इस तरह दिल पे मुसल्लत है रिफाकात उसकी
सीमा गुप्ता
  
इस तरह दिल पे मुसल्लत है रिफाकात उसकी
बंद आँखों से भी करती हूँ ज़िआरत उसकी

वो तलबगार नहीं मेरा तो हरजाई सही
मैनें हर हाल में चाही थी मोहब्बत उसकी

दुश्मने जाँ है वो कहने को हमारा लेकिन
अच्छी लगती है हमें दिल से अदावत उसकी

क्या अजब बात है वो मुझको नहीं मिल पाया
फिर भी साँसों में महकती है हरारत उसकी

मैंने उस शख्स को पलकों पे बिठाया "सीमा "
कभी खुद से भी नहीं कि है शिकायत उसकी


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