प्रो. मुज़फ़्फ़र हनफ़ी की ग़ज़लें
प्रो. मुज़फ़्फ़र हनफ़ी की ग़ज़लें
(मिज़गान न्यूज़ नेट) 5:11pm Nov 2015

1
आग बुझने लगी है दरिया पार
दर्द कर देगा आज बेड़ा पार

इश्क़ में मर के जी गये हम तो
मौत से वर्ना किसने पाया पार

यही नक़्शा है उस तरफ़ यारो
अपनी सरहद कभी न करना पार

तू भी आराइशों से दुनिया की
फेर ले आँख और हो जा पार

अपने ही ख़ून में नहा लिये हम
आग का दरिया कौन करता पार

उससे मिलकर निजात पाना है
यार बसता है मेरा गंगा पार

2
लाज़िम है जीने को साँस
आरे जैसी खींचो साँस

रोज़े-हिसाब सर-आँखों पर
लेकिन गिनकर मत लो साँस

देखो टूट न जाए डोर
दिल से मत उलझाओ साँस

निपटा देंगे आँधी को
क़ाबू में आये तो साँस

आँसू भी नायाब हुए
अब कैसे ठंडी हो साँस

मंज़िल भी सर कर लेंगे
हमसफ़रो लेने दो साँस
3
मैं कि महवे-ख़्वाब था
शहर में सैलाब था

हम भी चलते ही रहे
हमसफ़र महताब था

नाव में सुराख़ थे
सामने गर्दाब था

सतह पर बहते चिराग़
फूल ज़ेरे आब था

हम कहाँ थे दस्ते आब
तू अगर कमयाब था

मेरी ख़ामोशी के गिर्द
नर्ग़ा-ए-अहबाब था

4
बहाना वफ़ा का निकाला गया
बहुत ख़ून मेरा निकाला गया

शरारे उछलते रहे संग से
चट्टानों से दरिया निकाला गया

मेरा ज़ख़्म बढ़ जाएगा और कुछ
अगर अब ये नेज़ा निकाला गया

मोहब्बत से वो बाज़ आये नहीं
तो बस्ती से कुनबा निकाला गया

टपकती थी दुनिया मेरे पाँव में
बमुश्किल ये छाला निकाला गया

5
तक़ाज़ा है क़ज़ा का सिक्क-ए-हस्ती भुना लेंगे
बहुत होनी को भुगता, अब न होने का मज़ा लेंगे

उठाओगे अगर तलवार सीना तान लेंगे हम
जफ़ा से हाथ उठाओगे तो सर अपना झुका लेंगे

हमारी शायरी का सच उन्हें अच्छा नहीं लगता
ज़ियादा से ज़ियादा जान लेंगे और क्या लेंगे

किनारे आके लंगर डालने से कुछ नहीं होगा
न मानेगा तो हम गर्दाब कश्ती में उठा लेंगे

कभी उनकी जवानी भी तो बेक़ाबू हुई होगी
बग़ावत करने से पहले बुज़ुर्गों की दुआ लेंगे

मुज़फ़्फ़र जाने क्यों जाती रही मिट्टी से वो ख़ुशबू
चलो अट्ठासवीं मंज़िल पे चलते हैं, हवा लेंगे

6
है मेरे सर पे ताज काँटों का
और दुश्मन समाज काँटों का

आज हम ऐश करने वाले हैं
फ़स्ले-गुल है ख़ेराज काँटों का

आबले पाँव में टपकते हैं
पूछना है मिज़ाज काँटों का

पाँव फूलों के दाबते हैं सब
कोई करता इलाज काँटों का

आगे सब कुछ ख़िज़ाँ के हाथ में है
मुल्क फूलों का राज काँटों का

ऐ मुज़फ़्फ़र ग़ज़ल कहो तुम भी
बोलबाला है आज काँटों का

7
सूखी आँखों का पानी है दिले-दरिया में
तुग़ियानी-सी तुग़ियानी है दिले-दरिया में

रंग छिड़कते रहते हैं अपने शेरों पर
हमने क़ौस-ए-क़ज़ा तानी है दिले-दरिया में

उलटे झरने-सा आँखों में चढ़ जाता है
अब तक इतनी जुलानी है दिले-दरिया में

यार मिला तो हाजी पीर से मिलवाएँगे
हमने ये मिन्नत मानी है दिले-दरिया में

रक्सा-मौजें नाव थिरकती चमचम पानी
आज मेरा दिलवर जानी है दिले-दरिया में

कल तो सबको बहरे-फ़ना में ख़त्म होना है
बस इक दिन की सुल्तानी है दिले-दरिया में

आज मुज़फ़्फ़र हर आँसू में सुर्ख़ी क्यों है
प्यारे दिल की क़ुर्बानी है दिले-दरिया में

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