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 पीएचडी चैम्बर के ‘स्वच्छ पर्यावरण अभियान’ ने एलकान इंटरनेशनल स्कूल में आयोजित की रीसाइक्लिंग जागरुकता कार्यशाला
  
(मिज़गान न्यूज़ नेट)
नई दिल्ली, 2 जनवरी 2017 पीएचडी चैम्बर के ‘स्वच्छ पर्यावरण अभियान’ ने प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण संरक्षण के प्रयास में पीएचडी चैम्बर आफ कामर्स एण्ड इंडस्ट्री के तत्वावधान में रीसाइक्लिंग जागरुकता कार्यशाला का आयोजन किया। कार्यक्रम का आयोजन मयूर विहार के एलकान इंटरनेशनल स्कूल में किया गया जिसमें तकरीबन 1000 विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। इस मौके पर स्कूल के प्रिंसिपल श्री अशोक के पाण्डे ने कहा, ‘‘मैं इस अभियान से जुड़ी पूरी टीम को बधाई देना चाहूंगा, जिन्होंने स्वच्छ पर्यावरण से जुड़े इस गम्भीर मुद्दे पर हम सभी को जागरुक बनाने का प्रयास किया है।’’ ’’वैश्विक परिप्रेक्ष्य के साथ भारतीय मूल्यों- ळसवइंस च्मतेचमबजपअम प्दकपंद टंसनमेश् को बरक़रार रखने के हमारे नारे के साथ हम विद्यार्थियों को रचनात्मकता की दृष्टि से विश्वस्तरीय मानदण्डों के समकक्ष लाते हैं। पीएचडी स्वच्छ पर्यावरण अभियान की यह विशेष कार्यशाला विद्यार्थियों में सफाई की आदत पैदा करने की दिशा में एक अनूठी पहल है। पीएचडी चैम्बर स्वच्छ पर्यावरण अभियान के तहत विद्यार्थियों को प्रेरित करने के लिए स्कूलों और काॅलेजों में विशेष गतिविधियों का आयोजन किया जाता है। इस अभियान को भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का समर्थन प्राप्त है। सामाजिक बदलाव के लिए स्कूलों के सशक्तीकरण द्वारा समाज को स्वच्छ पर्यावरण का संदेश देना इस अभियान का मुख्य उद्देश्य है। विद्यार्थी व्यर्थ पदार्थों की रीसाइक्लिंग एवं पर्यावरण को इको-फ्रैंडली बनाने का संदेश प्रसारित करने के लिए अम्बेसडर बन रहे हैं। ‘स्वच्छ पर्यावरण अभियान’ के तहत आयोजित रीसाइक्लिंग कार्यशाला का आयोजन दिल्ली के विभिन्न स्कूलों में 2000 से अधिक विद्यार्थियों के लिए किया जा चुका है, ये कार्यशालाएं उन्हें व्यर्थ के पृथक्करण तथा प्लास्टिक, पेपर, कांच, धातु, कार्डबोर्ड, पुराने परीक्षा के पेपर आदि की रीसाइक्लिंग को बारे में जानकारी प्रदान करती हैं। सिरोही शामिल थे।
 वीर अब्दुल हमीद की 49वीं पुण्यतिथि पर पैंथर्स पार्टी की श्रद्धांजलि
(मिज़गान न्यूज़ नेट)
दिल्ली प्रदेश नेशनल पैंथर्स पार्टी के सैंकड़ों कार्यकताओं ने आज यहां नई दिल्ली स्थित पैंथर्स कार्यालय में वीर अब्दुल हमीद की 49वीं पुण्यतिथि के अवसर पर श्रद्धांजलि अर्पित की। परमवीर चक्र कम्पनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद भारतीय सेना की 4 ग्रेनेडियर में एक सिपाही थे, जिनकी मृत्यु भारत-पाक युद्ध 1965 में खेमकरण सैक्टर में हुई। वीर अब्दुल हमीद का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में 1 जुलाई, 1933 में एक साधारण दर्जी परिवार में हुआ था। उन्होंने अपने सेवा काल में सैन्य सेवा मेडल, समर सेवा मेडल और रक्षा मेडल से सम्मान प्राप्त किया था। 8 सितम्बर, 1965 की रात में पाकिस्तान द्वारा भारत पर हमला करने पर उस हमले का जवाव देने के लिए भारतीय सेना के जवान उनका मुकाबला करने को खड़े हो गए। वीर अब्दुल हमीद पंजाब के तरन तारन जिले के खेमकरण सेक्टर में सेना की अग्रिम पंक्ति में तैनात थे। पाकिस्तान ने उस समय के अपराजेय माने जाने वाले ‘अमेरिकन पैटन टैंकों‘ के साथ ‘खेम करन‘ सेक्टर के असल उताड़ गांव पर हमला कर दिया। भारतीय सैनिकों के पास न तो टैंक थे और नहीं बड़े हथियार लेकिन उनके पास था भारत माता की रक्षा के लिए लड़ते हुए मर जाने का हौसला। भारतीय सैनिक अपनी साधारण ‘थ्री नॉट थ्री रायफल‘ और ‘एलएमजी‘ के साथ पैटन टैंकों का सामना करने लगे। हवलदार वीर अब्दुल हमीद के पास ‘गन माउनटेड जीप‘ थी जो पैटन टैंकों के सामने मात्र एक खिलौने के सामान थी। वीर अब्दुल हमीद ने अपनी जीप में बैठकर अपनी गन से पैटन टैंकों के कमजोर अंगों पर एकदम सटीक निशाना लगाकर एक-एक कर धवस्त करना प्रारम्भ कर दिया। उनको ऐसा करते देख अन्य सैनकों का भी हौसला बढ़ गया और देखते ही देखते पाकिस्तान फौज में भगदड़ मच गई। वीर अब्दुल हमीद ने अपनी ‘गन माउनटेड जीप‘ से सात ‘पाकिस्तानी पैटन टैंकों‘ को नष्ट किया था। सारा देश उनकी बहादुरी को प्रणाम करता है।
 प्रकाश जावडेकर को लघु व मध्यम समाचार पत्रों की समस्याओं के हल करने की गुज़ारिश
(मिज़गान न्यूज़ नेट)
चन्द्रशेखर जोशी अध्यक्ष उत्तराखण्ड आईएफएसएमएन तथा दीपक धीमान अध्यक्ष- महानगर देहरादून द्वारा दिये गयेज्ञापन में कहा गया है कि भारतीय लघु और मध्यम समाचार पत्रों का महासंघ-इंडियन फेडरेशन ऑफ स्माल एण्ड मीडियमन्यूज पेपर्स, नई दिल्ली राष्ट्रीय स्तर पर गठित है जो १९८५ से अस्तित्व में हैं जिसके कार्यक्रमों में समय-समयपर तत्कालीन प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों, पी०सी०आई० चैयरमैनों, लोकसभा अध्यक्षों ने हिस्सा लिया है।फैडरेशन ने पीआईबी व डीएवीपी में भी भागीदारी की है। फैडरेशन उत्तराखण्ड में भी सफलतापूर्वक कार्य कर रहीहै। स्वतंत्रता आंदोलन तथा उत्तराखण्ड राज्य गठन आंदोलन में लघु व मध्यम समाचार पत्रों की महत्वपूर्णभूमिका रही है, परन्तु वर्तमान में उत्तराखण्ड के लघु और मध्यम समाचार पत्र उपेक्षित है। हम निम्न बिन्दुओंपर आपका ध्यान आकर्षित कराना चाहते हैंः- केन्द्र सरकार का क्पतमबजवतंजम व ।कअमतजपेपदह - टपेनंस च्नइसपबपजल ;क्।टच्द्ध विभाग- जो मोदीसरकार के बाद भी रत्तीभर भी नही बदल पाया। ज्ञात हो कि डीएवीपी नाम से पुकारा जाने वाला विभाग मोदीसरकार की शान में कालिख पोतने में लगा है, जो ढर्रा कांग्रेस सरकार के समय था उसमें रत्ती भर भी बदलावनही आया। १. डीएवीपी समाचार पत्रों को विज्ञापन हेतु सूचीबद्वता का कार्य करता है। इसमें भ्रष्टाचार का आलम यह है किइम्पैनलमेन्ट करने हेतु रेट बांध दिया गया है, अन्यथा प्रकाशक लाख कोशिश कर ले, उसका इम्पैनलमेन्ट नहीहो सकता।
 कटरा पुलिस के कातिलाना हमला केस की उच्चतम न्यायालय में 21 अगस्त को सुनवाई
पैंथर्स पार्टी के नेता महासचिव सुश्री अनीता ठाकुर, महासचिव एडवोकेट श्री हरिचंद जलमेरिया और वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया प्रभारी श्री पी.के. गंजू द्वारा सितम्बर, 2007 में कटरा पुलिस के बर्बर हमले के खिलाफ दायर की याचिका की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय में 21 अगस्त, 2014 को होगी। इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रो. भीमसिंह और जम्मू-कश्मीर राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अशोक माथुर पेश हुए। न्यायाधीश्ज्ञ श्रीमती रंजना प्रकाश देसाई और न्यायमूर्ति एन.वी. रमाना शामिल खंडपीठ ने प्रो. भीमसिंह और राज्य सरकार की ओर से पेश हुए वकील के तर्क सुनने के बाद मामले की अगली सुनवाई 21 अगस्त, 2014 निर्धारित की। अदालत ने जम्मू-कश्मीर सरकार, जम्मू-कश्मीर के पुलिस महानिदेशक, डिविजनल कमिश्नर, डिप्टि कमिश्नर, रियासी और कटरा के एसएचओ को निर्देश दिया कि जम्मू विस्थापितों को दी गई राहत से संबंधित सभी दस्तावेज पेश करें। सुप्रीम कोर्ट ने 13.7.2006 को आदेश दिया था कि जम्मू के लगभग 2201 विस्थापितों को कश्मीरी विस्थापितों के समान राहत मुहैया कराई जाए। अदालत ने इस आदेश पर अमल के बारे में रिपोर्ट पेश करने के लिए भी कहा। प्रो. भीमसिंह ने अदालत को बताया कि भारत संघ और जम्मू-कश्मीर सरकार के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की गयी है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद भी जम्मू विस्थापितों को कश्मीरी विस्थापितों के समान राहत मुहैया कराने में विफल रही हैं। उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि राहत का 21 करोड़ रुपये अभी भी राज्य सरकार पर बकाया हैं, जो राज्य सरकार ने स्वीकार किया। उन्होंने बताया कि इससे संबंधित अवमानना याचिका जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में 2008 लम्बित है। उन्होंने बताया कि जम्मू-कश्मीर सरकार जानबूझकर अदालत के आदेष का उल्लंघन किया है जो जम्मू विस्थापितों विशेषकर तलवाड़ा शिवरों में भूखा मरने पर मजबूर किया। उन्होंने बताया कि कुछ विस्थापित को अपने बच्चों को बेचना पड़ा ताकि बाकी परिवार पालन-पोषण कर सके। ये लोग जब कटरा के नजदीक तलवाड़ा विस्थापित दिल्ली तक शांतिपूर्ण मार्च की अगुवाई कर रहे थे। 7 अगस्त, 2007 को जम्मू-कश्मीर पुलिस ने उस समय के मुख्यमंत्री (गुलाम नबी आजाद) के आदेश से पैंथर्स पार्टी के नेताओं और तलवाड़ा के विस्थापितों पर बर्बरतापूर्ण लाठीचार्ज और अंश्रुगैस चलाने की साजिश की थी, जिसमें हरिचंद जलमेरिया, एडवोकेट की टांग तोड़ दी गयी थी, पैंथर्स पार्टी के महासचिव अनीता ठाकुर को बर्बरता से सड़कों पर घसीटा गया, बाल नोचे गये और हाथों और लातों से पिटायी की गयी। श्री प्रदुमन किशन गंजू जो एक वरिष्ठ पत्रकार हैं उन्हें इसलिए बंद कर दिया गया कि वे पुलिस के अत्याचार की कवरेज कर रहे थे। प्रो. भीमसिंह ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पुलिस ने राष्ट्रीय राजमार्ग को बैरिकेट लगाकर बंद कर दिया और सैंकड़ों बच्चों, औरतें, बूढ़े मर्द जो दिल्ली में संसद के समाने धरना देने के लिए जा रहे थे रोका गया, मारा गया और थाने में बंद कर दिया गया। अदालत ने कहा कि हमें प्रो. भीमसिंह पर भरोसा करते है। प्रो. भीमसिंह ने कहा कि इंग्लिश मेरी मातृभाषा नहीं है, लेकिन पुलिस ने जो किया उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है, जिसका विश्वास आपको वीडियो फिल्म देखने के बाद ही आएगा। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि जम्मू विस्थापितों को दी गई राहत से संबंधित सभी रिकार्ड और याचिकाकर्ता और अन्य विस्थापितों के खिलाफ दायर किए गए मामलों की स्टेटस रिपोर्ट अदालत में पेश करे।
'आप'की कैबिनेट की दिल्ली सचिवालय में हुई पहली बैठक में यह फैसला किया गया। बैठक में अरविंद और उनके साथ शपथ लेने वाले छह मंत्रियों के विभागों का भी बंटवारा कर दिया गया। अरविंद केजरीवाल ने गृह, वित्त, योजना और ऊर्जा जैसे अहम विभाग अपने पास ही रखे हैं। मनीष सिसोदिया शिक्षा, पीडब्ल्यूडी और शहरी विकास विभाग का काम देखेंगे। सोमनाथ भारती को टूरिजम, कानून और प्रशासनिक सुधार का काम दिया गया है। इसके अलावा गिरीश सोनी को एससी/एसटी और श्रम विभाग, सौरभ भारद्वाज को परिवहन मंत्रालय, राखी बिड़ला को महिला एवं बाल कल्याण और सामाजिक न्याय विभाग, सत्येंद्र जैन को स्वास्थ्य और उद्योग मंत्रालय का प्रभार सौंपा गया है।
 मनमोहन सिंह ने दी केजरीवाल को बधाई
Dec 28, 2013 नई दिल्ली। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आज दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने पर अरविंद केजरीवाल को शुभकामना दी है। मनमोहन सिंह ने केजरीवाल को टेलीफोन पर दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने पर बधाई। उन्होंने केजरीवाल को नई जिम्मेदारियों के पूरा करने के लिए अपना समर्थन जताया। वहीं केजरीवाल के गुरु समाज सेवी अन्ना हजारे ने भी केजरीवाल को अपनी शुभकामनाएं दी और कहा कि केजरीवाल को संदेश भेजा है कि उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के लिए बधाई देता हूं। साथ ही साथ आज शपथ लेने वाले मंत्रियों को भी शुभकामना देता हूं।
नई दिल्ली: दिल्ली के नए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शपथ ग्रहण करने के कुछ ही घंटों के भीतर अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों की मदद के लिए नौकरशाह नियुक्त कर दिए। शिक्षा, उच्च शिक्षा, लोक निर्माण विभाग, शहरी विकास विभाग, स्थानीय संस्थाएं, भूमि और भवन तथा राजस्व विभाग संभाल रहे मनीष सिसोदिया के सहायक अतिरिक्त आयुक्त (व्यापार और कर) सी अरविंद होंगे। प्रशासकीय सुधार, कानून, पर्यटन, कला और संस्कृति मंत्रालय संभाल रहे सोमनाथ भारती के सहायक दिल्ली पर्यटन और परिवहन विकास निगम (डीटीटीडीसी) के प्रबंधक बिनय भूषण होंगे। स्वास्थ्य, उद्योग और गुरुद्वारा चुनाव विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे सत्येंद्र जैन के सहायक पीके पांडा विशेष आयुक्त (व्यापार और कर) होंगे। मंत्रिमंडल की सबसे युवा सदस्य राखी बिड़ला को महिला और बाल विकास, सामाजिक सुधार और भाषा विभाग दिए गए हैं। उनके सचिव अतिरिक्त निदेशक (शिक्षा) डी वर्मा होंगे। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण, रोजगार, विकास और श्रम तथा कौशल अभियान विभाग गिरीश सोनी को सौंपा गया है। उनके सचिव सी उदय कुमार अतिरिक्त सचिव (शहरी विकास) होंगे। परिवहन, खाद्य आपूर्ति, पर्यावरण, चुनाव और आम प्रशासकीय सुधार विभाग सौरभ भारद्वाज को दिए गए हैं। उनके सचिव उप महानिरीक्षक (जेल) जी सुधाकर होंगे।
लखनऊ राष्ट्रीय समस्या समाधान सुझाव परिषद् के संयोजक एवं दिल्ली के आरटीआई एक्टिविस्ट गोपाल प्रसाद ने 11अप्रैल,2013 से आगामी लोकसभा चुनाव तक अमेठी एवं रायबरेली के विभिन्न इलाकों में आरटीआई के श्रृंखलावद्ध प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने की घोषणा की है. उनका कहना है की भ्रष्टाचार आज चरम सीमा पर पहुँच चुका है. देश एवं प्रदेश की विभिन्न जाँच एजेंसियां राजनैतिक गुलामी की शिकार है. पारदर्शिता की उपेक्षा एवं भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठानेवालों के साथ बदसलूकी की जा रही है, धमकी दी जा रही है तथा उनकी हत्या भी की जा रही है. वास्तव में देश के नागरिकों को अंग्रेजों की गुलामी से तो मुक्ति मिल चुकी है , पर उसके बाद भी हमें वास्तविक रूप से आजादी नहीं मिल पाई है. आज भ्रष्ट व्यवस्था की गुलामी में हमलोग जी रहें हैं . देश के कुछ औद्योगिक घराने तो राजनीतिज्ञों एवं अफसरशाहों को भ्रष्ट बनाने में घोर प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं . देश की समस्याएं बढ़ती ही जा रही है परन्तु उसका समाधान प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने वालों के पास भी नहीं है. खास बात यह है कि देश की अधिकांश जनता को उसके मूल अधिकार एवं कर्तव्य की जानकारी ही नहीं है. जानकारी के आभाव में जनता बेवसी की स्थिति में है. इसीलिये कोई भी जनक्रांति आज सफल नहीं हो पा रहा है. जब तक जनता को उसके अधिकार , कर्तव्य , समस्या एवं समाधान के प्रति जागरूक नहीं किया जायेगा, तब तक स्थिति में परिवर्तन हो ही नहीं सकता है. इन्हीं महत्वपूर्ण बातों को ध्यान में रखकर हमारी संस्था एवं अन्य संस्था से जुड़े कार्यकर्ताओं के सहयोग से हमने जनजागरूकता अभियान की शुरूआत करने का निर्णय लिया है. इस अभियान के तहत जनता को प्राप्त संवैधानिक मौलिक अधिकार, उसके कर्तव्य , समस्या व समाधान तथा जनता को प्राप्त एकमात्र त्वरित एवं परभी कानून (आरटीआई) के सम्बन्ध में व्यापक जानकारी देकर उन्हीं के माध्यम से आरटीआई फ़ाइल करवाने की शुरुआत की जायेगी . घोषणाओं, वादों एवं दावों की हकीकत जानने का प्रयास किया जायेगा. संस्था से जुड़े आधे सहयोगी "प्रबोधन रिसर्च ग्रुप, मुंबई "के निर्देशन में सर्वेक्षण का कार्य करेगी तथा आधे सहयोगी आरटीआई प्रशिक्षण के माध्यम से अमेठी एवं रायबरेली के विभिन्न इलाकों में आरटीआई प्रशिक्षकों को तैयार करेगॆ. इस प्रकार सुदूर इलाके तक आरटीआई आन्दोलन की जड़ें मजबूत हो पायेगी तथा आम जनता की जागरूकता से खामोशी टूटेगी . जब खामोशी टूटेगी तभी भ्रष्ट व्यवस्था में बेचैनी होगी और धीरे -धीरे सामाजिक परिवर्तन संभव हो सकेगा. भ्रष्टाचार , मंहगाई , भुखमरी, गरीबी, बेरोजगारी , अशिक्षा एवं कुपोषण पर फोकस करते हुए विभिन्न इलाकों में जनचेतना लेन के उद्देश्य से पोस्टर, हैंडबिल , स्टीकर, डाक्युमेंट्री को माध्यम बनाया जायेगा. धरना, प्रदर्शन , विचार गोष्ठी के माध्यम से इस कार्य को गतिशील बनाने की दिशा में संवाद व समन्वय की प्रक्रिया जारी है. देश में बड़े पैमाने पर व्याप्त सामजिक व आर्थिक विषमता के मौजूदा वातावरण की छानबीन हेतु भी आरटीआई का उपयोग किया जा सकता है . विशेषकर छात्रों, युवाओं,शोषितों, पीड़ितों के सामूहिक शक्ति की बुनियाद पर सम्पूर्ण क्रांति का आगाज नए सिरे से करने का दृढ़ संकल्प हमलोगों ने किया है. गड्वारा (प्रतापगढ़) के पूर्व विधायकप्रदीप मिश्र सौरभ के सानिध्य में इस आन्दोलन को एक्सूत्रित करने एवं प्रभावी बनाने की दिशा में अभूतपूर्व सफलता मिल रही है. आरटीआई एक्टिविस्ट गोपाल प्रसाद ने कहा की बिहार के मुजफ्फरपुर में रामकुमार ठाकुर नामकआरटीआई कार्यकर्त्ता एवं मनरेगा वाच नामक संस्था के संचालक की हत्या के कारण उन्होंने इस बार होली नहीं खेली, साथ ही उन्होंने अपना जन्मदिवस(10 अप्रैल) को शोक दिवस के रूप में मनाया. भारतीय नव वर्ष (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रमी संवत 2070) के अवसर पर उन्होंने अमेठी से आरटीआई क्रांति का शंखनाद करने का निश्चय किया है।
 किसानों की बढती आत्महत्याओं एवं कर्जों के आंकड़े बोलते हैं... गोपाल प्रसाद आर टी आई एक्टिविस्ट
राष्ट्रीय क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक1995 से अब तक देश में आत्महत्या कर जान गंवाने वाले किसानों की संख्या दो लाख 70 हजार 940. *राष्ट्रीय क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक, 2011 में देश भर में 14 हजार 27 किसानों ने आत्महत्या कर ली.
*आरटीआई के तहत मिली जानकारी के अनुसार 2008 से 2011 के दौरान सबसे अधिक महाराष्ट्र में 1,862 किसानों ने आत्महत्या की.
*देश में हर महीने औसतन 70 से अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं.
* छत्तीसगढ़ में पूरे साल एक भी किसान ने आत्महत्या नहीं की।
* देश की राजधानी दिल्ली में भी दस किसानों ने आत्महत्या कर ली।
*देश में किसानों के 1,25,000 परिवारों के सूदखोरों एवं महाजनों से कर्ज लिया है जबकि 53,902
किसान परिवारों ने व्यापारियों से कर्ज लिया.बैंकों से 1,17,100 किसान परिवारों ने कर्ज लिया
*बढ़ती लागत, घटती उपज, खाद-बीज का गहराता संकट, बिजली-पानी की समस्या
और उपज का वाजिब मूल्य न मिलने से किसानों की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं.
*कलराज मिश्र ने राजसभा में किसानों कि आत्महत्या का मामला 2011 में उठाया था
सरकार ने किसानों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों लुटने के लिए छोड़ दिया है . खाद के दाम ग्यारह बार बढाए गए एवं खाद मनमानी कीमत पर बेची जा रही है.खाद मनमानी कीमत पर बेची जा रही है .सरकार द्वारा दिए गए बीज प्रायः अमानक होने के कारण उगते ही नहीं. ऐसी स्थिति में आखिर किसान क्या करे? ज्यादातर सरकार किसानों को बिजली दे ही नहीं रही है. राजस्थान में आसन्न अकाल के मद्देनजर सरकार के बिजली कटौती नहीं करने पर ही थोड़ी बहुत बची फसल को बचाया जा सकता है.. इधर राष्ट्रीय किसान महासंघ के संयोजक चौधरी सूरजमल सहित कई नातों एवं संगठनों ने केंदीय इस्पात मंत्री बनी प्रसाद वर्मा के मंहगाई बढ़ने से किसानों को फायदा वाली बात को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है . किसान नेताओं का कहना है कि मंहगाई से फायदा किसानों को नहीं बल्कि बिचौलिए को होता है. किसान की फसल तो हमेशा से सस्ते में ही ली जाती है. जैसे ही किसान की फसल व्यापारियों की गोदामों में पहुच जाती है तो फसल के दाम बढ़ जाते हैं. इससे किसान अपने आप को ठगा महसूस करता है. सरकार किसानों के हित में तो सोचती नहीं है उल्टा मंहगाई पर किसानों का फायदा बताकर किसानों का मजाक उड़ाया जा रहा है. सरकार ने किसानों को राहत के नाम पर 60 हजार करोड के ऋण का ब्याज माफ कर वाहवाही लूटने का प्रयास किया, जबकि इसके एवज में उद्योगपतियों को 7लाख करोड की राहत दी जाती है. इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि किसानों के प्रति सरकार कितनी संवेदनहीन है. जब खुद प्रधानमंत्री ने भाषण में कहा है कि देश का बजट मानसूनके कारण से बिगाड़ा है तो तो फिर किसानों कि हालत बिगाडने पर क्यों तुली है? यदि किसान , कृषि और देश को बचाना है तो कृषि लागत को कम करना होगा ,किसानो को उसके फसल का उचित दाम मिले , यह सुनिश्चित करने के लिए मंडी व्यवस्था को ठीक करना चाहिए और मंहगाई से उपभोक्ताओं को यदि बचाना है तो बिचौलिए एवं जमाखोरों पर अंकुश लगाना पड़ेगा. यूपीए सरकार संसदीय स्थाई समिति कि मांगो को मने , औपनिवेशिक काला भूमि अधिग्रहण कानून और कृषि विरोधी विशेष आर्थिक क्षेत्र कानून 2005 रद्द हो.
सरकार की तमाम कोशिशों और दावों के बावजूद कर्ज के बोझ तले किसानों की आत्महत्या का सिलसिला नहीं रूक रहा है.देश में हर महीने 70 से अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं. जबकि एक लाख 25 हजार परिवार सूदखोरों के चंगुल में फंसे हुए हैं.सूचना के अधिकार कानून के तहत मिली जानकारी के अनुसार, देश में 2008 से 2011 के बीच देशभर में 3,340 किसानों ने आत्महत्या की. इस तरह से हर महीने देश में 70 से अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं.आरटीआई के तहत कृषि मंत्रालय के कृषि एवं सहकारिता विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, 2008 से 2011 के दौरान सबसे अधिक महाराष्ट्र में 1,862 किसानों ने आत्महत्या की. आंध्रप्रदेश में 1,065 किसानों ने आत्महत्या की. कर्नाटक में इस अवधि में 371 किसानों ने आत्महत्या की.इस अवधि में पंजाब में 31 किसानों ने आत्महत्या की जबकि केरल में 11 किसानों ने कर्ज से तंग आ कर मौत को गले लगाया.सरकार के तमाम दावों के बावजूद देश में किसानों की आत्महत्याओं में कमी नहीं आ रही है.
आरटीआई के तहत मिली जानकारी के अनुसार, देश भर में सबसे अधिक किसानों ने सूदखोरों से कर्ज लिया है. देश में किसानों के 1,25,000 परिवारों के सूदखोरों एवं महाजनों से कर्ज लिया है जबकि 53,902 किसान परिवारों ने व्यापारियों से कर्ज लिया.बैंकों से 1,17,100 किसान परिवारों ने कर्ज लिया जबकि कोओपरेटिव सोसाइटी से किसानों के 1,14,785 परिवारों ने कर्ज लिया. सरकार से 14,769 किसान परिवारों ने और अपने रिश्तेदारों एवं मित्रों से 77,602 किसान परिवारों ने कर्ज लिया.आरटीआई कार्यकर्ता गोपाल प्रसाद ने सूचना के अधिकार के तहत 2007-12 के दौरान भारत में किसानों की मौतों का संख्यावार, क्षेत्रवार ब्यौरा मांगा था. उन किसानों की संख्या के बारे में जानकारी मांगी गई थी जिन्होंने सूदखोरो से कर्ज लिया था.
2011 में भी देश भर में 14 हजार से ज्यादा किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। महाराष्ट्र तीन हजार 337 आत्महत्याओं के साथ इस सूची में सबसे ऊपर है। आंध्र प्रदेश में दो हजार 206, कर्नाटक में दो हजार 100 और मध्य प्रदेश मे एक हजार 326 किसानों ने आत्महत्याएं कीं। सभी राज्यों में सबसे अच्छा प्रदर्शन छत्तीसगढ़ का रहा, जहां पूरे साल एक भी किसान ने आत्महत्या नहीं की। देश की राजधानी दिल्ली में भी दस किसानों ने आत्महत्या कर ली।महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में जारी कृषि संकट के कारण किसानों ने आत्महत्या की है।‘विदर्भ जन आंदोलन समिति’ के अध्यक्ष किशोर तिवारी ने नवंबर 2009 में विदर्भ में 22 किसानों की आत्महत्या की सूची जारी करते हुए सरकार से मांग किया था कि राज्य में कपास तथा अन्य फसलों को हुए भारी नुकसान के कारण निराश किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर होने के कारण अब तक 895 किसान आत्महत्या कर चुके है।पूरे देश मे मराठी हितैषी होने के ढोल पीटनेवाले बाल ठाकरे जी और राज ठाकरे को हर साल गरीब किसानो की आत्महत्या की घटना दिखाई नही देती और ना सुनाई देती है. अपने आप को महाराष्ट्र के सर्वेसर्वा कहलानेवाले शरद पवार क्यों खामोश हैं?क्या उन्हे यह दिखाई नहीं देता? यदि नहीं तो अपनी गद्दी छोड़ क्यों नहीं देते? स्पष्ट है कि केंद्र और राज्य सरकारें इसके लिए दोषी हैं. किसानो को बचाने के लिए इन्हें फॉरन आगे आना चाहिए. इन हालातों के लिए दोषी कौन है? सरकार का खेती को फायदे का सौदा बनाने का दावा खोखला नज़र आता है.
राष्ट्रीय क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक, 2011 में देश भर में 14 हजार 27 किसानों ने आत्महत्या कर ली। इसके साथ ही 1995 से अब तक देश में आत्महत्या कर जान गंवाने वाले किसानों की संख्या दो लाख 70 हजार 940 पर पहुंच गई है। एक दशक से देश भर में किसानों की आत्महत्या के मामले में पाच राज्य महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश शीर्ष पर बने हुए हैं। 2011 में भी पूरे देश में किसानों द्वारा की गई आत्महत्याओं का 64 फीसद इन पांच राज्यों में ही रहा। इस दौरान मध्य प्रदेश में किसानों की आत्महत्याएं बढ़ी हैं
राज्य -आत्महत्याएं (राष्ट्रीय क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार)
महाराष्ट्र- 3,337
आंध्र प्रदेश- 2,206
कर्नाटक -2,100
मध्य प्रदेश- 1,326
पश्चिम बंगाल- 807
उत्तर प्रदेश-645,
गुजरात में 578
हरियाणा- 384
बिहार- 83
हिमाचल प्रदेश-46
झारखंड- 94
पंजाब- 98
उत्तराखंड- 25
के नटराज द्वारा प्रस्तुत अध्ययन (2008) -फार्मर्ससुसाईड इन इंडिया,मैग्नीट्यूडस् ट्रेन्डस् एंड स्पैशियल पैटर्नस् में कहा गया है कि- http://www.macroscan.com/anl/mar08/pdf/Farmers_Suicides.pdf * किसानों की आत्महत्या की घटनाएं महाराष्ट्र,कर्नाटक,केरल,आंध्रप्रदेश,पंजाब और मध्यप्रदेश(इसमें छत्तीसगढ़ शामिल है) में हुईं।
* साल 1997 से लेकर 2006 तक यानी 10 साल की अवधि में भारत में 166304 किसानों ने आत्महत्या की। यदि हम अवधि को बढ़ाकर12साल का करते हैं यानी साल1995 से 2006के बीच की अवधि का आकलन करते हैं तो पता चलेगा कि इस अवधि में लगभग 2 लाख किसानों ने आत्महत्या की।
* आधिकारिक आंकड़ों के हिसाब से पिछले एक दशक में औसतन सोलह हजार किसानों ने हर साल आत्महत्या की। आंकड़ों के विश्लेषण से यह भी जाहिर होगा कि देश में आत्महत्या करने वाला हर सांतवां व्यक्ति किसान था।
* साल 1998में किसानों की आत्महत्या की संख्या में तेज बढ़ोत्तरी हुई। साल1997के मुकाबले साल 1998 में किसानों की आत्महत्या में14फीसदी का इजाफा हुआ और अगले तीन सालों यानी साल 2001तक हर साल लगभग सोलह हजार किसानों ने आत्महत्या की।
* साल2002 से2006के बीच यानी कुल पांच साल की अवधि पर नजर रखें तो पता चलेगा कि हर साल औसतन17513 किसानों ने आत्महत्या की और यह संख्या साल 2002 से पहले के पांच सालों में हुई किसान-आत्महत्या के सालाना औसत(15747) से बहुत ज्यादा है। साल 1997 से 2006 के बीच किसानों की आत्महत्या की दर (इसकी गणना प्रति एक लाख व्यक्ति में घटित आत्महत्या की संख्या को आधार मानकर होती है) में सालाना ढाई फीसद की चक्रवृद्धि बढ़ोत्तरी हुई।
* अमूमन देखने में आता है कि आत्महत्या करने वालों में पुरुषों की संख्या ज्यादा है और यही बात किसानों की आत्महत्या के मामले में भी लक्ष्य की जा सकती है लेकिन तब भी यह कहना अनुचित नहीं होगा कि किसानों की आत्महत्या की घटनाओं में पुरुषों की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा थी।देश में कुल आत्महत्या में पुरुषों की आत्महत्या का औसत 62फीसदी है जबकि किसानों की आत्महत्या की घटनाओं में पुरुषों की तादाद इससे ज्यादा रही।
* साल 2001में देश में किसानों की आत्महत्या की दर12.9फीसदी थी और यह संख्या सामान्य तौर पर होने वाली आत्महत्या की घटनाओं से बीस फीसदी ज्यादा है।साल 2001 में आम आत्महत्याओं की दर (प्रति लाख व्यक्ति में आत्महत्या की घटना की संख्या)10.6 फीसदी थी। आशंका के अनुरुप पुरुष किसानों के बीच आत्महत्या की दर 16.2फीसदी) महिला किसानों (6.2 फीसदी) की तुलना में लगभग ढाई गुना ज्यादा थी।
* साल2001 में किसानों की आत्महत्या की सकल दर15.8 रही।यह संख्या साल2001में आम आबादी में हुई आत्महत्या की दर से 50फीसदी ज्यादा है।पुरुष किसानों के लिए यह दर17.7 फीसदी रही यानी महिला किसानों की तुलना में75फीसदी ज्यादा।
डाक्टर ऋताम्भरा हैब्बर(सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीजस, स्कूल ऑव सोशल साईंसेज, टीआईआईएस) द्वारा प्रस्तुत ह्यूमन सिक्युरिटी एंड द केस ऑव फार्मर-ऐन एक्सपोलेरेशन(2007) नामक शोध आलेख के अनुसार-
http://humansecurityconf.polsci.chula.ac.th/Documents/Presentations/Ritambhara.pdf
* किसानों की आत्महत्या की घटना को मानवीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखने की जरुरत है। अगर इस कोण से देखा जाय तो पता चलेगा कि किसानों की आत्महत्या की घटनाएं ठीक उस वक्त हुईं हैं जब भारत के ग्रामीण अंचलों में आर्थिक और सामाजिक रुप से मददगार साबित होने वाली बुनियादी संरचनाएं ढह रही हैं। .
* हरित क्रांति, वैश्वीकरण और उदारीकरण की वजह से ढांचागत बदलाव आये हैं मगर अधिकारीगण किसानों की आत्महत्या की व्याख्या के क्रम में इन बदलावों की अनदेखी करते हैं। साधारण किसानों की आजीविका की सुरक्षा के लिए फौरी तौर पर उपाय किए जाने चाहिए थे लेकिन इस पहलू की उपेक्षा हुई। आत्महत्या की व्याख्या करने के क्रम में ज्यादा जोर मनोवैज्ञानिक कारणों पर दिया गया।
* मुख्यतया महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश के किसानों ने आत्महत्या की। इन राज्यों में ज्यादातर इलाकों में किसानी वर्षाजल से होने वाली सिंचाई पर निर्भर है। इन राज्यों(खासकर महाराष्ट्र) के आत्महत्या करने वाले किसान नकदी फसल मसलन, कपास (खासकर महाराष्ट्र), सूरजमुखी, मूंगफली और गन्ना (खासकर कर्नाटक) उगा रहे थे।
* उत्पादन की बढ़ी हुई लागत के कारण किसानों को निजी हाथों से भारी मात्रा में कर्ज लेना पड़ा।
* ऑल इंडिया बॉयोडायनेमिक एंड ऑर्गेनिक फार्मिंग एसोसिएशन ने महाराष्ट्र के एक जिले जालना के किसानों की आत्महत्या की खबर पर चिन्ता जताते हुए मुंबई हाईकोर्ट को एक पत्र लिखा। इस पत्र का संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑव सोशल साईंसेज को एक सर्वेक्षण करने को कहा। सर्वेक्षण के आधार पर कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से किसानों की आत्महत्या की घटना पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के लिए कहा। टाटा इंस्टीट्यूट ऑव सोशल साईंसेज की सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया था कि किसानों की आत्महत्या की मुख्य वजह उत्पादन लागत में हुई असह बढ़ोत्तरी और कर्जदारी है।दूसरी तरफ इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑव डेपलपमेंट रिसर्च (आईजीडीआर) के शोध में किसानों की आत्महत्या का संबंध सरकार या उसकी नीतियों से नहीं जोड़ा गया है। आईजीडीआर की शोध रपट में कहा गया है कि सरकार को ग्रामीण विकास योजनाओं के जरिये गांवों में ज्यादा हस्तेक्षेप करना चाहिए और वहां गैर खेतिहर कामों का विस्तार करना चाहिए।
* साल 2005 के दिसंबर में महाराष्ट्र की सरकार ने छह जिलों-अमरावती, अकोला, बुलडाना, यवतमाल, वासिम और वर्धा के लिए एक विशेष राहत पैकेज की घोषणा की। * कीटनाशक और उर्वरक बेचने वाली कंपनियों ने कर्नाटक और महाराष्ट्र में किसानों को कर्ज देना शुरु किया । इससे किसानों के ऊपर कर्जे का बोझ और बढ़ा। * सेहत की गिरती दशा, संपत्ति को लेकर परिवारिक विवाद, घरेलू समस्याएं और बेटी के ब्याह की भारी चिन्ता के मिले जुले प्रभावों के बीच किसान आत्महत्या करने को मजबूर हुए। यह बात जी के वीरेश की अध्यक्षता में बनी समिति की रिपोर्ट में कही गई है।
* जिन सालों में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं बढ़ीं उन सालों में किसान आंदोलन कमजोर पड़ गया था जबकि1980 के दशक में महाराष्ट्र में शेतकरी संगठन की अगुआई में किसान आंदोलन मजबूत था।
सीपी चंद्रशेखर और जयति घोष द्वारा प्रस्तुत आलेख बर्डेन ऑव फार्मरस् डेट नामक आलेख में कहा गया है-
http://www.macroscan.com/the/food/sep05/fod140905Farmers_Debt.htm
* किसानों के ऊपर कर्जदारी के बड़े कारणों में एक है शादी ब्याह के खर्चे की वजह से लिया जाने वाला कर्ज लेकिन किसानों द्वारा लिए गए कुल कर्ज में इस कारण से लिए कर्ज की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम(11फीसदी) है। शादी ब्याह के खर्चे की वजह से सबसे ज्यादा कर्जा बिहार के किसान परिवारों ने लिया। वहां 22.9फीसदी किसान परिवारों ने इस मद में कर्ज लिए। इसके तुरंत बाद नंबर राजस्थान का है जहां शादी ब्याह के खर्चे को पूरा करने के लिए17.6 फीसद किसान परिवारों ने कर्ज लिए।
* किसानों की एक बड़ी तादाद महाजनों से कर्ज लेने के लिए बाध्य हुई। कर्ज लेने वाले किसानों में 29फीसदी ने महाजनों से कर्ज लिया है। . * महाजनी कर्ज की सबसे ज्यादा तादाद बिहार(44 फीसदी) और राजस्थान(40 फीसदी) है। खेती के काम में जिन सामानों का प्रयोग होता है उन्हें बेचने वाले सौदागर या फिर वैसे सौदागर जो खेतिहर उत्पाद को खरीदते हैं-कर्ज के प्रमुख स्रोत बनके उभरे हैं। कर्जदार किसानों में 12फीसदी ने ऐसे ही सौदागरों से कर्ज लिए। बहरहाल कर्ज हासिल करने सरकारी स्रोत अब भी प्रमुख बने हुए हैं। कर्जदार किसानों में से50 फीसदी से अधिक ने सहकारी समितियों अथवा सरकारी बैंकों से कर्ज लिया। * लिए गए कर्ज की मात्रा का संबंध जमीन की मिल्कियत से भी है। जो किसान जितनी बड़ी जमीन का मालिक है उस पर उतना ही कर्ज है। एक तथ्य यह भी है कि जमीन की मिल्कियत के बढ़ने के साथ कर्जदार किसानों की संख्या में भी बढोतरी को भी चिह्नित किया जा सकता है।
* बहुत छोटे और सीमांत किसानों के ऊपर भी कर्ज का भारी बोझ है। ऐसे किसानों की आमदनी बहुत कम है और इससे संकेत मिलते हैं कि किसान एक से ज्यादा कारणों से लगातार कर्ज के दुष्चक्र में फंसते जा रहे हैं।
यूपीए सरकार ने किसानो के कर्जे को माफ कर दिया। सरकार अपनी इस पहल पर अपनी पीठ थपथपाते नही थक रही है। अब इस कर्ज माफी का किसानो को कितना फायदा हुआ ये तो बड़े किसानो को ही पता होगा क्योंकि छोटे किसान तो आज भी लाला/जमींदार के पैसे लेकर जी रहे है और अभी भी आत्महत्या कर रहे है। हरियाणा में एक आढतिया पूरे परिवार के साथ आत्महत्या कर ली है। बीस किसानों ने दो करोड़ देने से किया इंकार तो अढ़तिया (कमीशन एजेंट) ने पूरे परिवार समेत आत्महत्या कर ली। अब यूपीए सरकार के कर्जमाफी का ये नतीजा हुआ है कि महाजन भी आसानी से किसानों को उधार नहीं दे रहे।
विकसित देशों में किसानों को सब्सिडी देकर खेती को घाटे से बचाया जाता है, पर वही विकसित देश भारत में किसानों को थोडी बहुत दी जाने वाली सब्सिडी को भी कम करने का दबाव वैश्विक संस्थाओं के माध्यम से सरकार पर डलवाया जाता है. इसके अलावा बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा अपने मंहगे बीजों, कीटनाशकों, खरपतवारनाशी रसायनों के साथ नकदी फसलों के उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लोभ में किसान खेती की लागत बड़ा करते-करते कर्जदार होता जाता है. बिजली,पानी की उनुप्लब्धता के साथ जब मौसम दगा दे जाता है तो वह ठगा सा महसूस करता है. किस्मत से उपज अच्छी हो गई, तो भाव गिर जाते हैं. लहसुन कभी90 रूपये किलो होती है तो कभी तीन रुपये में कोई लेने वाला नहीं होता जिसे रोडी में डालना पड़ता है. यही हाल प्याज का लें जो कभी सरकार को ले डूबता है तो कभी दो रूपये किलो भी नहीं मिलते. जब गेहूं के भाव बढने लगते है तो सरकार महँगी दर पर गेहूं आयात कर सस्ते दर या आधी कीमत पर उपलब्ध करवाने से किसान को उसका मेहनताना नहीं मिलता. विदेशी किसानो को तो सरकार अधिक कीमत दे सकती है पर अपने किसानों को सहायता देना ठीक नहीं समझती.ऐसी स्थिति में बेचारे किसान के पास कर्ज की जिल्लत से बचने का क्या चारा रह जाता है. यह हताशा उसे आत्महत्या करने को विवश करती है. किसानों के असंगठित होने से उसकी आवाज में कोई दम नहीं है. उसका हर स्तर पर शोषण होता आया है. शहर के पास उसकी जमीनें सस्ती दर पर अधिग्रहित कर ली जाती है, गांवों में खेती की लागत नहीं निकलती है. सभी राजनैतिक दल वोट पाने की खातिर किसानों के भले की बात करटी है पर हर चुनाव में एक दूसरे पर लांछन लगाने या गैर जरूरी मुद्दों को उछाल कर किसानों की वास्तविक समस्याओं से उबरने की बात किसी ने नहीं की. जनता के गाढे पसीने की कमाई जो टैक्स के रूप में सरकार को देते हैं , उस पैसे को कोई राजनेतिक दल द्वारा किसी वर्ग विशेष को दो -तीन रूपये किलो गेहूं चावल देने व् मुफ्त में टेलीविज़न दिए जाने का अथवा वायदा करने का क्या अधिकार है? एक ओर केवल वोट के खातिर ईमानदार करदाता के पैसे से लोगों को अकर्मण्य बनाने को प्रोत्साहित किया जा रहा है तो दूसरी और देश को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाने वाले किसान के दर्द को समझने वाला कोई नहीं है. समय रहते इसओर नहीं ध्यान दिया गया तो अनाज के लिए वापस विदेशों के पास गिडगिडाना पड़ेगा.
बढ़ती लागत, घटती उपज, खाद-बीज का गहराता संकट, बिजली-पानी की समस्या
और उपज का वाजिब मूल्य न मिलने से किसानों की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं.
मध्यप्रदेश के होसंगाबाद में भैरोपुर के युवा किसान मिथलेश रघुवंशी के परिजनों के अनुसार मिथिलेश के खेत में लगे सिंचाई पंप का मोटर चार बार जल चुका था औऱ उसमें उसका काफी खर्च हो गया था. कुर्सीढाना में तो चार-पांच बार ट्रांसफार्मर जलने की खबर है.बिजली की वोल्टेज की समस्या के समाधान के रूप में निजी ट्रांसफार्मर का विकल्प पेश किया जा रहा है, कुछ संपन्न किसानों ने लगाए भी हैं. लेकिन छोटे और मध्यम श्रेणी के किसानों के वश में यह नहीं हैं. यह काफी खर्चीला है. कुल मिलाकर, इससे खेती में लागत बढ़ती जा रही है. बिजली की स्थिति सुधरने के बजाए और खराब होते जा रही हैं.मध्यप्रदेश में एशियाई विकास बैंक के कर्जे से चल रहे बिजली सुधारों की स्थिति सुधरी तो नहीं है, बिगड़ ही रही है. अनाप-शनाप बिजली के बिल और कुर्की की घटनाएं सामने आ रही हैं. ग्राम नांदना में ही एक किसान की मोटर साईकिल कुर्की वाले उठाकर ले गए जबकि कर्ज किसी दूसरे किसान का था. किसानों पर ज्यादतियां बढ़ रही है. बढ़ती लागत, घटती उपज, खाद-बीज का गहराता संकट, बिजली-पानी की समस्या और उपज का वाजिब मूल्य न मिलने से किसानों की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं. किसान विरोधी नीतियां और बेरहम बाजार के चक्रव्यूह में फंसे किसानों के पास अपनी जान देने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है. कर्ज माफी के वायदों के बावजूद किसान कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं. कर्ज वसूली, कुर्की की आशंका से परेशान हैं और आत्महत्या जैसे अतिवादी कदम उठाने पर मजबूर है. आत्महत्याएं तो कुछ किसानों ने ही की हैं लेकिन संकट में सब हैं. पिछले साल बनखेड़ी तहसील के भैरोपुर गांव में रहने वाले युवा किसान मिथलेश रघुवंशी ने जब अपने खेत में ट्यूबवेल लगवाया तो उन्हें उम्मीद थी कि पानी के साथ घर में खुशहाली आएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.पहले सोयाबीन की फसल बर्बाद हुई तो 6 एकड़ के किसान मिथलेश ने हौसला रखा और अपने खेत में गेहूं कि फसल लगाई. लेकिन गेहूं की फसल ने भी दगा दे दिया. आखिरकार 22 साल के मिथलेश ने सल्फास की गोली खा कर अपनी जान दे दी.

कैसे कटेगी जिंदगीः कुर्सीढाना में आत्महत्या करने वाले किसान अमान सिंह की पत्नी और बेटे
आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और विदर्भ के इलाकों से किसानों की आत्महत्या की खबरें लगातार आती रही हैं लेकिन अब मध्यप्रदेश में भी किसान खेती की विफलता के कारण आत्महत्या कर रहे हैं. राज्य में अब तक 8 किसानों की आत्महत्या की खबर आ चुकी है. लोकसभा चुनाव के दौरान आरोप-प्रत्यारोप तो हो रहे हैं लेकिन इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया जा रहा है कि आखिर किसान जान क्यों दे रहे हैं ?
होशंगाबाद जिले के पूर्वी छोर पर स्थित बनखेड़ी तहसील में 1 से 3 अप्रैल के बीच 3 किसानों ने आत्महत्या की कोशिश की, जिसमें दो किसानों की मौत हो गई. आत्महत्या की कोशिश करने वाले तीनों युवा थे और छोटे व मध्यम श्रेणी के किसान थे.बनखेड़ी तहसील के भैरोपुर गांव में 22 साल के मिथलेश रघुवंशी की खेत में केवल 21 क्विंटल उत्पादन हुआ था, जिससे वह निराश थे. अपनी मां के साथ रहने वाले मिथलेश ने शादी नहीं की थी. परिजनों के अनुसार मिथलेश ने अपने मृत्यु पूर्व बयान में गेहू का उत्पादन कम होना और कर्ज की चिंता में जान देने की बात कही है. उसके परिजन बताते हैं कि किसान क्रेडिट कार्ड बनवाने के लिए भी बार-बार चक्कर काटता रहा लेकिन अंततः उसे कामयाबी नहीं मिली.खेती के कारण आत्महत्या करने वालों में कुर्सीढाना के अमान सिंह का नाम भी शुमार है. 40 साल के अमान सिंह लगभग 3 एकड़ 60 डिस्मिल जमीन पर खेती कर रहे थे और अपनी गृहस्थी की गाड़ी चला रहे थे. बताते हैं कि उन्होंने बैंक से लगभग 50 हज़ार रुपये का कर्ज ले रखा था. इस साल उन्होंने अपनी छोटी बेटी सीता के हाथ पीले करने की योजना बनाई थी और उम्मीद की थी कि फसल से थोड़ी अच्छी कमाई हो जाएगी. लेकिन गेंहूं का उत्पादन कम हुआ तो रही सही हिम्मत जवाब दे गई और उन्होंने घर पर रखी कीटनाशक पी कर अपनी जान दे दी.पास के ही कस्बे बनखेड़ी में पढ़ रहे उनके दोनों बेटे 9 साल के संदीप और 6 साल के शिवम गर्मियों की छुट्टी में अपने घर आए थे. लेकिन अबकी छुट्टी उनके जीवन में एक ऐसा सूनापन भर गई, जिसे कभी नहीं भरा जा सकेगा. अमान सिंह की पत्नी सुनीता बाई और दोनों बेटियां लक्ष्मी व सीता के सामने अब पहाड़ जैसा जीवन है और खेती उनके सामने प्रश्नवाचक चिन्ह की तरह खड़ा है.
नांदना ग्राम के 35 साल के प्रेमनारायण ने आत्महत्या की कोशिश की लेकिन किसी तरह उन्हें बचा लिया गया. प्रेमनारायण की करीब 2 एकड़ जमीन है, जिसमें बमुश्किल 8 क्विंटल गेहूं निकल पाया. कटाई के लिए खेत पर गए किसान प्रेमनारायण ने अपनी फसल को देखकर वहीं रखी कीटनाशक की जहरीली दवा पीकर जान देने की कोशिश की. नांदना के सरपंच प्रणवीर पटेल व किसान नेता दयालाल कहते हैं- “ गेहूं की फसल का उत्पादन बहुत कम हुआ है और बिजली बिल की सख्त वसूली की आशंका से किसान परेशान हैं.”होशंगाबाद जिले की बनखेड़ी तहसील में बरसों पहले सिंचाई के लिए रिंग के कुओं का काफी फैलाव हुआ था. अब कुओं में पानी नहीं है, भूजल का स्तर नीचे चला गया है. अब ट्यूबवेल ही सिंचाई का साधन है. किसानों ने बड़ी संख्या में ट्यूबवेल खनन का काम करवाया है. एक अनुमान के अनुमान टयूबवेल खनन के लिए 10-15 मशीन यहां साल भर घूमती रहती हैं. सिंचाई के साथ यहां फसल चक्र भी बदला. नकदी फसलों का चलन बढ़ा. सोयाबीन की कमाई से किसानों के लड़के मोटर साईकिल दौड़ाने लगे. गन्ना बढ़ने लगा. लेकिन अन्तरराष्ट्रीय बाजार में दाम कम-ज्यादा होने का झटका किसान नहीं सह पाते. फिर मौसम की मार और बिजली का सवाल तो हमेशा सामने खड़ा रहता है.इस वर्ष कम बारिश और सूखा की स्थिति थी. ऊपर से बिजली कटौती ने किसानों की परेशानी और बढ़ा दी है और इलाके के किसान एक गहरे संकट के दौर से गुजर रहे हैं. एक ओर तो वे बिजली कटौती के कारण फसलों में पर्याप्त पानी नहीं दे पाते, वहीं दूसरी ओर कम-ज्यादा वोल्टेज के कारण सिंचाई के मोटर जलने से वे परेशान रहते है. किसानी पर खतरे बढ़ रहे हैं और सरकार आँखें मूंदे बैठी है, इसलिए किसानों को भी तमाम प्रक्रियाओ को समझने की जरूरत है.
भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवम सांसद श्री कलराज मिश्रा जी राज्य सभा मे विशेष उल्लेख के माध्यम से किसानो की आत्महत्या पर गम्भीर चिन्ता जताते हुए कहा था कि केन्द्र सरकार की किसान के प्रति उपेक्षात्मक नीतियो के कारण आज भी किसान आत्महत्या करने को विवश है . विदर्भ, उत्तर प्रदेश (बुन्देल्खन्द) मे आज भी किसान द्वारा कर्ज के बोझ तले होने के कारण आत्महत्या करने की घटनाये हो रही है, अकेले विदर्भ मे 2011 जनवरी से अब तक लगभग 700 किसानो ने आत्महत्या कर ली है तथा दर्ज़नो की संख्या मे बुन्देल्खन्द मे भी किसान आत्महत्या को मजबूर हुए है. इस मे सरकारी बैको के कर्ज़ के साथ साथ निजी साहूकारो का कर्ज़ और क्रेडिट कार्ड का कर्ज़ मुख्य कारण है क्रेडिट कार्ड के बारे मे सही जानकारी ना होने के कारण उसको कम ब्याज़ के बज़ाय ज्यादा ब्याज़ चुकाना पड रहा है, उत्तर प्रदेश के ललित्पुर ज़िले मे वर्ष 2010 जिले मे ही 2010मे163किसानो ने आत्महत्या कर ली और आज भी उत्तर प्रदेश मे 65% किसान साहुकारो से कर्ज़ लेने को मजबूर है तथा बैक भी बडे किसानो को ही कर्ज़ देने मे ज्यादा रुचि लेते है इस सम्बन्ध मे सारन्गी समिति ने भी कई सुझाव दिये है किन्तु उनपर अमल नही किया गया . ये सरकार के लिये चिन्ता का विषय होना चहीये कि जब विधर्भ के लिये अलग से इतना पॅकेज घोषित करने के बाद भी किसान आत्महत्या कर रहा है , तो आखिर इसका कारण क्या है ?उन्होंने कहा था कि कही न कही हमारी नीतियो का लाभ वास्तविक किसान तक नही पहुँच रहा है और ये चिन्तनीय है .इसलिए मैं सदन के माध्यम से सरकार से मांग करता हु कि किसानो के सम्बन्ध मे शीघ्र ही दीर्घकालीन नीतियां बनाये और उसका क्रियांन्वयन सुनिश्चित करे जिस से किसानो की आत्महत्या को रोका जा सके.
वहीं दूसरी ओर गुजरात भाजपा अध्यक्ष आरसी फलदू ने किसानों के आत्महत्या करने संबंधी सवाल के जवाब में कहा था कि यह तो नसीब की बात है। कोई किसान अपना खुद का व्यवसाय शुरू करे यह उसका नसीब और आत्महत्या करे तो उसका नसीब! हालाँकि उन्होंने यह भी कहा था कि मुख्यमंत्री ने सौराष्ट्र-कच्छ के हालात को ध्यान में रख कर नौ वरिष्ठ मंत्रियों की एक कमेटी गठित की है।
जारी है किसानों की आत्महत्या, नजरें अदालत पर
इलाहाबाद हाई कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद बैंक और वित्तीय संस्थान कर्ज में डूबे किसानों से वसूली के लिए सख्त रवैया अपना रहे हैं। कर्ज में डूबे किसान अपनी जमीन गवां देने के बाद आत्महत्या के लिए मजबूर हो रहे हैं। बैंक और वित्तीय संस्थानों के अलावा साहूकारों की दोगुना से ज्यादा ब्याज की मार किसानों पर अलग से पड रही है। सरकारी आंकडों के अनुसार सन 2010 में 583 किसानों ने आत्महत्या की। कारण उनका कर्ज अदा नहीं करना और अपनी जमीन गवां देना था। पिछले साल आत्महत्या का आंकडा छह सौ को पार कर गया। सन 2010 में बुदेलखंड के किसानों पर 3613 करोड़ रुपए के ऋण बकाया थे जो पिछले साल बढ कर 4370 करोड़ रुपए हो गए। किसानों के आत्महत्या की लगातार आ रही खबरों पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने संज्ञान लिया और बैंकों को वसूली के लिए सख्त कदम नहीं उठाने के आदेश दिए। आकलन के अनुसार बुंदेलखंड के किसान पचास हजार से आठ लाख रुपए के कर्जदार है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कर्ज में डूबे किसानों की आत्महत्या पर खुद संज्ञान लेकर कार्रवाई की और संभवत: अगले सप्ताह इस मामले की सुनवाई होगी। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को दिए आदेश में कहा कि वह कोई ऐसी नीति बनाए जिसमें कर्ज के कारण किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर नहीं होना पडे। राजनीतिक कारणों से ही सही केन्द्र सरकार ने बुंदेलखंड में विकास की कई योजनाएं चलाईं और विशेष पैकेज भी दिया। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में पार्टी की जमीन को मजबूत करने के लिए बुंदेलखंड को ही चुना और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से विशेष पैकेज की घोषणा के लिए जनसभा करने की भी गुजारिश की। सिंह ने जनसभा में पैकेज की घोषणा की। बुंदेलखंड बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती और राहल गांधी के बीच राजनीतिक द्वंद्व का अखाडा बन गया था। विधानसभा चुनाव के बाद सत्तारूढ़ हुई समाजवादी पार्टी ने भी अपने चुनावी घोषणा पत्र में किसानों का पचास हजार रुपए तक का कर्ज माफ करने का वायदा किया था। हालांकि इसे अभी अमली जामा नहीं पहनाया गया है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकार में बुंदेलखंड इलाके से कोई मंत्री नहीं है। सपा के झांसी से दो और बांदा तथा चित्रकूट से एक-एक विधायक जीत कर विधानसभा में पहुंचे हैं। कर्ज माफी के वायदे के अलावा किसानों की उम्मीद अब इलाहाबाद हाई कोर्ट पर भी टिकी है। बांदा के बबेरू प्रखंड के संतोष सिंह चार बीघा जमीन के मालिक थे। उन का कर्ज ब्याज बढने के साथ 80 हजार रुपए तक पहुंच गया था। उन्होंने तुलसी ग्रामीण बैंक से कर्ज लिया था। कर्ज अदा करने में असमर्थ 45 साल के संतोष ने पिछले मई में आत्महत्या कर ली। संतोष के परिवार में उनकी विधवा के अलावा पांच लडकियां हैं जिनके सामने अब भूखमरी की स्थिति है। संतोष का परिवार अब अपने पेट की आग बुझाने के लिए चार बीघा जमीन को बेचने की सोच रहा है। चित्रकूट के कर्वी प्रखंड के रसीन गांव के भानुमति के परिवार की हालत तो और खस्ता है। रसीन बांध बनाने के लिए उसकी बारह बीघा जमीन का अधिग्रहण कर लिया गया और उसे कोई मुआवजा नहीं दिया गया। हताश भानुमति के बेटे ब्रज मोहन ने आत्महत्या कर ली। भानुमति, ब्रज मोहन की विधवा और उसके एक साल के बेटे के सामने भी भुखमरी की हालत है। भानुमति ने पेट पालने के लिए अपनी डेढ़ बीघा जमीन गिरवीं रख बैंक से पचास हजार रुपए का कर्ज लिया था। दिलचस्प यह कि दोनों परिवार के सदस्यों को महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत जाब कार्ड भी मिले हैं लेकिन उन्हें काम नहीं दिया गया लिहाजा कोई भुगतान भी नहीं हुआ।
(लेखक गोपाल प्रसाद आर टी आई एक्टिविस्ट हैं)
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GOPAL PRASAD ( RTI Activist)


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