ ऐसा फला-फूला है, जैसा कहीं देखने में नहीं आता । धर्म के नाम पर यह पाला पोसा जाता है । अकर्मण्य, नाकारा, अपराधी, राष्ट्रविरोधी भी इसमें शामिल हो जाते हैं एवं इस प्रगतिशील राष्ट्र के लिए एक कलंक बन जाते हैं । कहाँ तो विप्रो, इन्फोसिस, आय.आय.एम. की बड़ी संरचनाएँ, हर क्षेत्र में प्रगति करता मिसाइल टेक्नॉलाजी सीखता-सिखाता भारत, दूसरी ओर भीख माँगते लोग । यह कलंक मिटाया ही जाना चाहिए ।
अश्लीलता का जहर अश्लीलता के विष वृक्ष को हम सबको मिलकर जड़ से नष्ट करना होगा । यह अपराध की जननी है एवं नारी पर, किशोरों पर अत्याचार के रूप में, जिसमें उनकी पहचान ही खत्म कर दी जाती है, निकलती है । अश्लीलता जिस रूप में इंटरनेट पर, कैबल, टीवी, नेट वर्क एवं सड़क किनारे लगे होर्डिंग, दीवाल पर चिपके पोस्टर्स के माध्यम से हम सबकी नैतिकता पर प्रहार करती है, उस पर हमारी चेतना क्यों नहीं जागती, यह एक प्रश्नचिह्न है । बढ़ते बलात्कार, घरेलू हिंसाएँ एवं सेक्स संबंधी अपराध इसी अश्लीलता के जहर के कारण हैं, जो हमें हमारे बेडरूम में एवं रोज के समाचार पत्रों में परोसी जा रही है । इसके खिलाफ जनमत बनाया जाना चाहिए ।
गंदगी हमारा सबसे बड़ा कलंक इस देश का एक और सामाजिक कलंक है, जिसके कारण पर्यटक यहाँ आने से बिदकते हैं । जबकि अभी भी विश्व के पाँच प्रमुख पर्यटक देशों में भारत का नाम है, जहाँ विश्वभर के लोग आते हैं । वह है-गन्दगी । हम जहाँ चाहे वहाँ जो मन में आए फेंकते रहते हैं । केले खाए, बस की खिड़की से छिलके फेंक दिये । कोई गिरे-उसकी हड्डी टूटे वो जाने । प्लास्टिक चारों ओर पालीथिन की थैलियों के रूप में, टूटी बोतलों के रूप में छाया दिखाई देता है । किसी भी शहर का प्रवेश द्वार इन्हीं से हमारा स्वागत करता है । अस्वच्छता जहाँ भी रहेगी, वहाँ सभ्यता एवं समृद्धि नहीं आएगी । हमें इस क्षेत्र में लोक मानस जगाना होगा ताकि हर व्यक्ति की चेतना अंदर से यह दृश्य देखकर हिले । हम स्वयं गंदगी न फैलायें, कोई और करें, तो उसे सब मिलकर टोकें । यदि हमने राष्ट्र को स्वच्छ रखा, सामूहिक श्रमदान की प्रवृत्ति जिन्दा रखी, तो हमारे गाँव, कस्बे, मुहल्ले, कालोनी रहने लायक हो जायेंगे ।
तथाकथित अवैज्ञानिक प्रचलन अंधविश्वास, मूढ़मान्यताएँ, चमत्कारवाद, ज्योतिष के नाम पर लूटपाट, भाग्यवाद, भटकती आत्माओं की सनसनीपरक खबरें हमारे देश की प्रगति में बाधक हैं, यह हमारे देश के पढ़े-लिखे logo ko भी समझ में नहीं आ रहा । विज्ञान के इस युग में ऊँची टीआरपी के आधार पर यह सब बिक रहा है-टीवी चैन lबाजार गर्मागर्म है-यह सुनकर माथा घूम जाता है । कैसा अजूबा है यह देश-एक पाँव इक्कीसवीं सदी में, आर्थिक समृद्धि एवं आय. टी. की प्रगति के क्षेत्र में, दूसरा पाँव विभिन्न ग्रहों के मंदिर में शांति करता, पूजा करता, चढ़ावा चढ़ाता एवं तरह-तरह के स्वांग रचता है ।
एक संग्राम की है जरूरत यदि हमें इन सामाजिक असमानताओं से जूझना है- इन सभी कलंकों से युद्ध करना है, तो हमें एक जुट होना ही पड़ेगा । मिलकर संग्राम करना होगा । नैतिक आधार पर यह सामाजिक क्रांति करनी होगी । यह महासमर है । अगले तीन वर्षों में हम इन आंदोलनों को हाथ में लें एवं एक-एक कर इनको समाज से हटाते चले जायें । वैज्ञानिक अध्यात्मवाद प्रधान चिन्तन, आध्यात्मिक मानवतावाद, विचार क्रांतिपरक सोच ही हमारे राष्ट्र को एक अखण्ड विश्व का जगद्गुरु पुनः बना सकेगी ।

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