स्‍वदेशी तहरीक
त्रिलोकचन्‍द महरूम
  
वतन के दर्दे-निहां की दवा स्‍वदेशी है
ग़रीब क़ौम की हाजत रवा स्‍वदेशी है

तमाम दहर1 की रूहे-रवां2 है यह तहरीक3
शरीके हुस्‍ने-अमल4 जा ब जा स्‍वदेशी है

क़रारे-ख़ातिरे-आशुफ़्ता5 है फ़ज़ा इसकी
निशाने-मंजिले, सिदक़ो-सफ़ा6 स्‍वदेशी है

वतन से जिनको महब्‍बत नहीं वह क्‍या जानें
कि चीज कौन विदेशी है क्‍या स्‍वदेशी है

इसी के साये में पाता है परवरिश इक़बाल
मिसाले-साय:-ए-बाले-हुमा स्‍वदेशी है

इसी ने ख़ाक को सोना बना दिया अक्‍सर
जहां में गर है कोई कीमिया स्‍वदेशी है

फ़ना के हाथ में है जाने-नातवाने-वतन
बक़ा जो चाहो तो राज़े-बक़ा स्‍वदेशी है

हो अपने मुल्‍क की चीज़ों से क्‍यों हमें नफ़रत
हर एक क़ौम का जब मुद्दआ स्‍वदेशी है


 आज़ादी
त्रिलोकचन्‍द महरूम

फ़ज़ा की आबरू है परचमे-गर्दूं वक़ार अपना
कि है इस दौर की आज़ाद क़ौमों में शुमार अपना

ग़ुलामी और नाकामी का दौरे इब्तिला गुज़रा
मुसाइद बख़्त है अब और हामी रोज़गार अपना

छुटे दामन से अपने दाग़ हाए-नंगे-महक़ूमी
वतन अपना है, अपनी सल्‍तनत है, इक़्तिदार अपना

न गुलचीं ग़ैर है कोई न है सैयाद का खटका
चमन अपना है, अपने बाग़बां, लुत्‍फ़े-बहार अपना

अब अय अहले-वतन! इसको बिगाड़ें या बनायें हम
मुक़द्दर पर है अपने हमको हासिल इख़्तियार अपना


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