स्वास्थ्य सेवाओं की बिगड़ती सेहत
मज़हरहसनैन ,जेएनयू नई दिल्ली
किसी ने सच ही कहा है कि स्वास्थ्य ही धन है। सचमुच बगैर अच्छे स्वास्थ्य के कुछ भी ीक नहीं लगता। मानव को संसाधन बनाने में सबसे बेहतरीन स्वास्थ्य का होना अनिवार्य है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अंतर्राष्ट्रीय संग न तथा भारत में केन्द्र एवं राज्य सरकारें लोगों को शानदार स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने हेतु कई कल्याणकारी योजनाएं चलाती हैं। यद्यपि यह संविधान में वर्णित है कि मानव के कल्याण हेतु सरकार को उपाय करने चाहिए तथापि भारत में स्वास्थ्य सेवाएं लगातार बद से बदतर होती जा रही हैं। देश में प्रति व्यक्ति के स्वास्थ्य के हिसाब से न डॉक्टर उपलब्ध हैं और न दवाएं। पंचायत एवं प्रखंड स्तर पर स्वास्थ्य सेवाएं काफी बदतर स्थिति में हैं। जिले में मेडिकल सरकारी सेवाओं का खस्ता हाल है। रोगी के लिए न बिस्तर की व्यवस्था है और न ही सफाई का ख्याल रखा जाता है। कई राज्यों के सरकारी अस्पतालों में रोगी को जो मुप्त दवाएं या अन्य फल व वस्तुं उपलब्ध करानी होती हैं, उसे अस्पताल प्रशासन निगल जाता है। सरकारी अस्पताल में अस्पताल कर्मियों तथा जूनियर डॉक्टरों द्वारा आम जनता के साथ बेहतर व्यवहार नहीं किया जाता, इलाज करना तो दूर की बात रही। ऐसा नहीं है कि सारे अस्पताल का प्रशासन तथा डॉक्टर इस तरह के हैं किन्तु प्राय तमाम जगहों पर ऐसी स्थिति है जिससे गरीब, बीमार तथा अशिक्षित जनता जानकारी के अभाव में निजी क्लीनिकों द्वारा लूटे जाते हैं। उदाहरण हेतु बिहार में दरभंगा शहर में प्राय निजी क्लीनिक के दलालों के द्वारा सुदूर ग्रामीणों क्षेत्रों के रोगी लूटे जाते हैं। उनके साथ न केवल दुर्व्यवहार होता है बल्कि इलाज का बेहद खराब इंतजाम रहता है। ग्रामीण लोग अपने परिजनों के इलाज के लिये जमीन-जायदाद गिरवीं रख देते हैं अथवा बेच देते हैं। इसके बावजूद निजी क्लीनिकों का खर्च उन्हें इलाज से महरूम कर देता है। कमोबेश पूरे बिहार में यही स्थिति है। दरअसल दरभंगा में सरकारी अस्पताल की दुर्दशा तथा दुर्व्यवहार से लोग निजी क्लीनिकों की तरफ रूख करने लगे हैं। केवल दरभंगा में ही नहीं, बिहार के कई जिले इसी स्थिति के शिकार हैं। इसके अलावा अनावश्यक मुद्दों को लेकर अस्पताल प्रशासन या डॉक्टरों द्वारा हड़ताल पर जाना आम बात है। इससे गरीब एवं बीमार जनता का सबसे बुरा हाल होता है। बिहार के अलावा भारत के अन्य राज्यों में भी डॉक्टरों का हड़ताल पर जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। अप्रैल के मध्य में मुंबई में रेजीडेंसी डॉक्टरों का हड़ताल पर जाना तथा अस्पताल प्रशासन द्वारा कई डॉक्टरों का निलंबन खराब स्वास्थ्य सेवाओं की कहानी सुनाता है। यद्यपि डॉक्टरों की मांग थी कि पोस्ट ग्रेजुएशन सीटों की संख्या नहीं घटानी चाहिए वरना गरीब का बच्चा डॉक्टर नहीं बन पाएगा तथा आम गरीब जनता निजी क्लीनिकों द्वारा लूटी जाएगी। इसके विपरीत सीटों की संख्या घटा दी गयी जिससे हड़ताल हुई। हाल में आंध्र प्रदेश में विधायकों के कथित दुर्व्यवहार के कारण डॉक्टर हड़ताल पर चले गये। सबसे बड़ा राष्ट्रीय स्तर का विवाद दिल्ली के एम्स के डॉ. वेणुगोपाल तथा स्वास्थ्य मंत्री डॉ. अम्बुमणि रामदौस के बीच लंबे समय से चला। इससे कई बार स्वास्थ्य सेवाएं बाधित हुईं। परंतु यह अत्यंत ही खेदजनक है कि अपने अहं या मांग को लेकर संवेदनशील चिकित्सक रोगी को मरते हुये छोड़ कर अस्पताल में हड़ताल करें। यह तो सामान्य बीमार जनता को मौत में धकेलना हुआ। यदि चिकित्सकों को कोई प्रशासनिक या अन्य दिक्कतें हैं तो उन्हें शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाना चाहिए। परंतु अपने कार्य को छोड़ कर हड़ताल करने से सबसे ज्यादा फर्क गरीब रोगी पर पड़ता है। अमीर लोग तो निजी क्लीनिकों में चले जायेंगे परंतु गरीब रोगी को इलाज के अभाव में मरना होगा जो स्पष्टत मानवाधिकारों का उल्लंघन है। डॉक्टरी पेशे के साथ अन्याय है। बेशक डॉक्टरों को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। और यह भी सच है कि बगैर हड़ताल, जुलूस एवं प्रदर्शन के मुखर रूप से बात नहीं सुनी जाती तथापि डॉक्टरों को मानवता की सेवा को ध्यान में रख कर रोगी के प्रति दया रखनी चाहिए। संवेदनशीलता का ईश्वरीय गुण नहीं छोड़ना चाहिए। प्रोफेशनल होना अच्छी बात है परंतु मानवीय एवं संवेदनशील होना इससे महान गुण है। अंतत सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ती जनसंख्या का कोप भी झेलना पड़ता है तथापि संचार के माध्यम से स्वास्थ्य की जानकारी देने के साथ सरकारी अस्पतालों में सुधार की पर्याप्त गुंजाइश है। वैज्ञानिक शोध के द्वारा सस्ती एवं उपयोगी दवाओं का निर्माण भी बेहतर स्वास्थ्य के लिए शानदार रहेगा।

 स्वास्थ्य के आयाम तथा स्वस्थ रहने की आवश्यकताए
मासूम ज़हरा
,जेएनयू नई दिल्ली
स्वास्थ्य हमारे शरीर, मन, मस्तिष्क, समाज और आध्यात्म से भी जुरा हुआ है, सो हमें स्वास्थय के सभी आयामों के प्रति सचेत रहना चाहिए|
स्वास्थ्य मानव जीवन का मूल आधार है। स्वस्थ शरीर मे ही स्वस्थ मन का भी निवास हो सकता है। इसलिये स्वास्थ्य की परिभाषा स्पष्ट होनी चाहिये। प्रायः यह कहा जाता है कि वह व्यक्ति स्वस्थ है जो किसी प्रकार कि बीमारी से मुक्त है। लेकिन वास्तविक रूप से यह सही नही है, क्योंकि स्वास्थ्य शब्द का क्षेत्र काफ़ी विस्तृत है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने १९४८ मे स्वास्थ्य की परिभाषा को स्पष्ट करते हुए लिखा है " Health is a state of complete physical, mental and social well being and not merely an absence of disease or an infirmity. " इस प्रकार विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्वास्थ्य के जिन तीन आयामों कि ओर ध्यान आकृष्ट किया है उसमे पहला भौतिक स्वास्थ्य, दूसरा मानसिक स्वास्थ्य और तीसरा सामाजिक स्वास्थ्य है। इसके अतिरिक्त चौथे स्वास्थ्य के रूप मे आध्यत्मिक स्वास्थ्य कि भी चर्चा कि जा सकती है। हम लोग मूलतः स्वास्थ्य का तात्पर्य शारिरीक स्वास्थ्य या भौतिक स्वास्थ्य ही मानते है जिसका निर्धारण विभिन्न प्रकार की जॉंच के द्वारा तय कि जाती है अर्थात कोई व्यक्ति कितना स्वस्थ है इस बात की जॉंच उसके शरीर मे पाये जाने वाले विभिन्न बीमारियों या उनके वाहकों कि जॉंच करके बतायी जाती है और इसके बाद उससे बचने के उपाय और नुस्खों के पालन कि बात आती है। लेकिन मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य के निर्धारण का कोई मानदण्द नही तय किया गया है। उसी प्रकार आध्यात्मिक स्वास्थ्य कि चर्चा भी प्रायः बिरले लोग ही करते हैं। इसका मुख्य कारण क्या है इस पर कभी भी सम्मिलित रूप से चर्चा करना मुनासिब नही समझा गया है और सरकार के साथ साथ ही सामाजिक बुद्धिजीवि वर्गों ने भी इसपर विषद चर्चा नही कि है। संक्षेप में यहाँ पर स्वास्थ्य के विभिन्न आयामों पर चर्चा की जा सकती है। तो सबसे पहले भौतिक या शारिरीक स्वास्थ्य के बारे मे ही चर्चा की जाये। आज पूरी दुनिया के सभी देश अपने नागरिकों के स्वास्थ्य के प्रति सजग हैं और हर संभव सहायता उपलब्ध करा कर स्वास्थ्य के प्रति जवाबदेह रहने के लिये प्रेरित करते रहते हैं। लेकिन विकसित देशों को छोड़ दिया जाए विकासशील देशों मे स्वास्थ्य आज भी एक समस्या बनी हुई है। कुपोषण, आभाव, अशिक्षा, अग्य़ानता, सम्पत्ति का असमान वितरण इत्यादि इसके मुख्य कारण हो सकते हैं। सरकार द्वारा उपलब्ध कराये गये गरीब लोगों को नही मिलकर भ्रष्टाचारियों और दलालों के बीच बट जाते हैं। और लोगों का कल्याण बीच मे ही रह जाता है। यही कारण है कि आज भी भारत कि आधी आबादी के लिये स्वास्थ्य सुविधा आकश-कुसुम है। स्वास्थ्य के क्षेत्र मे सुधार के लिये इन सुविधाओं को जनता तक पहुँचाना अत्यंत ही अनिवार्य है। मानसिक स्वास्थ्य की चर्चा हम इस प्रकार भी कर सकते हैं कि हमारे देश के अधिकांश लोगों का मानसिक स्तर अभी भी उँचा नही है, नही तो गरीबों का निवाला कैसे भ्रष्टाचारियों और अफ़सरशाहों द्वारा पचा लिया जाता है। चन्द रुपयों के लिये कैसे कोई अपने मुल्क के गोपनीय तथ्य दूसरे देशों को बेच देता है और देश के विकास के लिया आवंटित राशी कैसे नेताओं और अफ़सरों की जेबों मे चला जाता है। क्या यही कारण नही है कि हमारे देश मे अमीर और अमीर और गरीब और गरीब होता जा रहा है। यही हमारे प्रबुद्ध वर्ग के लोगों के मानसिक स्वास्थ्य कि गिरावट की पहचान है। हमारे मानसिक स्वास्थ्य की दशा को सुधारने के लिये हमे स्वयं सजग रहना पड़ेगा और दूसरों की भी गिरती हुई मानसिकता को सहारा देना होगा। जहाँ तक सामाजिक स्वास्थ्य का सवाल है तो इसकी कमी प्रायः हमारे यहाँ नही है। कुछ समस्याओं को छोड़ कर यहाँ सभी धर्म, जाति, समुदाय, पंथ के लोग एक साथ सदियों से रह रहे हैं। ईक्के-दुक्के अपवादों को छोड़ कर हमारा समाजिक स्वास्थ्य समरस और बेमिसाल माना जा सकता है। इसमें हमारे पूर्वजों द्वारा दिया गया आध्यात्मिक ग्यान, धार्मिक ऊपदेशों और हमारी एकता ही इसे सुस्पष्ट बनाती है। अतः हमारा आध्यात्मिक स्वास्थ्य भी अपेक्षाकृत सही है। हमे आवश्यकता है हमारे समाज के भौतिक स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य को सुधरने की, क्योंकि जबतक हम स्वास्थ्य के इन सभी आयामों पर खड़े नही उतरते तब तक स्वस्थ समाज की कल्पना को असंभव माना जाए।

 परिवार नियोजन की जिम्मेदारी अब पुरुषों पर
मासूम ज़हरा
,जेएनयू नई दिल्ली
अब तक परिवार को छोटा रखने की जिम्मेदारी एक तरह से सिर्फ महिलाओं के कंधों पर ही थी। इसका कारण था गर्भनिरोधक गोलियां। परिवार नियोजन के लिए आजमाए जाने वाले तरीकों में गर्भनिरोधक गोलियां का इस्तेमाल सबसे ज्यादा होता है। शायद इसका कारण ये है कि गोलियां लेना सबसे आसान और सरल तरीका है। अब तक महिलाएं परिवार की इस जिम्मेदारी को बड़े ही एकतरफा ढंग से उठाती चली आ रहीं थीं। लेकिन अब समय आ गया है कि पुरुष भी इस जिम्मेदारी को साझा करें। अब पुरुषों के पास इस जिम्मेदारी से बचने के लिए कोई बहाना नहीं रह गया है। क्योंकि वैज्ञानिकों ने अब एक ऐसा इंजेक्शन खोज लिया है जो पुरुषों के लिए गर्भनिरोधक गोलियों जितना ही कारगर है। इस इंजेक्शन के एक महीने में दो डोज लेने के बाद इसके रसायन पुरुष के दिमाग को शुक्राणु उत्पादन रोकने का आदेश देने लगते हैं। इस इंजेक्शन का लगभग 80 जोड़ों पर सर्वे किया जा रहा है। महिलाएं इस इंजेक्शन को लेकर खासी उत्साहित हैं। इस इंजेक्शन के लगभग उतने ही साइड एफेक्ट्स सामने आ रहे हैं जो आमतौर पर महिलाओं को गर्भनिरोधक गोलियां लेने पर फेस करने पड़ते हैं। वैज्ञानिकों का दावा है कि अभी तक प्राप्त परिणामों के मुताबिक यह इंजेक्शन ९९ फीसदी प्रभावी है। तो अब कंडोम इस्तेमाल किए बगैर पुरुष परिवार नियोजन में अपनी जीवन संगिनी का पूरा ध्यान बंटा सकते हैं। टीनेजर्स के अंदर अपनी यौन इच्‍छाओं को पूरा करने की ललक हमेशा से ज्‍यादा रही है। जीवन का यह दौर ऐसा होता है, जिसमें बच्‍चे बिना सोचे समझे कई ऐसे काम कर जाते हैं, जिनके परिणाम काफी खतरनाक हो सकते हैं। इन्‍हीं में से एक है असुरक्षित यौन संबंध स्‍थापित करना। जी हां एक शोध में यह पाया गया है कि ज्‍यादातर टीनेजर्स सेक्‍स करते वक्‍त कंडोम का प्रयोग नहीं करते। वो सोचते हैं कंडोम से सेक्‍स का अनुभव फीका पड़ जाता है। जबकि ऐसा करने से वो अनचाहे गर्भधारण, एड्स और यौन संचारित रोगों को दावत देते हैं। अभी तक यौन संचारित रोगों का मुख्‍य कारण अज्ञानता ही बताया जाता था, लेकिन एक अध्‍ययन में यह पता चला है कि युवाओं में सेक्‍स के बेहतर अनुभव की ललक भी ऐसे रोगों को दावत दे रही है।ब्रेडली हैस्‍ब्रो चिल्‍ड्रेन रिसर्च सेंटर ने तीन अन्‍य संस्‍थानों के साथ मिलकर हाल ही में 15 से 21 वर्ष की आयु के बच्‍चों पर एक अध्‍ययन किया। इस अध्‍ययन में 1400 ऐसे बच्‍चे शामिल किए गए, जिन्‍होंने बीते तीन महीनों में असुरक्षित यौन संबंध स्‍थापित किए थे।अध्‍ययन में पाया गया कि टीनेजर्स जो कंडोम का इस्‍तेमाल नहीं करते हैं, उनके मन में यह धारणा है कि कंडोम से यौन सुख फीका पड़ जाता है। कई ऐसे भी टीनेजर्स थे, जिनके पास कंडोम था, लेकिन उनके पार्टनर ने उसके इस्‍तेमाल से इंकार कर दिया। टीनेजर्स पर किए गए इस अध्‍ययन ने खतरे की घंटी जरूर बजा दी है। वो इसलिए क्‍योंकि दुनिया भर में फैल रहे यौन संचारित रोगों व एड्स के बढ़ने का खतरा और अधिक हो गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि टीनेजर्स को ज्‍यादा से ज्‍यादा जागरूक करने की जरूरत है। हालांकि विशेषज्ञों ने इस बात से इंकार नहीं किया है कि गर्भनिरोधक गोलियों के बढ़ते चलन के कारण कंडोम का इस्‍तेमाल घटा है। आज टीनेजर्स का विश्‍वास गर्भनिरोधक गोलियो पर ज्‍यादा हो गया है, लेकिन वे ये नहीं जानते कि असुरक्षित यौन संबंध उनके जीवन को बर्बाद कर सकता है।

 परिवार नियोजन की विधियों की जानकारी
मासूम ज़हरा
,जेएनयू नई दिल्ली
परिवार नियोजन की विधियों की जानकारी भारत में सार्वभौम है, 99 प्रतिशत से अधिक महिलाएं किसी न किसी एक विधि की जानकारी रखती हैं। तथापि सभी आधुनिक विधियों की जानकारी केवल 49 प्रतिशत को ही प्राप्त है। सभी आधुनिक विधियों (नसबंदी और नलबंदी, आई यू डी, खाने वाली गोली और कण्डोम) की जानकारी रखने वाली महिलाओं का अनुपात राज्य वार अलग-अलग है - यह अनुपात मेघालय में 2 प्रतिशत से लेगर हिमाचल प्रदेश में 80 प्रतिशत तक है। डी. एल. एच. एस. (2003-04) के अनुसार इस समय भारत में 15-44 वर्ष की आयु वाली विवाहित महिलाओं में से लगभग 53 प्रतिशत महिलाएं परिवार नियोजन की किसी न किसी एक विधि का प्रयोग करती है परन्तु उनमें से अधिकांश महिलाएं (35 प्रतिशत) परिवार नियोजन की स्थायी विधि अपना चुकी है। सर्वेक्षण से प्राप्त निष्कर्षों से यह पता चलता है कि कुछ क्षेत्रों में परिवार नियोजन संबंधी ऐसी आवश्यकताएं अभी भी काफी शेष हैं जिन्हें अभी पूरा करना है। गर्भनिरोधक की प्रचलित दर के जरिए जिलों के श्रेणीकरण और मानचित्रण से उन जिलों में अत्यधिक प्रभावी ढंग से कार्यक्रम पर ध्यान केन्द्रित करने में सहायता मिलती है जिन जिलों में गर्भनिरोधक का प्रचलन बहुत कम है। जिलों के श्रेणीकरण और मानचित्रण (सामाजिक-आर्थिक विकास सूचकों पर आधारित) के अनुसार दंपत्ती संरक्षण दर तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय एवं राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग के लिए अंतर्राष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान द्वारा किए गए अध्ययन से यह पता चलता है कि श्रेणी में नीचे से 100 जिले अरूणाचल प्रदेश, बिहार (राज्य के 37 जिलों में से 29 जिलों), उत्तर प्रदेश और उ.पू. राज्यों से संबंध रखते हैं ।

 विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सन 1948 में स्वास्थ्य या आरोग्य
मासूम ज़हरा
,जेएनयू नई दिल्ली
दैहिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होना (समस्या-विहीन होना) आयुर्वेद के अनुसार स्वास्थ्य की परिभाषा
स्वास्थ्य की आयुर्वेद सम्मत अवधारणा बहुत व्यापक है। आयुर्वेद में स्वास्थ्य की अवस्था को प्रकृति (प्रकृति अथवा मानवीय गठन में प्राकृतिक सामंजस्य) और अस्वास्थ्य या रोग की अवस्था को विकृति (प्राकृतिक सामंजस्य से बिगाड़) कहा जाता है। चिकित्सक का कार्य रोगात्मक चक्र में हस्तक्षेप करके प्राकृतिक सन्तुलन को कायम करना और उचित आहार और औषधि की सहायता से स्वास्थ्य प्रक्रिया को दुबारा शुरू करना है। औषधि का कार्य खोए हुए सन्तुलन को फिर से प्राप्त करने के लिए प्रकृति की सहायता करना है। आयुर्वेदिक मनीषियों के अनुसार उपचार स्वयं प्रकृति से प्रभावित होता है, चिकित्सक और औषधि इस प्रक्रिया में सहायता-भर करते हैं। स्वास्थ्य के नियम आधारभूत ब्रह्मांडीय एकता पर निर्भर है। ब्रह्मांड एक सक्रिय इकाई है, जहाँ प्रत्येक वस्तु निरन्तर परिवर्तित होती रहती है; कुछ भी अकारण और अकस्मात् नहीं होता, और प्रत्येक कार्य का प्रयोजन और उद्देश्य हुआ करता है। स्वास्थ्य को व्यक्ति के स्व और उसके परिवेश से तालमेल के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। विकृति या रोग होने का कारण व्यक्ति के स्व का ब्रह्मांड के नियमों से ताल-मेल न होना है। आयुर्वेद का कर्तव्य है, देह का प्राकृतिक सन्तुलन बनाए रखना और शेष विश्व से उसका ताल-मेल बनाना। रोग की अवस्था में, इसका कर्तव्य उपतन्त्रों के विकास को रोकने के लिए शीघ्र हस्तक्षेप करना और देह के सन्तुलन को पुन: संचित करना है। प्रारम्भिक अवस्था में रोग सम्बन्धी तत्त्व अस्थायी होते हैं और साधारण अभ्यास से प्राकृतिक सन्तुलन को फिर से कायम किया जा सकता है।
यह सम्भव है कि आप स्वयं को स्वस्थ समझते हों, क्योंकि आपका शारीरिक रचनातन्त्र ठीक ढंग से कार्य करता है, फिर भी आप विकृति की अवस्था में हो सकते हैं अगर आप असन्तुष्ट हों, शीघ्र क्रोधित हो जाते हों, चिड़चिड़ापन या बेचैनी महसूस करते हों, गहरी नींद न ले पाते हों, आसानी से फारिग न हो पाते हों, उबासियाँ बहुत आती हों, या लगातार हिचकियाँ आती हो, इत्यादि। स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में पंच महाभूत, आयु, बल एवं प्रकृति के अनुसार योग्य मात्रा में रहते हैं। इससे पाचन क्रिया ठीक प्रकार से कार्य करती है। आहार का पाचन होता है और रस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र इन सातों धातुओं का निर्माण ठीक प्रकार से होता है। इससे मल, मूत्र और स्वेद का निर्हरण भी ठीक प्रकार से होता है।
स्वास्थ्य की रक्षा करने के उपाय बताते हुए आयुर्वेद कहता है- त्रय उपस्तम्भा: आहार: स्वप्नो ब्रह्मचर्यमिति (चरक संहिता सूत्र. 11/35) अर्थात् शरीर और स्वास्थ्य को स्थिर, सुदृढ़ और उत्तम बनाये रखने के लिए आहार, स्वप्न (निद्रा) और ब्रह्मचर्य - ये तीन उपस्तम्भ हैं। ‘उप’ यानी सहायक और ‘स्तम्भ’ यानी खम्भा। इन तीनों उप स्तम्भों का यथा विधि सेवन करने से ही शरीर और स्वास्थ्य की रक्षा होती है। इसी के साथ शरीर को बीमार करने वाले कारणों की भी चर्चा की गई है यथा-
धी धृति स्मृति विभ्रष्ट: कर्मयत् कुरुतऽशुभम्। प्रज्ञापराधं तं विद्यातं सर्वदोष प्रकोपणम्।। -- (चरक संहिता; शरीर. 1/102)
अर्थात् धी (बुद्धि), धृति (धैर्य) और स्मृति (स्मरण शक्ति) के भ्रष्ट हो जाने पर मनुष्य जब अशुभ कर्म करता है तब सभी शारीरिक और मानसिक दोष प्रकुपित हो जाते हैं। इन अशुभ कर्मों को प्रज्ञापराध कहा जाता है। जो प्रज्ञापराध करेगा उसके शरीर और स्वास्थ्य की हानि होगी और वह रोगग्रस्त हो ही जाएगा।
स्वास्थ्य का आधुनिक दृष्टिकोण स्वास्थ्य की देखभाल का आधुनिक दृष्टिकोण आयुर्वेद के समग्र दृष्टिकोण के विपरीत है; अलग-अलग नियमों पर आधारित है और पूरी तरह से विभाजित है। इसमें मानव-शरीर की तुलना एक ऐसी मशीन के रूप में की गई है जिसके अलग-अलग भागों का विश्लेषण किया जा सकता है। रोग को शरीर रूपी मशीन के किसी पुरजे में खराबी के तौर पर देखा जाता है। देह की विभिन्न प्रक्रियाओं को जैविकीय और आणविक स्तरों पर समझा जाता है, और उपचार के लिए, देह और मानस को दो अलग-अलग सत्ता के रूप में देखा जाता है।

 रोग एवं उपचार
मासूम ज़हरा
,जेएनयू नई दिल्ली
उच्च रक्‍त चाप, हृदय रोग की समस्‍याएं, मधुमेह, जोड़ों का दर्द, गुर्दे का संक्रमण, कैंसर, क्षयरोग (टीबी) और आंखों की समस्‍याएं आदि कुछ रोग हैं, जो बहुधा वरिष्‍ठ नागरिकों को परेशान करते हैं। इन बीमारियों का उचित और कई लंबे समय तक इलाज करने की जरुरत पड़ती है। वरिष्‍ठ नागरिकों की चिकित्‍सा के लिए एलोपैथिक से लेकर प्राकृतिक चिकित्‍सा तक कई तरह के उपचार किए जाते हैं। इस भाग में, हम आपको वरिष्‍ठ नागरिकों को होने वाली आम स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं, उनके निवारण के सुझाव और चिकित्‍सा केंद्रों के बारे में सूचना प्रदान करेंगे। यदि आप वृद्ध हैं तो आपको ऐसी किसी बीमारी के शुरू होने को रोकने के लिए नियमित रूप से चिकित्‍सा जांच कराना जरूरी है। एक बार रोग लग जाने पर स्‍वस्‍थ होने में बहुत समय लग जाता है। इससे अनावश्‍यक रूप से खर्च और तनाव होता है। इसलिए कहा जाता है कि परहेज सबसे अच्‍छा उपचार है। यदि आप डॉक्‍टर के निदान से संतुष्‍ट नहीं है तो किसी दूसरे अथवा तीसरे डॉक्‍टर की राय लेना हमेशा अच्‍छा होता है। नकली अथवा बेईमान डॉक्‍टरों से बच कर रहें जो पैसा कमाने के चक्‍कर में दूसरे डॉक्‍टर की राय को गलत बताते हैं। सरकारी अस्‍पतालों में सही निदान की गारंटी होती है और उन निजी अस्‍पतालों की अपेक्षा कम पैसा लगता है। कोई भी कदम उठाने से पहले चाहे दवाई खाने की बात हो अथवा आहार सेवन की, डॉक्‍टर की सलाह अवश्‍य लें।

 राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन
मासूम ज़हरा
,जेएनयू नई दिल्ली
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन पूरे देशभर में विशेष रूप से 18 राज्यों की ग्रामीण जनता को प्रभावी स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई है जहाँ न्यून स्वास्थ्य सूचकांक और/या न्यून संरचना हो। इस मिशन की अवधि वर्ष 2005 से 2012 है।

विशेष केन्द्रित राज्य अरुणाचल प्रदेश, असोम, बिहार, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, जम्मू कश्मीर, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, मध्य प्रदेश, नागालैण्ड, उड़ीसा, राजस्थान, सिक्किम, त्रिपुरा, उत्तराखंड एवं उत्तर प्रदेश।
लक्ष्य बाल मृत्यु दर एवं मातृत्व मृत्यु दर में कमी लाना।
महिला स्वास्थ्य, बाल स्वास्थ्य, जल, शौचालय व स्वच्छता, प्रतिरक्षण एवं पोषाहार जैसे सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं तक सार्वभौमिक पहुँच सुनिश्चित करना।
स्थानीय स्थानिक बीमारी के साथ संचरणीय एवं गैर संचरणीय बीमारी की रोकथाम एवं नियंत्रण।
एकीकृत वृहद् प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा को सुलभ बनाना।
जनसंख्या स्थिरीकरण एवं लैंगिक तथा जनसांख्यिकी संतुलन।
स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं मुख्यधारा आयुष को पुनर्जीवित करना।
स्वस्थ जीवन शैली को बढ़ावा देना।

रणनीति
(क) मुख्य रणनीति
सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का स्वामित्व प्राप्त करने, नियंत्रण करने एवं देखभाल करने के लिए पंचायती राज संस्थाओं को प्रशिक्षित कर उसकी क्षमता बढ़ाना।
महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता (आशा) के माध्यम से उन्नत स्वास्थ्य सुविधाओं का, परिवार स्तर पर लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित करना।
पंचायत के ग्राम स्वास्थ्य समिति के माध्यम से प्रत्येक गाँव के लिए स्वास्थ्य योजना।
स्थानीय आयोजना व कार्यवाही एवं बहु-उद्देशीय कार्यकर्ता को सशक्त बनाने के लिए शर्त रहित सहायता के माध्यम से उप केन्द्र को मजबूत बनाना।

वर्तमान में कार्यरत सार्वजनिक स्वास्थ्य केन्द्र एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र को सशक्त बनाना एवं स्वास्थ्य देखभाल को सामान्य स्तर तक लाने के लिए प्रत्येक 1 लाख की आबादी पर 30-50 बिस्तर वाला सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र का प्रावधान (भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य स्तर व्यैक्तिक, उकरणीय एवं प्रबंधकीय स्तर को परिभाषित करता है)।
जिला स्वास्थ्य मिशन द्वारा पेयजल, शौचालय व स्वच्छता एवं पोषाहार सहित निर्मित अंतर क्षेत्रीय जिला स्वास्थ्य योजना का निर्माण एवं क्रियान्वयन।
राष्ट्रीय, राज्य, प्रखंड एवं जिला स्तर पर स्वास्थ्य क्षेत्र एवं परिवार कल्याण कार्यक्रम को एकीकृत करना।
लोक-स्वास्थ्य प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय, राज्य एवं जिला स्वास्थ्य मिशन को तकनीकी समर्थन।
साक्ष्य आधारित आयोजना, संचालन एवं निरीक्षण के लिए डाटा संग्रहण, मूल्याँकन एवं पुनरीक्षण कार्य के लिए क्षमता बढ़ाना।
विकास के लिए पारदर्शी नीति का निरूपण एवं स्वास्थ्य के लिए मानव संसाधन कैरियर का विकास।
खैनी या तम्बाकू, शराब आदि हानिकारक पदार्थों के सेवन में कमी लाकर स्वस्थ जीवन शैली को बढ़ावा देने के लिए सभी स्तर पर निवारक स्वास्थ्य देखभाल के लिए क्षमता विकसित करना।
इन क्षेत्रों में गैर लाभकारी क्षेत्रों को बढ़ावा देना।
(ख) सहायक रणनीतियाँ: अनौपचारिक ग्रामीण वैद्यों या डॉक्टरों सहित निजी क्षेत्र का विनियमन ताकि नागरिकों को उचित मूल्य पर उच्च गुणवत्तायुक्त सेवा प्राप्त हो सके।
लोक-स्वास्थ्य के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निजी क्षेत्र एवं सार्वजनिक क्षेत्र की सहभागिता को बढ़ावा देना।
आयुष को मुख्यधारा में लाकर स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा को शक्ति प्रदान करना।
चिकित्सा सुविधा एवं चिकित्सा आचार नीति सहित ग्रामीण स्वास्थ्य मुद्दे को सहायता पहुँचाने के लिए चिकित्सा शिक्षा को पुनर्नवीकरण करना।
संस्थागत व्यवस्था
ग्रामीण स्वास्थ्य एवं शौचालय समिति (गाँव स्तर पर इसमें पंचायत प्रतिनिधि/ ए.एन.एम/ एम.पी.डब्ल्यू, आँगनवाड़ी सेविका, शिक्षक, आशा, सामुदायिक स्वास्थ्य स्वयंसेवी)।
सार्वजनिक अस्पताल के सामुदायिक प्रबंधन के लिए रोगी कल्याण समिति (या समकक्ष)।
जिला स्वास्थ्य प्रमुख- संयोजक एवं सभी संबंधित विभाग सहित जिला परिषद के नेतृत्व में जिला स्वास्थ्य मिशन।
राज्य स्वास्थ्य मिशन - मुख्यमंत्री अध्यक्ष, राज्य के स्वास्थ्य मंत्री- सह अध्यक्ष, एवं राज्य के स्वास्थ्य सचिव - संयोजक एवं अन्य संबंधित विभागों, गैर सरकारी संस्थाओं, निजी विशेषज्ञों आदि को प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाएगा।
राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग का एकीकरण।
राष्ट्रीय मिशन संचालन समूह - केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री- अध्यक्ष, योजना आयोग के उपाध्यक्ष, पंचायती राज, ग्रामीण विकास एवं मानव संसाधन विकास विभाग के मंत्री एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ सदस्य के रूप में मिशन को नीतिगत सहायता एवं निर्देशन प्रदान करेंगे।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण समिति की अध्यक्षता में अधिकार संपन्न कार्यक्रम समिति, मिशन की कार्यकारिणी निकाय होगी।
स्थायी संचालन समूह आशा पहल के क्रियान्वयन की देखरेख एवं उसे निर्देशन प्रदान करेंगे।
चयनित कार्य के लिए कार्य समूह (समयबद्ध)
निधि व्यवस्था राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन को प्रमुख कार्यक्रम माना गया है जिसमें स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के सभी वर्तमान कार्यक्रम जैसे- आर.सी.एच-2, राष्ट्रीय मलेरिया रोग नियंत्रण कार्यक्रम, टीबी/यक्ष्मा, कालाजार, फाइलेरिया, अंधता एवं आयोडिन अल्पता एवं एकीकृत रोग निगरानी को, इस मिशन योजना में शामिल किया जाएगा।
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लिए वर्ष 2005-06 में व्यय 6700 करोड़ रुपये था। मिशन प्रत्येक वर्ष निर्धारित वार्षिक बजट के अलावे 30 प्रतिशत अतिरिक्त खर्च करने की अपेक्षा रखती है ताकि राष्ट्रीय न्यूनतम साझा कार्यक्रम के लक्ष्य, लोक स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च को सकल घरेलू उत्पाद के 0.9 प्रतिशत से बढ़ाकर 2-3 प्रतिशत तक ले जाया जाए, को प्राप्त किया जा सके।
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लिए व्यय का निर्धारण वार्षिक बजट में तदनुसार किया जाएगा।
मिशन की गतिविधियों को सहायता प्रदान करने के लिए राज्यों से आशा की जाती है कि वे प्रतिवर्ष कम से कम 10 प्रतिशत की दर से लोक स्वास्थ्य बजट में बढ़ोत्तरी करे।
राज्यों को स्कोवा (SCOVA) के माध्यम से वित्तीय शीर्षक के नाम से निधि जारी किया जाएगा। इसमें 18 विशेष राज्यों को प्राथमिकता दिया जाएगा।
समय-सीमा (प्रमुख घटक के लिए) ----- घटक समय सीमा
जिला/राज्य मिशन के विभिन्न संस्था के संविधान का विलय----- जून 2005
राज्य केन्द्र/लोक स्वास्थ्य केन्द्र/सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पर समान प्रकार के अतिरिक्त दवा का प्रावधान ---दिसंबर 2005
क्रियाशील कार्यक्रम प्रबंधन इकाई ----- 2005-06
ग्रामीण स्वास्थ्य योजना का निर्माण -------2006
ग्राम स्तर पर आशा (ड्रग किट के साथ) -----------2005-2008
ग्रामीण अस्पताल का उन्नयन ------------------2005-2007
जिला योजना का परिचालन ----------------2005-2007
जिला स्तर पर मोबाइल मेडिकल इकाई ----------------- 2005-08

परिणाम
(क) राष्ट्रीय स्तर:
शिशु मृत्यु दर घट कर 30 (1 हजार जन्म लेने वाले बच्चों पर) हुआ।
मातृत्व मृत्यु अनुपात घट कर 100 (1 लाख जन्म देने वाली माताओं में) हुआ।
कुल प्रजनन दर घट कर 2.1 तक आया।
मलेरिया से होने वाली मौतों को वर्ष 2010 तक 50 प्रतिशत की दर से कम करना एवं अतिरिक्त 10 प्रतिशत को वर्ष 2012 तक कम करना।
कालाजार मृत्यु दर: वर्ष 2010 तक पूरी तरह समाप्त करना और 2012 तक इस अभियान को चलाये रखना।
फाइलेरिया /माइक्रोफाइलेरिया कमी का दर- 2010 तक 70 प्रतिशत, 2012 तक 80 प्रतिशत एवं 2015 तक इसे पूरी तरह से समाप्त करना।
डेंग्यू मृत्यु दर में कमी : 2010 तक इसमें 50 प्रतिशत तक कमी लाना एवं 2012 तक इस अभियान को जारी
रखना। जापानी इनसेफ्लाइटिस मृत्यु में कमी का दर: 2010 तक इसमें 50 प्रतिशत तक कमी लाना एवं 2012 तक इस अभियान को जारी रखना।
मोतियाबिंद का ऑपरेशन : वर्ष 2012 तक 46 लाख प्रति वर्ष की दर से बढ़ाना
कुष्ठ उन्मूलन दर : वर्ष 2005 के 1.8/10,000 के दर को कम कर उसे 1/10,000 तक के स्तर पर लाना।
यक्ष्मा /क्षय रोग के लिए डॉट्स सेवा : पूरे मिशन अवधि में 85 प्रतिशत स्वास्थ्य लाभ दर को बनाये रखना।
सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र का उन्नयन कर भारतीय लोक स्वास्थ्य स्तर तक ले जाना।
प्रथम रेफरल इकाई के उपयोग को 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 75 प्रतिशत तक करना।
10 राज्यों में 2 लाख 50 हजार मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (आशा) को शामिल करना।

(ख) सामुदायिक स्तरीय :
ग्राम स्तर पर सामान्य बीमारी के इलाज के लिए दवाई किट के साथ प्रशिक्षित सामुदायिक स्तरीय कार्यकर्ता की उपलब्धता या व्यवस्था करना।
निश्चित दिन/महीना को प्रत्येक आँगनवाड़ी केन्द्र पर स्वास्थ्य दिवस का आयोजन करना ताकि प्रतिरक्षण, बच्चे के जन्म पूर्व या उसके पश्चात जाँच के लिए एवं माता व शिशु स्वास्थ्य से संबंधित स्वास्थ्य सेवा एवं पोषाहार आदि के बारे में आवश्यकता की पूर्ति की जा सके।
स्वास्थ्य उप-केन्द्रों एवं अस्पताल स्तर पर सामान्य बीमारियों के इलाज के लिए औषधि की व्यवस्था करना।
सार्वजनिक स्वास्थ्य केन्द्र/सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र स्तर पर निश्चित रूप से डॉक्टर, दवा एवं गुणवत्तापूर्ण सेवा के साथ अच्छे अस्पताल की सेवा उपलब्ध कराना।
स्वयं नष्ट हो जाने वाले सिरिंज के माध्यम से सार्वभौमिक प्रतिरक्षण की सुविधा मुहैया कराना। इस कार्यक्रम के अंतर्गत वैकल्पिक टीका वितरण एवं समुन्नत परिभ्रमण सेवा की व्यवस्था करना।
गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाले लोगों के लिए जननी सुरक्षा योजना के तहत रेफरल, परिवहन व रक्षक सुविधा के साथ उन्नत संस्थागत प्रसव की व्यवस्था एवं कम मूल्य पर उचित अस्पताल सुविधा की उपलब्धता।
इस मिशन के अंतर्गत सामुदायिक स्वास्थ्य बीमा के पायलट के माध्यम से न्यून वित्तीय क्षति पर सुनिश्चित स्वास्थ्य देखभाल की व्यवस्था।
पारिवारिक शौचालय का प्रावधान।
जिला स्तर पर मोबाइल चिकित्सा इकाई के माध्यम से उन्नत आउटरीच सेवाएं।

 ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य की वर्त्तमान स्थिति
मासूम ज़हरा
,जेएनयू नई दिल्ली
आज स्वस्थ भारत का निर्माण चुनौती बन गई है। जहाँ देश में स्वास्थ्य सुविधाएँ प्रदान करने के क्षेत्र में निजी अस्पतालों की भागीदारी बढ़ रही है वहीं महँगी स्वास्थ्य सेवाएँ गरीबों की पहुँच से दिनों-दिन दूर होती जा रही है। इस मामले में ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य की स्थिति और ज्यादा चिंताजनक बनी हुई है। इसी स्थिति का सामना करने के लिए केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत की है ताकि गाँव के गरीबों विशेषकर महिलाओं को उचित स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध करायी जा सके। साथ ही, नवजात शिशुओं में बढ़ती कुपोषण व अपंगता की समस्या तथा बाल व मातृत्व मृत्यु दर को नियंत्रित किया जा सके। सबसे अहम् बात यह कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता का भी अभाव पाया गया है। आई.एन.डी.जी अपने वेब पोर्टल एवं गेटवे पत्रिका के माध्यम से ग्रामीण समुदाय में स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता लाने का ही काम कर रही है। इसके माध्यम से यह स्वस्थ भारत की परिकल्पना को साकार करने के लिए स्थानीय भाषा में पोषाहार, बीमारी व उससे बचाव, परिवार नियोजन एवं सरकार द्वारा चलाये जा रहे विभिन्न योजना व कार्यक्रमों तथा प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के बारे में जानकारी उपलब्ध कराने का कार्य कर रही है। इसी क्रम में हम यूनीसेफ (हैदराबाद केन्द्र) के सहयोग से मातृत्व स्वास्थ्य व शिशु समरक्षा पर एक बहुभाषीय परिचर्चात्मक सीडी भी उपलब्ध करा रहे हैं। इसके माध्यम से, आप गर्भ में पल रहे बच्चे किस प्रकार विभिन्न स्थितियों से गुज़रते हुए बड़े होते हैं और उसकी देखभाल आपको किस प्रकार करनी चाहिए, के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

 एच आई वी और ऐड्स
मज़हरहसनैन
,जेएनयू नई दिल्ली
ऐड्स का पुरा नाम होता है ऐक्वायर्ड इम्युनो डेफिसिएन्सी सिन्ड्रोम (Aquired Immuno Deficiency Syndrome)। एक लाईलाज विमारी है जिसकी रोकथाम जानकारि फैला कर किया जा सकता है। इसे फैलाने वाले वायरस को एच आई वि जिसका पुरा नाम ह्युमन इम्युनो डेफिसिएन्सी वायरस (Human Immunodeficiency Virus) कहतें है . अभी तक एड्स कि कोइ भी कारगर दवा उपल्ब्ध नही है एच आई वि के सरीर मे प्रवेश करने के कई वर्ष बाद एड्स कि स्थिती उतप्न होती है. और धिरे-धिरे हमारे सरीर कि रोगों से लडने कि क्षमता कम हो जाती है. कई विमारीया हमे घेर लेती है यानी विमारियो का एक समुह सा हमारे अन्दर बन जाता है और संक्रमण कि इसी अवस्था को एड्स कहते है.
एच आई वी के प्रकार और और बचाव :-

एच आई वी दो प्रकार का होता है HIV-I, HIV-II
एच आई वी-१ सबसे ज्यादा और एच आई वी-२ कम घातक होता है, मगर दोनो हि हमारे सरीर कि रोगों से लडने कि क्षमता कम कर देतें हैं।
एच आई वी जब सरीर मे प्रवेष करता है तो वह अपनी संख्या धिरे-धिरे बढाने लगता है जिससे सरीर कि रोगों से लडने कि क्षमता कम हो जाती है।
सुरुवाती दिनो के ७ से १० हफ्तों मे इसका पता नही चल पाता है जब आप को लगे कि आप संक्रमीत हैं तो १० या १२ हफ्तों के बाद हि खुन कि जांच करायें।
Hiv से लडने वाली दवाओं का सेवन लगातार करें और हां दवा रोजाना खायें कभी-कभी दवा पुरी जिंदगी भर भी खानी पड सकती है। और बिना डाक्टर के सलाह से कुछ भी न करें.
ऐड्स होने के मुख्य कारण :-
असुरक्षित योन संबंध बनाने से (मतलब बिना कंडोम के प्रयोग के)
संक्रमीत रक्त चढाने से
संक्रमीत सुई या सिरिंज के इस्तेमाल से
और एच आई वी संक्रमीत मा से उसके होने वाले शिशु को
इनसे एड्स नही होता:-
एच आई वी संक्रमीत ब्यक्ति से हाथ मिलाने से
साथ खाना खाने से, अलिंगन और चुम्बन से, साथ रहने से
एच आई वी संक्रमीत ब्यक्ति के तौलिये से हाथ या मुह पोछने से
और मच्छर के काटने से
आज कल आम आदमी के अन्दर एक डर सा बन गया है की ये मत करो वोह मत करो वरना ऐड्स हो जाए गा .परन्तु क्या किसी ने जानने की कोसिस की है कि ऐड्स क्या है यह कोई अकेली बीमारी नही है आज पुरी दुनिया में एच आई वी और ऐड्स को लेकर एक तरह का भय व्याप्त है और इसकी रोकथाम व उन्मूलन के लिए के जोरदार अभियान चलाये जा रहे हैं पूरी दुनिया के आँकडों की मानें तो हर साल ऐड्स से मरने वालों की संख्या हजारों में होती है ,
ख़ुद हमारे देश में भी १९८७ से लेकर अब तक ऐड्स से मरने वालों की संख्या ग्यारह हज़ार थी, सरकारी और गैर-सरकारी दोनों स्तरों पर एच आई वी और ऐड्स की रोकथाम के लिए गंभीरता है और इसी के लिएअति सक्रिय कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। सरकार भी अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा इसी पर खर्च कर रही है। उदाहरण के लिए २००५-२००६ में जहाँ ऐड्स नियंत्रण पर ५०० करोड़ खर्च किए गए।
करोड़ों डॉलर की धनराशि को पानी की तरह बहाया जा रहा है। यही नहीं, अब तो अधिकांश गैर सरकारी संगठन भी ऐड्स नियंत्रण अभियानों को ही चलाने में रूचि दिखा रहे हैं। कहने का मतलब यह है की ऐड्स की भयावहता के खिलाफ लोगों को जागरूक किया जाए। एच आई वीऔर ऐड्स वाकई एक गंभीर बीमारी है। और इसकी रोकथाम के लिए जन-जागरण अभियान जरूर चलाया जाना चाहिए। ऐड्स-नियंत्रण जोरदार,अभियानों को चला कर ही पूरी दुनिया को स्वस्थ एवं दीर्घजीवी बनाया जा सकता है।

 स्वाइन इन्फ़्लुएन्ज़ा ( Swine Flue )
मज़हर हसनैन ,जेएनयू नई दिल्ली
स्वाइन इन्फ़्लुएन्ज़ा (स्वाइन फ्लू) सूअरों में एक श्वास संबन्धी रोग है जो टाइप ए इन्फ़्लुएन्ज़ा वायरस द्वारा होता है और सूअरों में नियमित रूप से फैलता है। मनुष्यों को आमतौर पर स्वाइन फ्लू नहीं होता है, लेकिन मानवीय संक्रमण हो सकते हैं तथा होते हैं। स्वाइन फ्लू वायरस व्यक्ति-से-व्यक्ति को फैलने की जानकारी पहले भी प्रकाश में आई है, लेकिन पूर्व में, इसका संचरण सीमित था तथा तीन लोगों से अधिक में टिकता नहीं था।
मार्च 2009 के अंत तथा अप्रैल 2009 की शुरुआत में स्वाइन इन्फ़्लुएन्ज़ा ए (H1N1) वायरस से दक्षिणी कैलिफोर्निया तथा सैन एन्तेनियो के निकट मानव संक्रमण के पहले मामलों की जानकारी सामने आई। अमेरिका के अन्य राज्यों ने भी मानवों में स्वाइन फ्लू संक्रमण के मामलों की जानकारी दी है तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी मामलों की जानकारी दी गई है।
लोगों में स्वाइन फ्लू के चिह्न तथा लक्षण लोगों में स्वाइन फ्लू के लक्षण सामान्य मानवीय फ्लू के समान ही होते हैं तथा इनमें शामिल हैं बुखार, कफ, गला खराब होना, शरीर में दर्द, कंपकंपी तथा थकावट। कुछ लोगों ने स्वाइन फ्लू से जुड़े लक्षणों में डायरिया तथा वमन भी बताए हैं। पूर्व में, लोगों में स्वाइन फ्लू से संक्रमण के कारण स्वास्थ्य अत्यंत खराब होने (निमोनिया तथा श्वास प्रणाली की विफलता) एवं मृत्यु की जानकारी दी गई है। मौसमी फ्लू की तरह, स्वाइन फ्लू भी दीर्घकालीन स्वास्थ्य समस्याओं को और बदतर कर सकता है।
फ्लू के वायरस मुख्य रूप से व्यक्ति से व्यक्ति को खांसने या इन्फ़्लुएन्ज़ा से पीड़ित व्यक्ति के छींकने से फैलता हैं। कभी-कभी लोग किसी चीज़ पर लगे फ्लू के वाइरस को छूने एवं उसके बाद उनके मुंह या नाक को छूने से संक्रमित हो सकते हैं।
फ्लू से पीड़ित कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को कैसे संक्रमित कर सकता है? बीमार होने के बाद संक्रमित व्यक्ति अन्य लोगों को पहले दिन की शुरुआत से लेकर सात दिनों या उससे अधिक दिनों तक संक्रमित कर सकते हैं। इसका मतलब है इससे पहले कि आपको ज्ञात हो कि आप बीमार हैं, आप किसी और को फ्लू संचारित कर सकते हैं, और साथ ही साथ तब भी जब आप बीमार हों।
फ्लू से बचने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?सबसे पहले तथा अत्यंत महत्त्वपूर्ण: अपने हाथ धोएं। अच्छा सामान्य स्वास्थ्य बनाए रखने का प्रयास करें। पर्याप्त नींद लें, गतिशील रहे, तनाव पर नियन्त्रण रखें, पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ लें एवं पोषक भोजन लें। फ्लू वायरस की संभावना वाली सतहों को न छूने का प्रयास करें। बीमार लोगों से नज़दीकी संपर्क रखने से
बचें। बीमार होने से बचने के लिए मैं क्या कर सकता/सकती हूँ? इस समय स्वाइन फ्लू से बचने के लिए कोई टीका उपलब्ध नहीं है। ऐसी दैनिक क्रियाएं हैं, जो इन्फ़्लुएन्ज़ा जैसी श्वास संबन्धी बीमारियां उत्पन्न करने वाले रोगाणुओं को फैलने से रोकने में मदद कर सकती हैं। अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए ये दैनिक कदम उठाएं:
खांसते या छींकते समय अपनी नाक तथा मुंह को टिशु से ढंकें
अपने हाथों को बार-बार साबुन तथा पानी से धोएं, विशेष रूप से खांसने या छींकने के बाद। अल्कोहोल आधारित हाथ साफ़ करने के पदार्थ भी कारगर हैं,
अपनी आँखें, नाक तथा मुंह को छूने से बचें, रोगाणु इस तरह से फैलते हैं,
बीमार लोगों से नज़दीकी संपर्क रखने से बचें,
यदि आप इन्फ़्लुएन्ज़ा से पीड़ित हों तो यह सिफारिश की जाती है कि आप कार्य पर या स्कूल न जाएं तथा अन्य लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए उनसे दूर रहें।
खांसने या छींकने से वायरस को फैलने से रोकने के लिए सबसे अच्छा तरीका क्या है? यदि आप बीमार हैं तो जितना अधिक संभव हो, अन्य लोगों से अपने संपर्क को सीमित रखें। यदि बीमार हों तो काम पर या स्कूल न जाएं। खांसते या छींकते समय अपनी नाक तथा मुंह को टिशु से ढंकें। ऐसा करना आपके आसपास के लोगों को बीमार होने से बचा सकता है। उपयोग किया हुआ टिशु रद्दी की टोकरी में डालें। यदि टिशु न हो तो किसी अन्य वस्तु से अपनी खांसी तथा छींक को ढंकें। उसके बाद, अपने हाथ साफ़ करें, एवं प्रत्येक बार खांसने या छींकने के बाद ऐसा करें।
फ्लू से बचने के लिए मेरे हाथ धोने का सर्वोत्तम तरीका क्या है? बार-बार हाथ धोना आपको रोगाणुओं से बचाने में मदद करेगा। हाथ साबुन या पानी से धोएं, या अल्कोहोल-आधारित हाथ धोने के पदार्थ से। यह सिफारिश की जाती है कि जब आप अपने हाथ धोते हैं - साबुन तथा गर्म पानी से - तो आप 15 से 20 सेकंड के लिए धोएं। जब साबुन और पानी उपलब्ध न हों तो अल्कोहोल-आधारित हाथ पोंछकर फेंकने योग्य कपड़े के टुकडे या जॅल सैनिटाइज़र का इस्तेमाल किया जा सकता है। आप उन्हें अधिकतर सुपरमार्केट्स या दवाई की दुकानों से प्राप्त कर सकते हैं। जेल के लिए पानी की आवश्यकता नहीं होती; उसमें मौज़ूद अल्कोहोल आपके हाथ पर के रोगाणुओं को मार देता है।
यदि आप बीमार हो जाएं एवं इनमें से किसी भी चेतावनी संकेत का अनुभव करें, तो आपातकालीन चिकित्सा देखभाल लें।बच्चों में आपातकालीन चेतावनी संकेत जिनमें त्वरित चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता होती है, में शामिल हैं:

सांस तेज़ी से चलना या सांस लेने में तकलीफ
त्वचा का रंग नीला पड़ना
पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ नहीं लेना
नींद से नहीं जागना या बातचीत नहीं करना
इतना चिड़चिड़ा होना कि किसी द्वारा थामे जाना नहीं चाहे
फ्लू जैसे लक्षण में सुधार लेकिन बुखार एवं अधिक खांसी के साथ पुनः लौटना
त्वचा में दानों के साथ बुखार
वयस्कों में आपातकालीन चेतावनी संकेत जिनमें त्वरित चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता होती है, में शामिल हैं:
सांस लेने में तकलीफ या सांस फूलना
छाती या पेट में दर्द या दबाव
अचानक चक्कर आना
भ्रम
तेज़ या लगातार उल्टी होना

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