कोई हमसफर अच्छा लगे...

रज़ा जलालपुरी

ज़ख्मे दिल अच्छा लगे तीरे नज़र अच्छा लगे
हो गयी अब उम्र कोई हमसफर अच्छा लगे
अपने होंटों पर सजा कर प्यार की सौग़ात को
कोइ हंस दे गर हमारे हाल पर अच्छा लगे
मैं सनम का नाम लेकर इस तरह रखूं क़दम
इश्क के बाज़ार में ज़ेरो ज़बर अच्छा लगे
जिसकी आँखों में सदा हो एह्तेमामे मैकशी
कोई हो ऐसा सनम जो उम्र भर अच्छा लगे
इस तरह कि बे सरो सामानियों के बावजूद
कोई आये मेरे घर और मेरा घर अच्छा लगे
जिस्म से आती हों जिसके बस वफ़ा की खुशबुएँ
मैं करूं उससे मोहब्बत टूटकर अच्छा लगे
जिसकी चाहत पर ज़माने में कोई पहरा न हो
मैं फिरूं उसकी गली में दर बदर अच्छा लगे
तजकेरा जिसकी ज़बाँ पे हर नफ़स मेरा ही हो
हमक़दम भी हो तो कितना हमसफर अच्छा लगे
मीर के मानिंद कोई हो नही सकता मगर
या खुदा दुनिया को मेरा भी हुनर अच्छा लगे
जिसकी पलकों पर सितारों की सजी हो अंजुमन
जगमगाए जो सदा मिस्ले कमर अच्छा लगे
नफरतों की सरहदों को बस मिटा कर ऐ " रज़ा "
हम लगायें प्यार का अब एक शजर अच्छा लगे
तालिबे दुआ रज़ा जलालपुरी

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