एक कली सा खिला मेरा मन
सय्यद इक़बाल रिज़वी शारिब

गज़ल

एक कली सा खिला मेरा मन
आज खुशियों की मीठी चुभन

उसके आँसू , मेरे हैं नयन
इसको कहते हैं दीवानापन

इश्क में है अजब एक सुरूर
दिल को रखता है हरदम मगन

झूठ आसां नहीं बोलना
होती है आत्मा में घुटन

सब भला है , अगर तुम भले
तुम न रखना किसी से जलन

फूल, खुशबू, पवन, तितलियाँ
ये मिटाते हैं मेरी थकन

एक बच्चे की सादा हसीं
जैसे सूरज की पहली किरन

मेरी भाषा सरल, सुर मधुर
फिर ना क्यों मुझ में हो बाँकपन

हुस्न कुदरत का शाहकार है
हर हसीं शै को मेरा नमन

तुमको सोचा तो ऐसा लगा
हर तरफ है चमन ही चमन

तेरा शारिब जो मन साफ है
अच्छे लगते हैं तेरे कथन

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